विरले ही ऐसे राजनेता होते हैं जो अपने जीवनकाल में राजनीति के स्वर्णिम अध्याय के रुप में स्थापित हो जाते हैं. ऐसे ही राजनेता के रुप में हम सोमनाथ चटर्जी को स्मरण करें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. सोमनाथ चटर्जी वास्तव में वामपंथी राजनीति के स्वर्णिम अध्याय ही थे. उनका अवसान वामपंथी राजनीति के उच्चतम अध्याय का अंत ही माना जाना चाहिए. वामपंथी धारा के होने के कारण वे भले ही आलोचनाओं की परिधि में आते रहे होंगे, लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन इन आलोचनाओं की परिधि से बहुत दूर था. सोमनाथ चटर्जी का पूरा जीवन राजनीतिक सिद्धांतों के अनुरुप ही था, वे किसी से मतभेद तो रख सकते थे, लेकिन मन में किसी भी प्रकार का भेद नहीं पालते थे. 
देश के वरिष्ठ वामपंथी राजनीतिज्ञ और लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी देवलोक गमन कर गए. वामपंथी दलों के नेता देश में यूं तो कुछ ही राज्यों तक सीमित रहे, लेकिन कुछ नेता ऐसे भी थे, जिनका कद राज्य तक नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपने आप ही स्थापित हो जाता है. 89 वर्षीय सोमनाथ चटर्जी की पहचान भले ही वामपंथी राजनेता की रही, लेकिन उनका व्यवहार दलीय भावना से बहुत ऊपर ही था, इसीलिए वे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ समान व्यवहार के लिए जाने जाते थे. उनकी यही विशेषता उन्हें आज की राजनीति में भी अलग दर्जा देने के लिए पर्याप्त थी.
लोकप्रियता के मामले में सोमनाथ चटर्जी देश में शिखर पर गिने जाने वाले राजनेताओं में से एक थे. इसीलिए वे एक दो या तीन बार नहीं, बल्कि दस बार सांसद के तौर पर चुने जाते रहे. सोमनाथ चटर्जी के बारे में अन्य दलों नेताओं से तुलना करने पर यही दिखाई देता है कि कांगे्रस में जो स्थान इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री और भाजपा में जो स्थान अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी का रहा है, वही स्थान वामपंथी दल माकपा में सोमनाथ चटर्जी का रहा है. यही कारण था कि वे देश के शिखर पर पहुंचे राजनेताओं की श्रेणी में गिने जाते थे. वे निसंदेह आदर्श राजनेता थे, और इसी के चलते उन्हें लोकसभा अध्यक्ष पद के योग्य समझा गया. इतना ही नहीं कांगे्रस ने तो सोमनाथ चटर्जी को राष्ट्रपति पद पर बैठाने की तैयारी भी कर ली थी, लेकिन माकपा नेताओं की असहमति के बाद यह तैयारी ठंडे बस्ते में चली गई.
सोमनाथ चटर्जी जिस पद पर भी रहे, उन्होंने उस पद के अनुसार ही व्यवहार किया. उन्होंने ऐसे व्यवहार करने के लिए दलीय निष्ठाओं का का विस्मरण कर दिया, यानी सीधे शब्दों में कहा जाए तो वे वामपंथी राजनीतिज्ञ होते हुए भी लोकसभा अध्यक्ष के कार्यकाल के दौरान विचारधारा से दूर ही रहे. हालांकि वे वामपंथी धारा के वटवृक्ष माने जाते हैं, लेकिन जब उनकी पार्टी ने केन्द्र सरकार से समर्थन से समर्थन वापस लिया तो दलीय निश्ठाओं से दूर हो गए. 2008 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौता किया तो माकपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और उनकी पार्टी ने चटर्जी से लोकसभा अध्यक्ष का पद छोड़ने को कहा, लेकिन चटर्जी ने यह कहते हुए पद से हटने से इंकार कर दिया था कि लोकसभा अध्यक्ष के रूप में वह किसी पार्टी के साथ नहीं है. उसके बाद माकपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था. माकपा से निष्कासित किए जाने की घटना को उन्होंने अपनी जिंदगी का सबसे बुरा दिन बताया था. साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में लोकसभा अध्यक्ष को अपने दलों से इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि वह गैर-पक्षपातपूर्ण छवि बनाए रखने में कामयाब हो सके. कैसा अद्भुत राजनीतिक चिंतन था सोमनाथ चटर्जी का. वर्तमान में ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है कि एक राजनेता राष्ट्रपति या लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद दलीय निष्ठाओं को तिलांजलि देकर निष्पक्ष भाव से काम कर सके. हालांकि यह केवल अपवाद के रुप में है. सोमनाथ चटर्जी जैसे राजनेता हमेशा राजनीति के आदर्श रहे हैं और भविष्य की राजनीति के लिए भी आदर्श राजनीति के अनुपम उदाहरण के रुप में जीवित रहेंगे.
माकपा से निष्कासित किए जाने के बाद पिछले 10 साल से वह राजनीति से अलग ही रहे, लेकिन यह सच है कि राजनीति में रहते हुए वह जिन सिद्धांतों पर चले, उनका निर्वाह पूरे जीवन भर किया. लोकसभा अध्यक्ष पर रहते हुए माकपा भले ही उनको अपना मानती रही, लेकिन उन्होंने अपने पद के साथ न्याय किया. यह सही है कि किसी दलीय नेता के लोकसभा अध्यक्ष पद पर बैठने के बाद वह किसी भी राजनीतिक दल का नेता नहीं होता. वह सभी लोकसभा सदस्यों का मुखिया ही होता है. इसमें केवल वामपंथ नहीं था. वर्तमान में ऐसे राजनेता बहुत ही कम देखने को मिलते हैं, लेकिन सोमनाथ चटर्जी ने राजनीति में भी एक उच्चतम आदर्श स्थापित किया. सोमनाथ चटर्जी ने राजनीति में कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और संसदीय लोकतंत्र की मजबूती उनकी पहली प्राथमिकता रही.
25 जुलाई 1929 को असम के तेजपुर में जन्मे चटर्जी ने जीसस कालेज से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की. राजनीति में प्रवेश से पूर्व वह कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता के रूप में सेवा करते रहे. 1968 में वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए. पहली बार उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप माकपा के सहयोग से लोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद निर्वाचित हुए. चटर्जी ने नौ बार चुनाव जीता, हालांकि 1984 में जाधवुर संसदीय सीट से सुश्री ममता बनर्जी के हाथों चुनाव हार गये. 1989 से 2004 तक वह लोकसभा में अपनी पार्टी के नेता रहे. वह बतौर सांसद दसवीं बार 2004 में बोलपुर संसदीय सीट से निर्वाचित हुए. चार जून 2004 में चटर्जी सर्वसम्मति से 14वीं लोकसभा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और 2009 तक इस पद पर रहे.
वामपंथ का विचार वर्तमान में भले ही देश में सिमटता जा रहा हो, लेकिन सोमनाथ चटर्जी जैसे राजनेता लम्बे समय तक याद किए जाते रहेंगे. वे वर्तमान राजनीतिक कार्यप्रणाली से कोसों दूर ही रहते थे. आज देश में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है, वह पूरी तरह से असैद्धांतिक ही कही जाएगी. आज की राजनीति में मतभेद भी हैं तो मतभेद भी हैं. अच्छे को अच्छा कहने की प्रणाली पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है. केवल बुरा देखने की राजनीति विकसित होती जा रही है. यह बुरा देखने की राजनीति करने वालों को सोमनाथ चटर्जी के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए. तभी देश का उद्धार हो सकेगा.


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