देश में होने वाले चुनावों के दौरान किस प्रकार किया जाता है, यह किसी से छिपा नहीं हैं, लेकिन पारदर्शिता के अभाव में खुला भी नहीं है. हम जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार और अनैतिक तरीके से कराए जाने वाले कार्यों के पीछे चुनाव को भी एक माध्यम बनाया जाने लगा है. चुनाव अनीति पूर्वक कमाए गए धन को खपाने का बेहतर माध्यम बनता जा रहा था. इस सबके कारण देश में यह बुराई पनपने के कारण लोग गलत काम की ओर भी प्रवृत होते जा रहे थे.

लोगों में बढ़ रहे लालचीपन के कारण देश को तो नुकसान हो ही रहा है, साथ ही जनता को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. अनैतिक कमाई करने वालों से प्रतिस्पर्धा करने के कारण आम जनता ऋण के जाल में फंसती जा रही थी, यह जाल ही उसके लिए जंजाल का कारण बन रहा है. इसी के चलते वर्तमान राजनीति का खेल भी एक व्यवसाय की भांति दिखाई देने लगा है. हम यह भी जानते हैं कि कई राजनेताओं ने भ्रष्टाचार करके अपनी आर्थिक स्थिति में कई गुणा वृद्धि की है.
देश के राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त करने वाले चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए लम्बे समय से मांग की जाती रही है. चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाना एक प्रकार से सही कदम भी है, क्योंकि चुनावी चंदे को कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की जननी भी माना जा रहा है. चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने का कदम एक प्रकार से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना ही है. चुनावी चंदे को पारदर्शी और स्वच्छ बनाने के लिए केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है. देश में चुनावी प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा जिस प्रकार के काम किए जाते थे, उन पर कई प्रकार के सवाल उठने लगे थे. इन सवालों के जवाब में अब चुनावी चंदा लेने के लिए सरकार ने नई योजना बनाई है, जिसके अंतर्गत अब चुनावों के लिए आर्थिक सहायता देना आसान नहीं होगा. इसलिए अब अनैतिक धन का व्यय चुनावों में नहीं किया जा सकेगा. वास्तव में देखा जाए तो यही अनैतिक धन ही बहुत बड़ी समस्या का कारण बन रहा था. कोई व्यक्ति चुनाव में अपनी ओर से धन व्यय करता था तो वह व्यक्ति उम्मीदवार का खास बन जाता था, और उसके बाद उसको भरपाई भी चाहिए, जिसके चलते देश में गलत काम को बढ़ावा मिलने लगा.
केन्द्र सरकार के नए नियमों के अनुसार कोई संस्था या व्यक्ति अपने समर्थक राजनीतिक दल को चंदा देना चाहता है तो उसे बैंक के माध्यम से ही देना होगा. इससे निश्चित रुप से उनको बहुत प्रसन्नता हो रही होगी, जो चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने की मांग कर रहे थे. चुनावी चंदा देने के लिए नई प्रक्रिया के तहत भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से कोई व्यक्ति या संस्था एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपये मूल्य के बांड खरीद सकेगी. इन बांडों को खरीदने वालों के लिए अपने बैंक को अपने बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी. हालांकि बांड पर दान देने वाले की पहचान गुप्त रखी जाएगी. चुनावी बांड के माध्यम से केवल उन्हीं राजनीतिक दलों को चंदा दिया जा सकेगा, जो चुनाव आयोग में पंजीकृत हैं और पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम एक प्रतिशत मत प्राप्त कर चुके हैं. इस तरह की योजना से यह माना जा रहा है कि नकदी के रूप में दिए जाने वाले चुनावी चंदे पर रोक लगेगी और कालेधन पर काफी हद तक अंकुश लगेगा. केन्द्र के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वित्त वर्ष 2017-18 के बजट के दौरान संसद में इस योजना को शुरू करने की घोषणा की थी और सरकार अब उसे लागू कर रही है. अब यह योजना कितनी सफल रहती है इसकी असलियत अगले चुनावों में साफ भी हो जाएगी. हम यह भी जानते हैं कि पिछले कुछ सालों से चुनाव खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है और निर्वाचन आयोग के तमाम नियमों के बावजूद राजनीतिक दल अपने खर्च पर अंकुश लगाने की चेष्टा करते दिखाई नहीं देते. उसमें ऐसे कदम की अपेक्षा की जा रही थी. चुनावी खर्च में अंकुश न लग पाने का एक बड़ा कारण चंदे के रूप में कालेधन को छिपाया जाना है. कुछ साल पहले तक राजनीतिक दल लोगों से नकद चंदा लेने और उनकी पहचान छिपाने को स्वतंत्र थीं. इस तरह चंदा देने वाली कंपनियों व कारोबारियों को अपने कालेधन को बड़े पैमाने पर छिपाने में मदद मिलती थी, लेकिन वर्तमान मोदी सरकार ने नकद चंदे पर अंकुश लगाते हुए उसकी सीमा पहले बीस हजार रुपये और फिर उसे घटाकर महज दो हजार रुपये कर दिया था. फिर भी पिछले दिनों हुए चुनावों में राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के खर्च में कहीं कोई कमी दिखाई नहीं दी. इसके अलावा राजनीतिक दलों ने चंदा जुटाने के दूसरे रास्तों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.

ऐसे में यह कहना भी मुश्किल लगता है कि सिर्फ बांड के जरिए चंदा योजना कितनी सफल होगी? राजनीतिक दल तो इसकी जगह कोई और रास्ता निकाल लेंगे. सरकार मान सकती है कि उसका ताजा प्रावधान राजनीतिक दलों और कारपोरेट जगत के गठजोड़ को तोड़ने में बाधक बनेगा. दानकर्ता की बैलेंस शीट में चुनावी बांड का हवाला होगा, लेकिन सवाल यह भी है कि आम जनता को कैसे पता चलेगा कि किसने किस राजनीतिक दल को कितना चंदा दिया? इस दृष्टिकोण से राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता को कैसे स्वीकार किया जाएगा? चुनावी बांड की तरह दूसरे रास्ते से भी आने वाले चंदों को भी पारदर्शी बनाने की जरूरत है.

पार्टियों की आय-व्यय के ब्योरे को भी पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने के उपाय भी होने चाहिए. अन्य कई लोकतांत्रिक देशों में चुनावी चंदे संबंधी अलग-अलग कई प्रावधान हैं. कहीं-कहीं तो चंदे की राशि की सीमाएं निर्धारित हैं. वैसे चुनावी बांड योजना भी पारदर्शिता लाने की एक अच्छी पहल है. कितनी कारगर सिद्ध होगी, यह समय बताएगा. असली बात तो यह है कि राजनीतिक दलों का चरित्र और नीयत बदलनी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होता तब तक अधिक कुछ हाथ लगने वाला नहीं है.
 


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