देहरादून. उत्तराखंड की बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों के केंद्र में आ गया है. मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश को मंजूरी दिए जाने के कुछ ही घंटों बाद देहरादून में एक कथित “वीआईपी” के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से राज्य की राजनीति गरमा गई है. यह एफआईआर पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित पर्यावरणविद् अनिल जोशी की शिकायत पर दर्ज की गई है, जिसने न केवल जांच की दिशा बल्कि इसके समय और मंशा को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
शुक्रवार को मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी आधिकारिक संचार में कहा गया कि अंकिता भंडारी के माता-पिता की भावनाओं और अनुरोध का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री ने इस मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश को स्वीकृति प्रदान की है. यह फैसला लंबे समय से चल रही मांगों और विरोध प्रदर्शनों के बाद सामने आया, जिसमें पीड़िता के परिवार के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने भी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की थी. सीबीआई जांच की घोषणा के बाद लोगों को उम्मीद जगी कि मामले से जुड़े हर पहलू की गहराई से जांच होगी और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा.
इसी घोषणा के कुछ ही घंटों बाद देर रात एक नया मोड़ सामने आया, जब देहरादून के पर्यावरणविद् अनिल जोशी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में उन्होंने उस कथित “वीआईपी” के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जिसका नाम लंबे समय से इस हत्याकांड से जुड़े आरोपों और चर्चाओं में सामने आता रहा है. पुलिस ने शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज कर ली, जिसके बाद मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है.
अनिल जोशी उत्तराखंड में एक जाना-पहचाना नाम हैं. वे न केवल पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं, बल्कि उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से भी नवाजा जा चुका है. वे देहरादून स्थित हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन से जुड़े हैं और सामाजिक मुद्दों पर मुखर राय रखते रहे हैं. हालांकि, इस बार उनकी शिकायत को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं. विपक्षी दलों का कहना है कि एक प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत होने के बावजूद, इसके समय और कानूनी अधिकार क्षेत्र पर गंभीर प्रश्न उठते हैं.
विपक्ष का तर्क है कि जिस अपराध की घटना ऋषिकेश क्षेत्र में हुई थी, उसकी सुनवाई कोटद्वार की अदालत में चल रही है, ऐसे में देहरादून में एफआईआर दर्ज किया जाना संदेह के घेरे में है. उनका यह भी कहना है कि जब मामला अब सीबीआई जांच के अधीन जाने वाला है, तब इस तरह की एफआईआर दर्ज होने से जांच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. विपक्ष ने इसे राजनीतिक दबाव और ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है.
सरकारी पक्ष का कहना है कि कानून के तहत कोई भी नागरिक, चाहे वह किसी भी क्षेत्र से हो, यदि उसके पास किसी अपराध से जुड़ी जानकारी या आरोप हों तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है. पुलिस का दावा है कि शिकायत मिलने के बाद उन्होंने नियमानुसार कार्रवाई की है और एफआईआर दर्ज करना उनकी वैधानिक जिम्मेदारी थी. पुलिस अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि एफआईआर दर्ज होने का मतलब यह नहीं है कि आरोप सिद्ध हो गए हैं, बल्कि यह जांच की प्रक्रिया का एक हिस्सा है.
अंकिता भंडारी हत्याकांड पहले ही राज्य में गहरे आक्रोश का कारण बन चुका है. युवा रिसेप्शनिस्ट अंकिता की हत्या ने महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही जैसे मुद्दों को केंद्र में ला दिया था. शुरुआती जांच के दौरान ही यह आरोप लगते रहे कि मामले में कुछ बड़े और रसूखदार लोगों की भूमिका को दबाने की कोशिश की जा रही है. इसी वजह से पीड़िता के परिवार ने बार-बार सीबीआई जांच की मांग की थी.
मुख्यमंत्री द्वारा सीबीआई जांच की सिफारिश को मंजूरी दिए जाने को सरकार की ओर से एक बड़ा कदम माना जा रहा है. सरकार का कहना है कि वह इस मामले में पूरी पारदर्शिता चाहती है और पीड़िता के परिवार को न्याय दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करेगी. वहीं, विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला भी बढ़ते दबाव और राजनीतिक मजबूरी के चलते लिया गया है.
एफआईआर दर्ज होने के बाद अब मामला और अधिक जटिल हो गया है. एक ओर सीबीआई जांच की प्रक्रिया शुरू होने की तैयारी है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर दर्ज हुई एफआईआर ने कई कानूनी और राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अब यह देखना अहम होगा कि सीबीआई इस नए घटनाक्रम को किस तरह अपनी जांच में शामिल करती है और क्या कथित वीआईपी की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो पाती है या नहीं.
अंकिता के माता-पिता ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर सच्चाई सामने लाना चाहते हैं और उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा है. सीबीआई जांच की घोषणा के बाद उन्होंने उम्मीद जताई थी कि अब मामले में कोई भी नाम या चेहरा जांच से बाहर नहीं रहेगा. एफआईआर दर्ज होने की खबर के बाद पीड़िता के परिवार की प्रतिक्रिया पर भी सभी की निगाहें टिकी हुई हैं.
सीबीआई जांच की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद दर्ज हुई एफआईआर ने अंकिता भंडारी हत्याकांड को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है. यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासनिक पारदर्शिता और कानून के समान अनुप्रयोग की कसौटी बन चुका है. आने वाले दिनों में सीबीआई की भूमिका, जांच की दिशा और इस एफआईआर के कानूनी नतीजे यह तय करेंगे कि क्या वास्तव में इस बहुचर्चित हत्याकांड में सभी जिम्मेदार लोगों को बेनकाब किया जा सकेगा या नहीं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

