भारत देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए, लेकिन हमारे देश के नागरिक आज तक यह नहीं जान सके कि वास्तव में स्वतंत्रता कैसी होती है. आज भी देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वतंत्रता के निहितार्थ परिवर्तित करने का दुष्चक्र चलाया जा रहा है. इतना ही देश भाव का प्रकटीकरण करने वाले कार्यों का खुलेआम विरोध किया जा रहा है. इससे सवाल यह आता है कि हम कैसी आजादी चाहते हैं. राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती देने वाले विचारों का उद्घोष करना स्वतंत्रता नहीं कही जा सकती. लेकिन हमारे देश में सुनियोजित षड्यंत्र की तरह इस प्रकार के कारनामों को अंजाम दिया जा रहा है, जो सीधे तौर पर भारत की सांस्कृतिक मर्यादा को तार तार करता हुआ दिखाई दे रहा है.
महात्मा गांधी ने कहा था कि मैं एक ऐसे भारत का निर्माण करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह अनुभव करे कि यह उनका देश है, जहां ऊंचनीच का भाव न हो, सांप्रदायिकता का कोई स्थान न हो तथा गौहत्या पाप हो. लेकिन वर्तमान में हमारे देश में क्या हो रहा है, यह हम खुली आंख से देख रहे हैं. महात्मा गांधी के सपनों के भारत को चूर चूर किया जा रहा है. हम यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि महापुरुषों के विचारों से दिशा मिलती मिलती है, महात्मा गांधी के विचार आज भी भारत का जीवंत दर्शन कराते हुए दिखाई देते हैं. गांधी के नाम पर लम्बे समय तक सत्ता सुख भोगने वाली कांगे्रस ने गांधी जी के विचारों की हत्या की है. वर्तमान में कांगे्रस के दर्शन में गांधी जी कहीं भी दिखाई नहीं देते. कांगे्रस ने सरेआम तुष्टिकरण का खेल खेला. कांगे्रस ने सरेआम गौमाता को काटकर खाया और गरीब की तो कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है. क्या यही स्वतंत्रता के मायने हैं?
वर्तमान में आजादी के वास्तविक दीवानों के नाम हम भूलते जा रहे हैं. आज कौन जानता है हमारे लिए फांसी पर चढ़ने वाले जवानों को. उनका इतिहास तक गायब कर दिया गया. इतिहास के नाम पर केवल एक ही परिवार के नाम पढ़ने को मिलते हैं. क्या यही हमारी आजादी का इतिहास है. आज कहीं कहीं यह भी सुनाई देता है कि आजादी के नायकों के नाम में भी चालाकी भरा खेल खेला गया. वास्तविकता सामने आती तो संभवत: आज भारत सच्चा भारत दिखाई देता. लेकिन आज तो हमारा देश इंडिया बन रहा है. जो इंडिया नाम को पसंद करते हैं, वह आज भी अंगे्रजों की मानसिक गुलामी का शिकार हैं. समाज में फूट पैदा करके ही उन्होंने देश में सत्ता का संचालन किया है. उनके मन में भारत के बहुसंख्यक समाज के प्रति हीन भावना है. क्या यही स्वतंत्रता है? सवाल यह आता है कि हमारे महापुरुषों ने जैसा भारत बनाने की कल्पना की थी, क्या वैसा देश बन रहा है. इसका उत्तर नहीं में ही होगा. गुलामी के पदचाप आज भी देश में दिखाई देते हैं. कहीं खंडहर के रुप में तो कहीं मंदिर तोड़कर बनाई गई इमारतों के रुप में. सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करके एक पहल जरुर की थी, लेकिन बाद में यह अभियान भी रुक गया. हम जानते हैं कि गुलामी के कालखंड में मुगलों ने अंगे्रजों ने हमारे शहरों के नाम बदल दिए, रेलवे स्टेशनों की पहचान बदल गई. वाह रे हमारा देश इन नामों का भारतीयकरण करने पर राजनीति की जा रही है. क्या यही हमारी आजादी है.
वर्तमान में भारत में ऐसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए तो समर्थक मिल जाते हैं, जो सरेआम देश के टुकड़े करने का वातावरण तैयार करते हैं. कश्मीर में देश पर मर मिटने वाली सेना पर पत्थर बरसाए जाते हैं. पत्थरबाजों को मानवाधिकार के नाम पर बचाने का खेल खेला जाता है. इतना ही नहीं केरल में संघ कार्यकर्ताओं की सरेआम हत्या करने वालों को राजनीतिक संरक्षण मिलना आम बात होती जा रही है. आजकल ऐसे ही असामाजिक तत्वों को ही वास्तविक आजादी मिली है. देश के मानबिन्दुओं की रक्षा की खातिर जीवन जीने वाले नागरिकों को परेशान किया जा रहा है. क्या इसी को आजादी कहते हैं.
आज हम स्पष्ट रुप से देखते हैं कि स्वतंत्रता केवल आलीशान कोठी के मालिकों के यहां कैद होकर रह गई है. इन्हें सारे काम करने की पूरी छूट है. झूठ के सहारे राजनीति करने वाले नेताओं ने केवल अपनी तिजोरियां भरने का काम किया है. देश का गरीब तो आज भी परतंत्रता के साए में जीवन जीने को विवश हो रहा है. वह आज भी आजादी का मतलब नहीं जानता. उसकी रोजी रोटी केवल संपन्न परिवारों से चल रही है. इन परिवारों को दो वक्त की रोटी कैसे मिलती है, उसको यही जानते हैं.
वास्तव में भारत को आजादी मिलने के बाद जैसा बनना चाहिए था, वैसा नहीं बन सका. इसके लिए पहले हमें भारत का मूल क्या है, इसका अध्ययन करना होगा. हम अगर मूल की स्थापना नहीं कर पाएंगे तो भारत कैसा? वास्तविकता यह भी है कि आज हमारे नीति निर्धारकों को भी यह नहीं मालूम कि भारत क्या है? वास्तविक भारत का अध्ययन करना है तो हमें अंग्रेजों और मुगलों के कालखंड से पूर्व जाना होगा, क्योंकि वही भारत है. मुगल और अंगे्रजों ने अपने हिसाब से भारत को बदला और इतना बदल दिया कि भारत केवल इंडिया बनकर रह गया. आज जो भारत हमें दिखाई देता है, वह इंडिया का ही स्वरुप है. चलो हम इतने में ही मान लेते हैं, लेकिन इंडिया को भारत तो बनाना ही होगा. तभी हमारी आजादी की सार्थकता कही जाएगी.
 


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