भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का नाम आते ही मन से अनायास ही सम्मान का भाव प्रकट हो ही जाता है. और ऐसा होना भी चाहिए. क्योंकि तिरंगा हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने के साथ ही पूरा देश राष्ट्रभक्ति के सागर में गोता लगाता हुआ दिखाई देता है. केवल सरकारें ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर संस्थाओं द्वारा तिरंगा फहराने के कार्यक्रम किए जाते हैं, जो भारत भक्ति का साक्षात्कार कराते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन जब अपने देश का प्रशासन तिरंगा फहराने की कार्यवाही के लिए अवरोध का काम करने लगे तो स्वाभाविक रुप से सवाल उठता है कि अपने ही देश में तिरंगा फहराने से क्यों रोका जा रहा है. जी हां कश्मीर में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने में आया है. जहां शिवसेना के सदस्यों को श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहराने से वहां के प्रशासन ने रोका है. इतना ही नहीं तिरंगा फहराने जा रहे शिवसेना के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया. वास्तव में भारत में सम्मान के साथ तिरंगा फहराना कोई अपराध नहीं है और राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रदर्शित करने वाला कोई भी कार्य अपराध की श्रेणी में आ भी नहीं सकता. हां यह जरुर है कि राष्ट्रीय सम्मान को प्रदर्शित करने वाले किसी भी कार्यक्रम को राकने की कार्यवाही निश्चित रुप से राष्ट्र विरोधी गतिविधि का हिस्सा ही माना जाएगा, जो जम्मू कश्मीर की सरकार की ओर से किया गया है. जम्मू कश्मीर में श्रीनगर के लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की योजना इसलिए बनाई थी कि अभी कुछ दिन पूर्व जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और विवादित नेता फारुक अब्दुल्ला ने केन्द्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा था कि केन्द्र सरकार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में तिरंगा फहराने के बजाय श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराकर दिखाए. ऐसी चुनौती अगर पाकिस्तान और आतंकवादियों की तरफ से दी जाती तो बात समझ में आती है, क्योंकि वे तो भारत के दुश्मन हैं, इसके विपरीत यह चुनौती भारत के ही एक जिम्मेदार नेता द्वारा दी जाए तो उनकी राष्ट्रभक्ति पर कई प्रकार के सवाल खड़े होते हैं. पहला तो यह कि वह सीधे तौर पर भारत की अपनी ही सरकार को चुनौती दे रहे हैं. दूसरा यह कि यह चुनौती राष्ट्रीय ध्वज को फहराने को लेकर है. हम यह भी जानते हैं कि फारुक अब्दुल्ला ने कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जो सीधे तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करने जैसे ही लगते हैं. अलगाववादी नेताओं से उनके सीधे संबंध हैं. इसलिए यह कहा जा सकता है कि फारुक अब्दुल्ला जाने अनजाने में जो भाषा बोल रहे हैं, वह प्रथम दृष्टया अराष्ट्रीयता का ही प्रदर्शन करते हुए दिखाई देते हैं. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बारे में फारुक अब्दुल्ला ने कहा था कि पीओके किसी के बाप का नहीं है, वह भारत का हिस्सा कभी नहीं बन सकता. कुछ ऐसी ही भाषा पाकिस्तान परस्त आतंकी भी बोलते आए हैं. तो क्या यही समझा जाए जाए कि फारुक अब्दुल्ला पूरी तरह से पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं. अगर वह पाकिस्तान परस्ती भाषा बोल रहे हैं तो उनकी राष्ट्रीयता निष्ठा पर सवाल उठना जायज है. वास्तव में होना यह चाहिए कि केन्द्र सरकार से पहले फारुक अब्दुल्ला को ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज फहरा देना चाहिए, क्योंकि वह अपने आपको भारतीय मानते हैं. ऐसा उन्होंने एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में भी कहा था. इस साक्षात्कार में उन्होंने टीवी एंकर पुण्यप्रसून वाजपेयी को बुरी तरह से लताड़ते हुए उनकी बोलती बंद कर दी थी.


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