कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं. परिणामों ने जो तस्वीर  दिखाई है, उसमें देश में लगातार बढ़ती जा रही भाजपा सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभर कर आई है. इसे भाजपा के लिए दक्षिण में प्रवेश करने के लिए दरवाजा भी माना जा सकता है. हालांकि परिणामों ने त्रिशंकु विधानसभा बनाकर एक बार फिर से राजनीतिक पेंच  उत्पन्न कर दिया है. अब राज्यपाल को तय करना है कि वह किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं. परिणामों के बाद राज्य में नए समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं, दूसरे नंबर पर रहने वाली कांग्रेस पार्टी ने देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर से हाथ मिलाने के संकेत देकर देश के राजनीतिक वातावरण में हलचल पैदा कर दी है.

इसके बाद कर्नाटक में बनने वाली सरकार को लेकर जबरदस्त मंथन चल रहा है.
परिणामों के तुरंत बाद कांग्रेस और जनता दल एस ने सरकार बनाने के लिए जिस प्रकार की सक्रियता दिखाई, वह दोनों दलों की सत्ता का भूख को ही उजागर कर रहा है. हालांकि बाद में सरकार बनाने के लिए कांगे्रस की ओर से बुलाई गई विधायक दल की बैठक में विद्रोह होने के बाद एक बार फिर से पेच पैदा हो रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्यपाल कांगे्रस के विधायकों की परेड कराने को कहेंगे तो कांग्रेस पूरे विधायकों को बुला पाएगी या नहीं. क्योंकि कांगे्रस की बैठक में 25 विधायक शामिल ही नहीं हुए. यही हाल जनता दल एस में भी दिखाई दे रहा है. दोनों दलों के विधायक समर्थन देने व लेने से नाराज है. किसी को कांग्रेस नहीं सुहा रही तो किसी को जनता दल उस अच्छी नहीं लग रही. यानी इसका मतलब भी साफ है कि यह पूरी तरह से असैद्धांतिक गठबंधन है, स्वार्थ का गठबंधन है.
विधानसभा के परिणामों से साफ हो गया है कि इस विधानसभा के चुनाव में प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को पूरी तरह से नकार दिया है और भारतीय जनता पार्टी ने प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए प्रथम स्थान प्राप्त किया है. इन परिणामों के बाद राज्य में जो राजनीतिक हालात बने हैं, वह निश्चित रुप से इस बात का संकेत कर रहा है कि इसमें सत्ता के स्वार्थी राजनीतिक दल भी अपनी संभावनाएं तलाशने लगे हैं. मतगणना के दिन सुबह से जो रुझान मिल रहे थे, उसमें भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बताई जा रही थी, भाजपा के कार्यालय पर परिणामों की खुशी भी देखी गई, लेकिन जैसे-जैसे समय निकलता गया, वैसे ही स्थितियों में परिवर्तन होता गया. इस परिवर्तन के चलते कांग्रेस के नेता एक बार फिर सेक्युलर राजनीति का राग अलापने लगे.

कर्नाटक के जनादेश में यह तो स्पष्ट है कि जनता ने सेक्युलरिज्म की राजनीति करने वाले दलों को पूरी तरह से नकार दिया है. कर्नाटक की जनता ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी बनाया है, यानी मतलब भी साफ है कि जनता ने भाजपा को सर्वाधिक पसंद किया है. वर्तमान स्थिति का राजनीतिक अध्ययन किया जाए तो यही दिखाई देता है कि जनसमर्थन कांग्रेस के विरोध में है. लेकिन सीटों की संख्या के आधार पर कांग्रेस ने अवसर का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास किया है.
परिणामों के बाद कांग्रेस ने जिस प्रकार से जनादेश को अपमानित करने का खेल खेला है, वह शत-प्रतिशत लोकतंत्र के लिए गहरा धब्बा ही अंकित करता दिखाई दे रहा है. कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए उस जनता दल एस को समर्थन देने की घोषणा की है, जिसके विरुद्ध कांगे्रस ने चुनाव लड़ा, इतना ही नहीं जब चुनावों के रुझान आ रहे थे, तब जनता दल के एक नेता ने तो यहां तक कह दिया था कि हम किसी भी हालत में कांग्रेस को समर्थन नहीं देंगे, क्योंकि कांग्रेस ने हमारी पार्टी को समाप्त करने का काम किया है. बाद में जनता दल एस के नेताओं के सामने अपने दलीय हित आड़े आए और उन्होंने कांग्रेस से समर्थन लेने की बात को स्वीकार कर लिया. इसे क्या सैद्धांतिक राजनीति की श्रेणी में लाया जा सकता है? कदाचित नहीं. क्योंकि सभी राजनीतिक दलों के कोई न कोई सिद्धांत होते हैं. यह सिद्धांत कर्नाटक में पूरी तरह से परिणामों के बाद धराशायी होते नजर आए. राजनीतिक चिंतकों का कहना है कि विधानसभा चुनाव से पूर्व हुए गठबंधन की संयुक्त संख्या अगर बहुमत का आंकड़ा प्राप्त करता है तो वह संवैधानिक रुप से सरकार बनाने के लिए उपयुक्त होता, लेकिन कांग्रेस और जनतादल एस का अभी बना गठबंधन पूरी तरह से अवसरवादी ही है, यह केवल भाजपा को रोकने के लिए ही हुआ है.
विधानसभा चुनाव परिणाम से एक बात यह भी स्पष्ट हो गई है कि जनता का झुकाव राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की ओर बढ़ता जा रहा है.

यह भी माना जा रहा है कि प्रदेश की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर जो विभाजनकारी खेल खेला, वह कांग्रेस के लिए विनाशकारी साबित हुआ. समाज के विभाजन करने वाली नीति को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया. इसके अलावा कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के बड़बोले बयानों ने भी कांग्रेस को हराने में प्रमुख भूमिका निभाई. खैर... आज सबसे बड़ी बात यह है कि देश का समाज राष्ट्र की चिंता भी करने लगा है. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इसी प्रकार की राजनीति करने के लिए ही जाने जाते हैं.
यहां यह बात चिंतन करने वाली कि कांग्रेस और जनता दल एस को चुनाव से पूर्व कोई गठबंधन नहीं था, इसी कारण दोनों दल मिलकर सरकार बनाएं, इसमें रुकावट भी पैदा हो सकती है, हालांकि इसका निर्णय राज्यपाल को ही लेना है कि वह किसको सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें. अगर स्वस्थ लोकतंत्र की बात की जाए तो स्वाभाविक है कि राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी के रुप में स्वीकारी गई भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें. लेकिन देश में विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है, वह भाजपा को रोकने के नाम पर एक हौव्वा खड़ा करने का प्रयास करती दिखाई देती है. कर्नाटक में एक बार फिर सेक्युलर एकता के नाम पर जनादेश का अपमान किया जा रहा है.

यह बात सच है कि जनादेश न तो कांग्रेस को ही मिला है और जनता दल एस को, फिर भी सत्ता का स्वार्थ दोनों दलों के नेताओं पर हावी होता दिखाई दे रहा है. यह सत्ता के स्वार्थ की राजनीति किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं मानी जा सकती. ऐसी सरकारें जतना का हित कभी नहीं कर सकतीं, क्योंकि ऐसी स्थिति में दलीय हित सरकार पर ज्यादा प्रभावी होते हैं. अब कर्नाटक में क्या होगा, यह जल्दी ही पता चल जाएगा, लेकिन यह बात सही है कि भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है और कांग्रेस सिमटती जा रही है. कांग्रेस का यह सिमटना ही कहीं न कहीं अपने नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर रहा है.


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