संतों की स्मृति ही पर्याप्त नहीं है, संत-मार्ग पर हम चल सकें तो ही उनके सद्कार्य और हमारा जीवन सार्थक है! कर्मवीर स्वामी स्वतंत्रानंद महाराज का जीवन भी ऐसा ही प्रेरणास्पद है. उनका जन्म हुआ बिहार में, कर्मभूमि बना वागड़ तो कर्म में प्रमुख रहे... सेवा, शिक्षा, संस्कार, धर्म, वेद और यज्ञ-हवन. 
बिहार प्रांत के गया जिले में अप्रैल 1912 में पटवारी रामशरण शर्मा के घर जन्में स्वामी स्वतंत्रानंद प्रारंभ से ही शिक्षाप्रेमी थे. शिक्षा के कारण ही राष्ट्रीय चेतना उनमें बाल्यकाल से ही पैदा हो गई थी. पटना विश्वविद्यालय से वकालात पास करके जहानाबाद में वकालात का कार्य प्रारंभ किया. राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिक यात्रा उनको आंदोलित करते थे. इधर, घर वालों ने विवाह का दबाव बनाया तो वे घर छोड़कर ही चल दिए.
रामकृष्ण मिशन से उनका सम्पर्क था अत: काशी जाकर मिशन की सेवा में लग गए. इस अवधि में वे अनेक ध्यानी, योगी आदि के सम्पर्क में आए और बहुत कुछ सीखा. मिशन से निकलकर आपने गंगातट पर कठोर साधना की. यहां से आप फरूखाबाद के वेदांत आश्रम व मैनपुरी के गीता आश्रम में भी रहे. इसी वेदांत आश्रम में एक घटना ने इनके जीवन को मोड़ दिया. अपने गुरूजी के ये पूर्ण विश्वास प्राप्त शिष्य थे किन्तु गुरूजी उन्हें किताबों की अलमारी खोलने को मना करते थे. एक बार संयोगवश गुरूजी बाहर प्रवास पर गए तो इन्हें उस आलमारी में रखी पुस्तकें देखने का अवसर मिल गया. वहीं इन्होंने स्वामी दयानंद रचित सत्यार्थ-प्रकाश पढ़ा. मन का मिथ्याज्ञान छंटने लगा और सत्य की झलक दिखाई देने लगी. बाद में वे वेदांत आश्रम छोड़ गए. 
अब इन्हें आत्मकल्याण के सपने को साकार करने में साधना तुच्छ सी लगने लगी थी. वे निरंतर सत्य की खोज में भटकते रहे. वे वृन्दावन व प्रयाग कुंभ में भी गए. घूमते-घामते वे एटा के गुरूकुल में गए जहां आपकी भेंट स्वामी भूमानंद से हुई. सत्यार्थ-प्रकाश पढऩे के बाद मन में उठे अनेक संशयों का समाधान उन्हें यहां मिला. यहीं से स्वामी ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका का श्रीगणेश किया व धार्मिक कुरीतियों से जनता को मुक्त कराने का भी संकल्प प्रारम्भ हुआ. 
अगस्त क्रांति के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें इजलास में तिरंगा झण्डा फहराते हुए व लोगों से नारे लगवाते हुए पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया व अलीगढ़ जेल में भेज दिया. वहां पहले से ही करीब 200 आर्य समाजी स्वतंत्रता सेनानी मौजूद थे. सभी को धीरे-धीरे छोड़ा जाने लगा. सन् 1944 तक स्वामी सहित करीब 12 कैदी ही बचे थे. स्वामीजी को खतरनाक कैदी की संज्ञा देकर सेण्ट्रल जेल भेज दिया गया. यहीं पर आपकी मुलाकात गोविन्दवल्लभ पंत, लालबहादुर शास्त्री आदि नेताओं से हुई. 10 जनवरी 1945 को स्वामी जेल से रिहा होकर पुन: अलीगढ़ आ गए. यहीं से उन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार का कार्य तेजी से प्रारंभ किया. 
इसी कालावधि में एटा गुरूकुल के संस्थापक ब्रह्मानंद दण्डी ने इन्हें विशाल चतुर्वेद पारायण महायज्ञ की रूपरेखा तैयार कर सम्पन्न कराने का दायित्व सौंपा. इस यज्ञ की सफलता से स्वामी की पूरे देश के आर्य समाज में प्रतिष्ठा हो गई. कालांतर में आर्य गुरूकुल चित्तौड़ के संस्थापक व संन्यासी मण्डल के अध्यक्ष स्वामी व्रतानंद महाराज के आग्रह पर ये चित्तौड़ आ गए और यहां की व्यवस्था संभाली. गुरूकुल का संविधान भी इनके द्वारा ही तैयार कराया गया. तत्पश्चात् उसके मन में वनवासी क्षेत्र में जाकर कार्य करने की इच्छा जाग्रत हुई तो वे प्रतापगढ़ आ गए. यहां आकर उन्होंने आदिवासियों की बदहाल जिन्दगी का अध्ययन किया और उनके हालात को देखकर उनके उत्थान में अपनी सम्पूर्ण शक्ति झोंक दी. प्रतापगढ़ के पास धमोतर में उन्होंने एक पाठशाला स्थापित करके आदिवासी बालकों की शिक्षा प्रारंभ की. सन् 1950 में उन्हें शंकरलाल व्यास के माध्यम से ध्यान में आया कि बांसवाड़ा जिले में भोले आदिवासियों को बहलाकर धर्मान्तरण कराने के लिए अनेक केन्द्र स्थापित किए जा चुके हैं. इस पर विचार करते हुए उन्होंने अपने कार्य का विस्तार करते हुए बांसवाड़ा जिले को भी चुना. 
यहां आकर आपने एक भवन किराए पर लिया व आदिवासी छात्रों का एक छात्रावास प्रारंभ किया. बाद में नगर पालिका के सहयोग से चार बीघा भूमि प्राप्त कर दयानंद सेवाश्रम का संचालन प्रारंभ किया. तब से अब तक हजारों आदिवासी बालकों ने यहां से शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन का निर्माण किया है. स्वामी स्वतंत्रानंद ने आदिवासियों के टापरे-टापरे में जाकर धार्मिक अलख जगाई. वे उनके घरों पर मक्का की सूखी रोटी, मिर्ची, प्याज के साथ खाकर गुजारा कर लेते थे, किन्तु उन्हें वेदधर्म का मर्म समझाते हुए धर्मान्तरित बंधुओं को पुन: स्वधर्म में दीक्षित करते थे. इसके अलावा बांसवाड़ा में भी साप्ताहिक सत्संग प्रारंभ किया गया. स्वामी उस सत्संग में वेदों पर प्रवचन करते व आदिवासियों के धर्मान्तरण के कुत्सित प्रयासों से भी अवगत कराते थे. स्वामी की प्रेरणा से बांसवाड़ा में कस्टम रोड़ पर एक वेद मन्दिर बना. यह सभी का सतत प्रेरणा का केन्द्र है. 
स्वामी स्वतंत्रानंद महाराज एक अनुकरणीय व्यक्तित्व के निराले संत थे. उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र बांसवाड़ा रहा है. इस क्षेत्र के आदिवासियों में फैले अंधविश्वासों, टोने-टोटकों व कुरीतियों से मुक्त कराने उन्होंने हेतु खूब प्रयास किए. इनके विकल्प के रूप में संस्कार व शिक्षा को उन्होंने परिवर्तन का आधार बनाया. उनके सुधारवादी, उन्नत व संघर्षमय दृष्टिकोण यद्यपि कठिन था किन्तु वे तो कर्मवीर थे, धर्मवीर थे, सामाजिक योद्धा थे, इसलिए... उनके सामने सफलताओं को स्वंय प्रकट होना पड़ा था! 
आज भी अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने वागड़ का नाम रोशन किया है, वे सभी स्वामी के प्रयासों से खड़े हुए हैं. उन्हे समय-समय पर विरोध भी सहना पड़ा परन्तु उनका दृष्टिकोण इतना स्पष्ट और पारदर्शी था कि अंततोगत्वा सभी उन्हें समझकर सहयोग करने लगते थे. 
स्वामी 92 वर्ष की अवस्था में 16 अगस्त 2003 को अनंत में विलीन हो गए. उनके द्वारा स्थापित चेतना केन्द्र व आश्रम आज भी उनके अनुयाइयों द्वारा संचालित करके उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति की जा रही है. 
उनके महाप्रयाण से पूरे वागड़ में शोक की लहर फैल गई थी. सभी ने भावभीनी श्रद्धांजलि देते हुए माना कि गोविन्द गुरू, चिमनलाल मालोत, मामा बालेश्वरदयाल, हरिदेव जोशी, स्वामी रामानंद, भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी जैसे नामों की शृंखला में स्वामी स्वतंत्रानंद का भी नाम जुड़ गया है. वागड़ के विकास में उनका योगदान सदियों तक स्मरण किया जाएगा!


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