देश में प्रेस को आजाद मानने वालों की आंखें बीते दिनों के दो विरोधाभासों से खुल जानी चाहिए. मंगलवार को जिस समय आजाद मीडिया की झंडाबरदार संस्था प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया कश्मीर में फ्रीडम ऑफ प्रेस के समर्थन में प्रस्ताव पारित कर रही थी, ठीक उससे दो दिन पहले झारखंड में सरकार के विकास कार्यों की रपट लिखने के नाम पर पत्रकारों की बोली लगाने का आखिरी दिन था. इसके लिए झारखंड सरकार ने पूरी बेशर्मी दिखाते हुए एक टेंडरनुमा विज्ञापन जारी किया था. इसमें चुने हुए 30 पत्रकारों को राज्य सरकार के विकास कार्यों पर आलेख लिखने के लिए 15 हजार रुपए तक का ऑफर दिया गया है. अब विधानसभा चुनाव से पहले सरकार का यह विज्ञापन पेड न्यूज को बढ़ावा देने की श्रेणी में आता है या नहीं, यह तय करना संवैधानिक रूप से प्रेस कौंसिल (पीसीआई) की जिम्मेदारी है. लेकिन मंगलवार की बैठक में यह चर्चा के एजेंडे में ही नहीं था. इसे मुल्क में पत्रकारिता का रोज हो रहे कत्लोआम में जिम्मेदारों की अनदेखी क्यों न मानें? ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन पत्रकार को गोद लेने वाले विज्ञापन भी आ सकते हैं.

यह भी नहीं कि ऐसा पहली बार हुआ हो. चुनाव से पहले पत्रकार को साधने के लाख जतन किए जाते हैं. फर्क इतना है कि पहले ये कोशिशें बाहरी ताकतों के जरिए होती थी, पर अब मीडिया घरानों की भीतरी ताकतें भी सच को छिपाने की जी-तोड़ कोशिशों में लगी रहती हैं. कश्मीर में प्रेस का गला घोंटने के मामले में पीसीआई के बदले हुए रुख को ही लें तो पता चलेगा कि एक वक्त इसी संस्था ने पत्रकारिता की सारी नैतिकताओं और सिद्धांतों को ताक पर रखते हुए सरकार की कदमपोशी की थी. बाद में एडिटर्स गिल्ड और सोशल मीडिया पर चौतरफा आलोचनाओं के बाद नजरिया बदल गया. इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक 18 सितंबर की असाधारण सभा में तय किया गया कि पीसीआई की सब कमेटी कश्मीर में मीडिया पर पाबंदियों की पड़ताल करने वहां जाएगी. कब? यह तय नहीं है. शायद यह यात्रा सरकार के अनुग्रह पर मुमकिन हो.

ऐसे वक्त में जबकि पीसीआई जैसी संस्थाएं देश की मौजूदा निजाम के सामने हथियार डाल चुकी हों तो यही सही वक्त है मीडिया के अंतर्द्वन्दों को करीब से देखने का. यह कोई रातों-रात नहीं हुआ है कि किसी राज्य की सरकार ने पत्रकारों की अपरोक्ष तरीके से बोली लगाई हो. दरअसल यह तो समूची मीडिया पर शिकंजा कसने का अगला कदम है. इससे पहले मध्यप्रदेश की पूर्ववर्ती शिवराज सिंह सरकार ने पत्रकारों को लैपटॉप बांटे और अधिकांश मीडियाकर्मियों ने इसे ‘मामा का प्रसाद’ मानते हुए चारणगीत गाए थे और सदा ‘साथ देने’ की कसमें भी खाई थीं. ऐसी कसमें तब भी खाई जाती हैं, जब पत्रकारों को बेहद रियायती दर पर प्लॉट, बीमा या मुफ्त में इलाज के लिए सहायता राशि मिल जाती है. न कभी पत्रकारों को इन सब तमाशों में पेशे की नैतिकता नजर आई और न ही पीसीआई ने इन पर उंगली उठाई. फिर जब राज्य का निजाम बदला तो नए कायदे-कानून के खिलाफ ये सारे पत्रकार लामबंद हो गए.   

इसकी वजह एक घटना से पता लगाई जा सकती है. कुछ समय पहले की बात है. एक बड़े संपादक से अनौपचारिक मुलाकात तय हुई थी. दफ्तर पहुचने पर देखा कि वे संपादकीय सहयोगियों की मीटिंग ले रहे हैं. उनकी बुलंद आवाज चेंबर के भीतर तक आ रही थी. वे पत्रकारिता के स्वनियमन पर भाषण दे रहे थे. सारे ‘डू एंड डोंट्स’ बताने के बाद वे हांफते हुए पसीना पोंछते अपने चेम्बर में पहुंचे. मैंने छूटते ही ताना मारा, ‘आपका भाषण जोरदार था’. बोले, ‘बीच-बीच में समझाना पड़ता है. दुकानदारी बढ़ती जा रही है.’ मीडिया के लिए दुकानदारी कोई नया शब्द नहीं है. ऐसे समय में जब अखबार अपने प्रिंट की लागत से एक-तिहाई कीमत में अखबार बेच रहे हों, सरकारी विज्ञापन ही गुजारे का सबसे बड़ा सहारा है. केंद्र की मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के आखिरी तीन साल में केवल प्रिंट मीडिया को प्रचार-प्रसार के लिए 1856 करोड़ रुपए से ज्यादा के विज्ञापन दिए थे. फिर इसी साल हुए आम चुनावों से ठीक पहले सरकार ने प्रिंट मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापन की दरों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी. अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात करें तो विज्ञापन की रकम सालाना 2500 करोड़ रुपए के आसपास बताई जाती है.

साफ है. यह तय करना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि पहले मीडिया बाजार में खड़ा हुआ या उसे सरकार ने खड़ा किया. लेकिन यह सभी जानते हैं कि मीडिया बाजार में तो खड़ा है. तो फिर उसकी नीलामी के लिए विज्ञापन निकालने में हर्ज भी क्या है ? बिल्कुल वाजिब सवाल है. पर फिर यह भी देखना होगा कि इस देश का मीडिया आखिर है किसके लिए ? खासकर अगर वह देश की 135 करोड़ अवाम के लिए झूठी, भ्रामक खबरें ही प्रचारित-प्रसारित करने वाला है या सरकारी भोंपू बनकर रहने वाला है तो फिर एक आम नागरिक के लिए उसकी जिम्मेदारी कहां पर आकर टिकती है. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिस मीडिया की आज बाजार में खुलेआम बोली लग रही है, उसका भविष्य क्या होगा ? यह सवाल भाषाई मीडिया के लिए विशेषरूप से महत्वपूर्ण है, जिसकी साख तेजी से कम होती जा रही है. यह भी देखना होगा कि यूपी के मिर्जापुर में मिड-डे मील की गड़बड़ को उजागर करने वाले पत्रकार पर फर्जी एफआईआर और हरियाणा के हिसार में सड़ रहे गेहूं की खबर प्रसारित करने वाले रिपोर्टर पर कार्रवाई को दबाने और उसके खिलाफ आवाज न उठाने वाला मीडिया कहीं विज्ञापन के बदले सरकार के थोपे जा रहे अघोषित आपातकाल को कहीं स्वीकार तो नहीं कर चुका है ?

अगर ऐसा है तो देश में पत्रकारिता का सिलेबस दोबारा लिखा जाना चाहिए. उसमें स्वनियमन और प्रेस की नैतिकताओं, उसूलों की तमाम बातें निकालकर इन बातों पर प्रमुखता से जोर देना चाहिए, जो यह सिखाएं कि सच को आड़ में रखकर अपने और संस्थान के अधिकतम लाभ के लिए झूठ को मैनेज कैसे किया जाए. इससे पहले सभी मीडिया संस्थानों को उन सभी पत्रकारों को नौकरी से निकाल देना चाहिए, जो पुराना पाठ पढ़कर इस पेश में घुसे हैं. साथ ही मीडिया संस्थानों को सारे ‘गेट कीपर्स’ की छुट्टी कर देनी चाहिए, जिनका काम है तथ्यात्मक गलतियों, भाषा की अशुद्धियों को दुरुस्त कर खबर को सही तरीके से पेश करना. मंदी के इस दौर में सैलरी के संकट से जूझ रहे मीडिया के लिए ऐसे ‘नैतिक’ कदम राहत भरे साबित हो सकते हैं. इसके दो और फायदे होंगे. एक तो उसे सरकार के प्रोपोगेंडा को पूरी आजादी से खुल्लमखुल्ला तरीके से फैलाने में कोई शर्म नहीं होगी, साथ ही इसके कारण ‘नए इंडिया’ में जो मूर्खतापूर्ण दौर शुरू हुआ है, उसे फैलाने में भी आसानी होगी. यानी एक ऐसा मीडिया, जिसमें सजी-धजी एंकर्स और सूट-बूट वाले मैनेजरनुमा संपादकों को छोड़ दें तो 10 चपरासी ग्रेड के लोग भी मीडिया संस्थान को चला सकें. यकीन जानिए, तब भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री को राष्ट्रपिता के रूप में प्रचारित किए जाने पर भी आपको अफसोस नहीं होगा.

-    सौमित्र रॉय, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.   


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