वर्तमान देश में चुनाव के लिए कदम उठाए जाने लगे हैं. वैसे तो देश में जब से प्रधानमंत्री के रुप में नरेन्द्र मोदी पदासीन हुए हैं, तब से ही देश में कुछ नया होने लगा है. वास्तव में आर्थिक विषमताओं को समाप्त करने के लिए सरकार हर कदम उठा रही है, इसके साथ ही चुनाव आयोग ने भी संकेत दिए हैं. अत्याधिक खर्चीले होते जा रहे चुनाव को नियंत्रित किया जाए, इसीलिए चुनाव आयोग ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है. हालांकि दोनों चुनाव एक साथ कराए जाने की मांग देश में लम्बे समय से की जाती रही है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के चलते यह योजना मूर्त रुप नहीं ले पा रही थी. अब इस पर चर्चा होने लगी है. जैसी आशंकर व्यक्त की जा रही थी, वैसा ही दिखाई दे रहा है. हालांकि कांगे्रस ने अस कदम का स्वागत किया है, लेकिन कांगे्रस ने यह आशंका भी व्यक्त की है कि यह सब केन्द्र सरकार के संकेत पर किया जा रहा होगा. इसके साथ ही वामपंथियों ने एक साथ चुनाव कराने का विरोध किया है, उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग को केन्द्र सरकार ने जरुर कहा होगा कि चुनाव एक साथ कराए जाएं. ऐसे में सवाल यह आता है कि राजनीतिक दल एक साथ चुनाव कराए जाने का विरोध क्यों कर रहे हैं? इसके पीछे जो कारण हो सकते हैं, उसमें एक बात प्रमुखता के साथ सामने आ रही है कि बार-बार चुनाव होने से राजनीतिक दलों को चंदा लेने में आसानी रहती है. इससे राजनेताओं को भी खूब लाभ मिलता है. जो स्वार्थी राजनेता हैं वह एक साथ चुनाव नहीं चाहते, क्योंकि ऐसा होने से उनकी दुकानदारी बंद हो जाएगी. हम जानते हैं कि देश में बार बार चुनाव की प्रक्रिया होने से अत्यधिक व्यय का सामना करना होता है. वर्तमान चुनाव प्रक्रिया भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली सिद्ध हो रही थी. भ्रष्टाचार के कारण पूरा देश परेशान है, इसलिए ऐ साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया भी भ्रष्टाचार को समाप्त करने का एक अभियान ही कहा जाएगा. फिर इसे केन्द्र सरकार प्रारंभ करे या फिर चुनाव आयोग. यह सही है चुनाव की सारी प्रक्रिया के लिए केवल चुनाव आयोग की पूरी जिम्मेदारी होती है. चुनाव आयोग भी इस मुद्दे पर कई सालों से मंथन कर रहा था. अंतत: वर्तमान केन्द्र सरकार भी ऐसे सभी कार्यों का समर्थन कर रही है, जिससे भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए दिशा मिल सके. नोट बंदी और जीएसटी भी केन्द्र सरकार का ऐसा ही कदम माना जा सकता है, लेकिन देश में अच्छी बातों का साथ देने वाले लोगों की कमी है. कुछ लोगों को अच्छे कामों को बिगाड़ने में ही आनंद मिलता है. व्यापारी केन्द्र सरकार के जीएसटी वाले कदम को देश के घातक इसलिए बताने पर तुला हुआ है क्योंकि इससे बेईमानों पर लगाम लग रही है. व्यापारी जीएसटी के नाम पर ग्राहकों को ठग रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है, जीएसटी वास्तव में वास्तव में जनता के हित में उठाया गया कदम ही है. इसी प्रकार चुनाव आयोग द्वारा एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया भी देश सुधार का एक बहुत बड़ा कदम है. हम जानते हैं कि चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने भोपाल में कहा था कि आयोग सितंबर 2018 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम हो जाएगा. चुनाव आयोग अगर 2018 में एक साथ चुनाव करा लेता है तो यह देश की बहुत बड़ी उपलब्धि कही जाएगी. यह बात सही है कि देश के किसी भी हिस्से में लगभग हर साल चुनावी प्रक्रिया दिखाई देती है, इस कारण जो राजनीतिक दल चुनाव में पूरी तरह से भाग लेते हैं, उस दल की सरकार ज्यादातर चुनावों में ही महत्वपूर्ण समय गंवा देती है. इसके चलते देश की अपेक्षाओं पर नकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है. वास्तव सरकारों को पूरे पांच साल तक केवल अपने कार्यों पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन अधिकांश समय केवल चुनावों में ही निकल जाता था. इसलिए सरकारें जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाती थीं. इसलिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होने से स्वाभाविक है कि सरकारों को पूरे पांच साल का समय मिलेगा और देश में विकास कार्य तेजी से होंगे. इसलिए एक साथ चुनाव कराया जाना समय की मांग भी है और जरुरत भी है.
 


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