वर्तमान में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का अध्ययन किया जाए तो यह बात सहज ही ध्यान में आती है कि देश में राजनीतिक कारणों से राष्ट्रीय भाव के प्रवाह को रोकने का लम्बे समय से कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. जब इसमें सुधार की गुंजाइश समाप्त होने का भ्रमित वातावरण बन जाता है, तब यह आम जन में अविश्वास का कारण भी बन जाता है. इसी कारण से नकारात्मकता के विनाशवादी प्रवाह के चलते भारतीय समाज ने भी राष्ट्रीय धारा से अपने आपको बहुत दूर कर लिया था. देश भाव के साथ जीवन जीने वाले व्यक्तियों के समक्ष यह बहुत बड़ी चिन्ता थी कि इसी प्रकार से भारतीय जनमानस राष्ट्र की मुख्य धारा से दूर होता जाएगा तो देश का भविष्य क्या होगा.

राष्ट्रीय कार्य के प्रति निरंतर आती जा रही यह उदासीनता मानस को प्रतिकूल स्थिति में खड़ा करने के लिए प्रवृत कर रही थी. बदले में कुछ मिलने की समाज की मानसिकता ने राष्ट्र कार्य में स्वप्रेरित भाव से काम करने वाले व्यक्तियों में संकुचन की स्थिति का प्रादुर्भाव पैदा किया. इस भाव के विस्तार से वे शक्तियां निश्चित ही प्रसन्न हो रहीं थीं, जो भारत के सांस्कृतिक उत्थान के विरोध में कार्य कर रहे थे. कभी रोहित वेमुला के नाम पर जातिवाद का जहर बोया जा रहा था, तो कहीं देश के टुकड़े करने वाले स्वर खुलेआम सुनाई दे रहे थे. यहां प्रथम सवाल यही था कि इस प्रकार के भाव को समर्थन देने वाले कौन थे? इसके उत्तर भी सभी ने खुली आंखों से देखे. राजनीतिक दल के दिशाहीन नेता भी उनके साथ खड़े होते हुए दिखाई दिए. यहां तक कि भारतीय प्रचार तंत्र भी इनके स्वर को प्रधानता देने का काम कर रहा था. प्रचार माध्यमों की नकारात्मक कार्य प्रणाली ही देश की जनता के समक्ष कई प्रकार के सवालों को जन्म देने का काम कर रही थी.

कई प्रचार माध्यम आज भी भारतीय संस्कृति के विरोध को ही प्रधानता दे रहे हैं. इसके अलावा वर्तमान का बहुत बड़ा सत्य यह भी है कि प्रचार तंत्रों को यह बात अच्छी प्रकार से समझ में आ चुकी है कि जो भी पत्रकारिता देश के मूल भाव को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है, उसे भले ही भटके हुए लोगों का समर्थन प्राप्त हो जाए, लेकिन देश के बहुत बड़े वर्ग से दूर हो जाता है. प्रचार माध्यमों में जनता से दूर होने के भय ने आज स्थितियां परिवर्तित हुर्इं हैं. बहुत से समाचार पत्रों ने जन भावनाओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय मूल को सुरक्षित रखते हुए पत्रकारिता करना प्रारंभ कर दी है. जो भारत के लिए एक अच्छी स्थिति कही जा सकती है. हम यह भी जानते हैं कि वर्तमान में जो भी नए चैनल प्रारंभ हो रहे हैं, वे इंडिया नाम को महत्व न देकर भारत और हिन्दुस्तान नामों को प्रधानता दे रहे हैं.
यह बात सही है कि आज देश में जनमानस में सुप्त राष्ट्रीय भाव जाग्रत हो रहा है. भारत की सनातनी पहचान फिर से अपने स्वरुप में लौट रही है. आज समाज भी इस सच को स्वीकार करने लगा है कि विदेश में रहने वाले नागरिकों के मन में अपने देश के प्रति बहुत ज्यादा लगाव होता है. वे अपने मूल संस्कारों के साथ जीना पसंद करते हैं. इसी प्रकार का बोध भारत में भी हो रहा है. भारत का युवा ही नहीं बल्कि राजनीतिक दल भी राष्ट्रीय भावना को प्रधानता देने का काम कर रहे हैं. इस कार्य में सामाजिक प्रचार तंत्र यानी सोशल मीडिया ने जो सक्रियता दिखाई है, वह भारतीयता को प्रकट करने वाली है. यह भाव आज पराकाष्ठा की ओर कदम बढ़ाता हुआ दिखाई दे रहा है. इतना ही नहीं आज देश के विद्युतीय प्रचार तंत्र के साथ ही समाचार पत्र जगत ने इस सामाजिक प्रचार तंत्र द्वारा जगाई जा रही अलख को रेखांकित किया है. इसी के चलते कई प्रचार तंत्रों ने सोशल मीडिया को भी अपने समाचारों का हिस्सा बनाया है. देश का प्रचार तंत्र भी इस बात का चिन्तन करने लगा है कि भारत की जनता क्या चाहती है.

राष्ट्रीय भाव और अराष्ट्रीय भाव के बीच विमर्श का वातावरण बनता हुआ दिखाई दे रहा है. निष्कर्ष यही सामने आ रहा है कि जहां जनता राष्ट्रीय भाव का जागरण चाह रही है, वहीं प्रचार तंत्र भी इस राष्ट्रीय कार्य में शामिल होना चाह रहा है. इसके पीछे भले ही प्रचार तंत्रों की टीआरपी बढ़ाने वाली मजबूरी हो, लेकिन यह सत्य है कि कोई भी देश अपने अतीत को भुलाकर और नई राह पर कदम बढ़ाकर अपना विकास नहीं कर सकता. इसीलिए मीडिया जगत को भारत के स्वभाव को देखते हुए अपना समाचार प्रस्तुत करना चाहिए और वे इस ओर प्रवृत भी हो रहे हैं.
कहा जाता है कि जो लेखन राष्ट्रवाद की धारा को रोकने का काम करता है, ऐसे लेखन से देश में भ्रांति पैदा होती है. पहले यह जानने की आवश्यकता है कि राष्ट्रवाद है क्या? वास्तव में देश के आदर्श पहचान केन्द्र और संस्कार देने वाले मानबिन्दुओं जिस धारा का प्रवाह निकलता है, वही राष्ट्रवाद है. हमारे यहां ग्रंथों में राष्ट्र को जीवंत ईकाई माना गया है. यह पुण्य भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं. यह भाव पुरातन काल से चला आ रहा स्थायी भाव है. हम यह भी जानते हैं कि अंतत: सत्य की विजय होती है. 
हम यह भली भांति जानते हैं कि पूर्व की सरकारों से संरक्षित रहे कुछ मीडिया जगत केवल उन्हीं बातों को ही अपनी खबरों का हिस्सा बनाती थी, जो सरकार को अच्छी लगती थी. सरकार से चिपके रहने वाले मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत विरोधी समाचारों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया. हो सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गलत परिभाषा रचने वाले लोगों का समर्थन उन्हें मिला हो, लेकिन सत्य तो यह है कि राष्ट्रीय क्षति पहुंचाने वाले विचारों की प्रस्तुति कभी भी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति नहीं मानी जा सकती. ऐसे प्रस्तुतीकरण को सीधे शब्दों में राष्ट्रद्रोह ही कहा जाएगा. राष्ट्रद्रोही मानसिकता का प्रदर्शन करने वाले लोगों को राजनीति दलों के साथ ही प्रचार माध्यमों का भी समर्थन मिला, लेकिन जिस प्रकार से सोशल मीडिया पर भारत की जनता ने इनके विरोध में अपनी भड़ास का प्रदर्शन किया, उससे यही कहा जा सकता है कि भारत में राष्ट्र के प्रति चैतन्य हिलोरें ले रहा है. वह चाहे पाकिस्तान का मामला हो या फिर चीन का मामला हो, हर जगह सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण हो रहा है.
वास्तव में पत्रकारिता का स्वरुप क्या होना चाहिए, इसका अध्ययन करने की आज बहुत जरुरत है. यही गलत राह पर जाने वाली पत्रकारिता को सही दिशा का बोध करा सकती है. इसके लिए हमें महर्षि नारद, पंडित मदनमोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, आचार्य चाणक्य, डॉ. हेडगेवार, लाला लाजपत राय, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसों संघर्ष मय जीवन जीने वालों की पत्रकारिता का अनुसरण करना होगा. तभी हम देश के साथ न्याय कर सकेंगे.


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