प्रतियोगिता परीक्षाओं के संचालन में लापरवाही बरतने वाली एजेंसीज के खिलाफ उठाने होंगे कड़े कदम

प्रतियोगिता परीक्षाओं के संचालन में लापरवाही बरतने वाली एजेंसीज के खिलाफ उठाने होंगे कड़े कदम

प्रेषित समय :21:31:23 PM / Wed, Apr 7th, 2021

कमलेश पांडेय. अंधाधुंध निजीकरण’ से दुनिया के सबसे बड़े और सशक्त लोकतंत्र भारत को कैसी ’अव्यवस्था’ मिल रही है, इसकी एक बानगी उत्तर प्रदेश में दिखाई पड़ी है जहां नौकरियों की परीक्षा लेने वाली एक एजेंसी द्वारा की गई गड़बड़ी के बाद उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग ने न केवल ग्राम पंचायत अधिकारी, ग्राम विकास अधिकारी और समाज कल्याण पर्यवेक्षक के 1953 पदों पर भर्ती के लिए हुई परीक्षा को निरस्त कर दिया हैं बल्कि उस एजेंसी के मार्फत ली जाने वाली तीन अन्य परीक्षाओं को भी अगले आदेश तक निरस्त कर दिया है.  

इन परीक्षाओं में 4 अप्रैल को होने वाली वन रक्षक एवं वन्य जीव रक्षक के 728 पदों की परीक्षा, आगामी 28 अप्रैल को प्रस्तावित सहायक बोरिंग टेक्नीशियन के 486 पद के लिए प्रतियोगितात्मक परीक्षा और आगामी 8 मई को होने वाली सहायक सांख्यिकीय अधिकारी व सहायक शोध अधिकारी के 904 पदों की परीक्षा शामिल है जिसकी जिम्मेदारी सम्बन्धित एजेंसी को दी गई थी.

फिलवक्त, आयोग के परीक्षा नियंत्रक दिनेश द्वारा गत बुधवार को जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि परीक्षा कराने की जिम्मेदारी जिस एजेंसी को दी गई थी, वह शक के दायरे में है क्योंकि शासन के आदेश पर एसआईटी जांच कराई गई थी जिसमें गड़बड़ी की पुष्टि होने के बाद यह फैसला लिया गया है. परीक्षा संचालन सम्बन्धी मिली अनियमितताओं की जब जांच कराई गई तो बात सही निकली.

हालांकि, ऐसी जांच करवाने के कुछ और भी कारण हो सकते हैं जिनके रहस्यों पर से पर्दा उठाना कोई भी प्रशासन नहीं चाहेगा. बात सिर्फ एक नौकरी या परीक्षा की नहीं है बल्कि प्रश्न पत्र लीक करने से लेकर सेटिंग-गेटिंग करने-कराने का एक अवैध गैंग विकसित हो चुका है जो कहीं न कहीं राजनीतिक व प्रशासनिक शह भी प्राप्त है अन्यथा स्थिति इतनी बदतर नहीं होती. आज तक देश में ऐसी अनियमितताओं के कई खुलासे हुए, पर इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई कर दर प्रतिशत पूछने पर उधर इधर की बातें करना आम बात है. ऐसे में जब तक ऐसे तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की कोई नजीर स्थापित नहीं की जाती, बात नहीं बनेगी.

कहना न होगा कि सरकारी तंत्र व निजी तंत्र के बीच चल रही सांठगांठ व लुकाछिपी के इस खेल में सबसे बड़ा अहित उन छात्रों का हुआ है, जिन्होंने अपना कीमती वक्त और धन जाया करने के बाद भी मनमाफिक नौकरी नहीं पाई. आज जबकि शैक्षणिक व्यय काफी ज्यादा बढ़ गया है और अर्थव्यवस्था के सुनियोजित विचलन के चलते मध्यम वर्ग के पास सरकारी नौकरी के अलावा रोजगार प्राप्ति का कोई उत्तम विकल्प नहीं बच रहा है, ऐसे में सरकारी नौकरी प्राप्ति के क्षेत्र में पनपा भ्रष्टाचार और उसको रोकने के नाम पर होने वाली दीर्घसूत्री कार्रवाई से उन लोगों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा जो सरकारी मुलाजिमों या धन्ना सेठों के लाडले हैं लेकिन उन अभ्यर्थियों पर ऐसे सरकारी निर्णय किसी कहर से कम नहीं होते जो किसानों, मजदूरों, कारीगरों, कुटीर उद्यमियों के घरों से आते हैं और तिनका तिनका जोड़कर सरकारी नौकरी
पाने के लिए एड़ी-चोटी एक किए रहते हैं.

यह कौन नहीं जानता कि सरकारी नौकरियों में चोर दरवाजे के माध्यम से व कथित निजी कंपनियों के मार्फत जब कार्य अवसर की रेवड़ियां बांटी जाती हैं तो ये नेताओं या अधिकारियों के सम्पर्क में रहने वाले शागिर्दों या उनके द्वारा अग्रसारित लोगों को ही मिल पाती हैं. ऐसे में जिन कुछ महत्वपूर्ण पदों के लिए विज्ञापन के माध्यम से, प्रतियोगितात्मक परीक्षाओं के माध्यम से या ओपन इंटरव्यू के माध्यम से बहाली होती है, यदि वे भी पारदर्शिता पूर्ण तरीके से और समयबद्ध प्रणाली के तहत नहीं हो पाएं तो फिर दोष लोकतांत्रिक सियासत से भी ज्यादा उस कार्यपालक प्रशासन का है जो आम आदमी को एक न्यायपूर्ण और पारदर्शी व्यवस्था देने में विफल प्रतीत हो रहा है.

ऐसा इसलिए कि देश के विभिन्न प्रान्तों के मीडिया माध्यमों में ऐसे कहे-अनकहे किस्से भरे पड़े हैं जिससे समाज का अभिजात्य तबका जहां आह्लादित है, वहीं पढ़ा लिखा मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग खुद को भेदभाव मूलक प्रशासनिक नीतियों से प्रताड़ित महसूस करता है.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि निजीकरण और भूमंडलीकरण की आड़ लेकर सरकारी व निजी कंपनियों में पारस्परिक अंतर सहमति से शासकीय व प्रशासनिक अर्थव्यवस्था की जो अविवेकी बंदरबांट हो रही है, उससे कहीं घृत घना, कहीं मुट्ठी भर चना और कहीं वह भी मना का आलम यत्र तत्र सर्वत्र व्याप्त है.

इस बद से बदतर हो रही स्थिति में जहां जनता रुष्ट है और नेतृत्व हीनता की स्थिति के चलते किंकर्तव्यविमूढ़ भी. वहीं चिंता की बात तो यह है कि इस आलम से पूंजीवाद परस्त भारतीय लोकतांत्रिक अवधारणा पर सवालिया निशान कभी भी लग सकता है. यह स्थिति भारत और भारतीयों दोनों के प्रतिकूल होगी लेकिन इसे समझने-समझाने की फुर्सत किसे है. उस प्रतिपक्ष के पास भी नहीं जिसका यह जनतांत्रिक दायित्व बनता है.

अब भी वक्त है कि सरकार अपनी स्थायी जिम्मेदारी के प्रति गंभीरता पूर्वक विचार करें और उसे कतई निजी हाथों में नहीं सौंपे क्योंकि सरकारी प्रतिष्ठानों की विश्वसनीयता आज भी हमारे जनमानस में विद्यमान है, जबकि निजी प्रतिष्ठानों ने आर्थिक व व्यक्तिगत लाभ के चक्कर में उन प्रशासनिक मूल्यों की घोर उपेक्षा की है, जिससे कोई भी व्यवस्था विश्वसनीय बनती है और लोकोपयोगी भी. भारत में कम्पनी या फर्म बनाने, फिर उसे घाटे में दिखाकर बन्द कर देने और नया बना लेने के प्रचलन को बंद किए जाने की जरूरत है. इसके बिना निजीकरण की सफलता संदिग्ध रहेगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

एमपी बोर्ड ने परीक्षाओं के लिए जारी किया ब्लू प्रिंट, हाई सेकेंडरी परीक्षा के अंग्रेजी विशिष्ट में फिक्शन एवं ड्रामा रखा गया

यूपी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को योगी सरकार देगी मुफ्त कोचिंग

दिल्ली सरकार का फैसला: रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक रहेगा नाइट कर्फ्यू

एमपी के इंदौर में कोरोना का नया वैरिएंट, दो डोज लेने के बाद भी 20 लोग पाजिटिव, 193 के सेम्पल दिल्ली भेजे

दिल्ली में अब 24 घंटे लगेगी वैक्सीन, कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच राज्य सरकार का बड़ा फैसला

केजरीवाल सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट की फटकार, विज्ञापनों पर खर्च करने की बजाये कर्मचारियों को दें सैलरी

केंद्र सरकार पर जमकर बरसे केजरीवाल, कहा- हम किसानों के साथ, इसीलिए दिल्ली को केंद्र नहीं बना सका जेल

Leave a Reply