देश के वीभत्स हत्याकांड के नाम से पहचान बनाने वाला सिख नरसंहार मामला एक बार फिर से सुर्खियों में है. यह सुर्खियां वर्तमान कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी के उस बयान के कारण पैदा हुई हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि सिख हत्याकांड में कांग्रेस का किसी भी प्रकार का हाथ नहीं है. केवल इस प्रकार के बयान देने भर से किसी का हाथ नहीं हो, ऐसा कह पाना संभव नहीं माना जा सकता. यह सही है कि सिखों का नरसंहार केवल इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न हालातों का परिणाम था, यह प्रतिक्रिया किसने की, यह एक अलग सवाल है, लेकिन बिना किसी संलिप्तता के इतना बड़ा हादसा हो ही नहीं सकता. इसलिए भारतीय जनता इस मामले में कांग्रेस को सदैव कठघरे में खड़ा करती रही है. हत्याकांड के बाद कांग्रेस के नामचीन नेताओं के नाम भी सामने आए थे, इन नेताओं को कांग्रेस ने बचाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि वे हमेशा पार्टी और सत्ता के उच्च पदों पर भी विराजमान रहे. इसे क्या कहा जाएगा?
उल्लेखनीय है कि 31 अक्टूबर 1984 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या किए जाने के बाद देशभर में सिख विरोधी दंगा भड़क गए थे, जिसमें आधिकारिक रूप से 2733 सिखों को निशाना बनाया गया. गैर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 3870 थी. दंगों का सबसे अधिक असर दिल्ली, इंदौर और कानपुर पर हुआ. देशभर में सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लगातार हिंसा का निशाना बनाया गया. तीन दिन तक सिखों का नरसंहार चलता रहा. नरसंहार करने वालों को कौन हवा दे रहा था, यह 33 साल बाद भी साफ नहीं हो पाया है, लेकिन जिन कांग्रेस नेताओं पर इन दंगों में शामिल होने के आरोप लगे थे, कांग्रेस ने उनके विरोध में किसी भी प्रकार की कार्रवाई भी नहीं की. क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि सिखों के नरसंहार मामले में कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार रही है. इंदिरा गांधी की हत्या के तुरंत बाद देश की सत्ता संभालने वाले वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की सरकार ने इस जघन्य हत्याकांड को रोकने के लिए किसी भी प्रकार के प्रयास नहीं किए अथवा जो किए थे वह भी नाम मात्र के ही थे. इतना ही नहीं राजीव गांधी ने तो सिख नरसंहार के बारे में यहां तक भी कहा था कि जब कोई मजबूत पेड़ गिरता है तो उसके आसपास की धरती हिलती है यानी राजीव गांधी ने सिख नरसंहार को धरती हिलने का परिणाम बता दिया. राजीव गांधी की बातों से यही लगता है कि उन्होंने सिखों के कत्लेआम को मामूली घटना ही माना था. राजीव गांधी के ऐसे बयानों के कारण ही नरसंहार करने वालों के हौसले बुलंद हो गए और उसके बाद भी मौत का नंगा नाच चलता रहा. सबसे विचारणीय बात तो यह है कि सिखों जिन्दा जलाने वाले लोगों को ऐसा करने के लिए संकेत कौन दे रहा था. इसमें परदे के पीछे किसकी भूमिका थी. आज भले ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सिख दंगों में कांग्रेस का हाथ नहीं होने की वकालत कर रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी को इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि इस मामले में जो भी आरोपी बनाए गए, उनमें अधिकतर कांग्रेस के ही नेता थे. किसी भी मामले में आरोपी तभी बनाया जाता है, जब उसके बारे में मिले सूत्र संकेत करते हैं.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब भले ही यह कह रहे हैं कि सिख दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का गवाह है कि इस हत्याकांड में कांग्रेस की भूमिका के बारे में कांग्रेस के बड़े नेताओं ने ही शामिल होने की एक प्रकार से पुष्टि ही कर दी थी. हम जानते हैं कि सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सरेआम सिख दंगों के लिए कांग्रेस की ओर से आम जनता से माफी मांगी थी. क्या कांग्रेस के प्रमुख नेताओं द्वारा माफी मांगने का यह कृत्य यह संकेत नहीं करता कि सिख दंगों में कांगे्रस का ही हाथ था. वास्तव में माफी वही मांगता है, जिसने गलती की हो, तो क्या सिख दंगा कांग्रेस द्वारा की गई गलती ही थी. सिख दंगा इतना हृदय विदारक था कि इसमें माफी भी नहीं दी जा सकती. राहुल गांधी अगर अब यह कह रहे हैं कि सिख दंगों में कांग्रेस दोषी नहीं हैं तो फिर क्या इस बात का खुलासा करने का प्रयास करेंगे कि इसके लिए वास्तविक दोषी कौन है?
सिख नरसंहार में शामिल लोगों को यह पता था कि केवल सिखों को ही मारना था, यह केवल अनियंत्रित भीड़ का परिणाम नहीं था, क्योंकि अनियंत्रित भीड़ तो किसी को भी मार सकती थी. दिल्ली में इस हत्याकांड का वीभत्स रुप देखने को मिला. कुछ लोगों ने योजना पूर्वक सिख समुदाय की बस्तियों में जाकर उनकी पहचान करनी शुरू कर दी ताकि कोई भी सिख परिवार उनके इस कोप से बच न सके. उस समय सिखों के परिवार को दी गई भयंकर यातनाओं किसी की भी रूह काँप गयी होगी. गर्भवती महिलाओं को पेट के बल लिटाकर उसके ऊपर दंगाई कूदने लगे. जवान लड़कियों के साथ दुष्कर्म किया गया और पुरुषों को टायर का हार डाल कर जला दिया गया. आज उस दृश्य को याद करके हृदय छलनी हो जाता है. रेलवे स्टेशनों के दृश्य याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं.
दंगाई स्पष्ट रुप से किसी के संकेत पर ही काम कर रहे थे, इतना ही नहीं वे लक्ष्य तय करके भी काम कर रहे थे. इसमें प्रमुख भूमिका निभाने का जिन नेताओं पर आरोप लगा था, उनमें कमलनाथ, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के नाम शामिल थे. सिख समुदाय के लोग भी कांग्रेस के नेताओं को दोषी मानते रहे हैं. सिख हत्याकांड में शामिल लोगों को सजा दिलाने के लिए सिखों द्वारा कई बार विरोध प्रदर्शन भी किए गए, लेकिन हर बार सिखों की भावना को कुचलने का काम सरकारों द्वारा किया जाता रहा है. इतना जघन्य कांड होने के बावजूद 33 वर्षों से सिख समुदाय को इंसाफ नहीं मिल पाया है. किसी भी आरोपी को सजा नहीं दी गयी. इसके लिये हर वो सरकार जिम्मेदार है जो केंद्र में शासन कर रही है या कर चुकी है. सिख धर्म का इतिहास हमेशा कुर्बानी के लिये जाना जाता है चाहे हमारे गुरु और उनका परिवार हो चाहे देश की आजादी के लिये किये गये सिखों द्वारा संघर्ष हो.


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