हमारे एक पारिवारिक मित्र ने अपने गांव में इंटरमीडियट विद्यालय बड़े शौक से बनवाया. विद्यार्थी आना शुरू हुए तो उन्हें डिग्री कालेज की इच्छा जाग उठी. दौड़-भाग, जोड़-तोड़ कर उन्होंने उसकी मान्यता भी करा ही ली. अपनी इस सफलता से वे बेहद प्रसन्न थे. किंतु आज जब एक अर्से बाद उनसे मुलाकात हुई तो परिस्थितियां बदली हुई थी. स्कूल कालेज के ठीक से ना चल पाने की शिकायत पलायन और अविकसित वातावरण के रूप में सामने आयी. 
देखा जाए तो उनकी महत्वाकांक्षा ने भारत, उसके गांव और उनकी मनस्थिति का सर्वे ही नहीं किया. भारत में गांव का मतलब गरीबी, पिछड़ापन, शौचालय, सड़क, बिजली, पानी को अभाव और रूढ़िग्रस्त समाज से होता है. एक ऐसे समाज से होता है जहां का हर आदमी किसी भी तरह के अभाव में रहना सीख जाता है. ऐसा समाज जो अपनी स्थिति से उबरना भी नहीं चाहता. अपने कुएं के मेंढक कह सकते है आप इन्हें. और इनकी इस स्थिति का लाभ बखूबी उठाना जानता है पूंजीपति वर्ग या फिर सत्ता के गलियारे में बैठा हर वह शख्स जिसे अपनी महत्वाकांक्षा को फलीभूत करने के लिए ऐसे ही लोगों की जरूरत है. भारतीय गांव की दुर्दशा का मूल कारण सरकारी नीति या पलायन करते लोग ही नहीं. वे भी है जो किसी भी परिस्थिति में काम चल जाएगा की सोच अपनाते है.
ऐसा नहीं है कि हमारे गांव व्यवसाय रहित है. यहां आपको छोटे-मोटे काम करने वाले लोग मिलेगे जो अधिकांशत जुगाड़ से काम करते है. दूघ का व्यवसाय करने वाले मिलेगें जो नई तौर तरीकों से सर्वथा अनभिज्ञ होगें. किसान है. धनी किसान की संख्या गिनती में है, पर उनके पास सभी तरह के संसाधन है. और जो बेहद गरीबी और कर्ज में आकंठ डूबा किसान है, उनकी संख्या की गिनती नहीं. वह आज भी पुराने ढर्रे से काम कर रहा है, टकटकी बांधे आसमान को घूरता है या सरकार की किसी दया का इंतजार करता है. नई टेक्नोलॉजी से सर्वथा अनजान. अनजान इसलिए भी है कि जिनके पास बीज खरीदने के लिए भी पैसा नहीं वे टेक्नोलॉजी से कैसे नाता जोड़ सकेगें. उस गरीब किसान को तो जैसे तैसे साल भर का अनाज उगाना है, जिससे उसका घर परिवार को भर पेट भोजन मिल सके. भारत में अधिकांश किसानों के लिए किसानी व्यापार नहीं अपने परिवार के पेट भ्रने का साधन मात्र है. आश्चर्य है कि कृषि प्रधान देश में आज भी कृषि ऐसा उद्योग नहीं बन पाया जिस पर पूंजी निवेश करने को लोग आगे आये. विकास का ठेका उठाने वाले भी ऐसी स्थिति का फायदा उठाकर 20 की रफतार में काम करते हैं.
यही रफतार अब नई पीढ़ी को बेसब्र कर रही है. वह तो 4- 5 जी की स्पीड में दौड़ना चाहता है. उसे रहने को स्मार्ट सिटी की चाट लग रही है तो वहां उपलब्ध मंनोरंजन के साधन भी लुभा रहे है. नौकरी करने उसे शहर आना ही है, तो वह उस गांव की ओर क्यों रूख करना चाहेगा जहां वह डिजिटल दुनिया से उस कालखंड में पहुंच जाता है जहां अभी भी एक बल्ब या फिर लालटेन के सहारे अपना काम करना पड़ता है. अगर आप आज के किसी नौजवान से पूछेगें कि वह क्यूं अपने गांव का विद्यालय या कालेज छोड़ कर शहर में पढ़ने चला आया तो उसका जबाव होगा गांव भी कोई रहने की जगह है. अच्छे कालेज नहीं है...टीचर प्रोफसर भी ऐसे ही है. मनोरंजन का सर्वथा अभाव, बार क्लब कॉफी हाउस माल कुछ भी तो नहीं है. सीखने समझने का कोई उचित माध्यम नहीं. ना कोचिंग सेंटर ना स्किल डेवलेपमेन्ट के साधन...... और ये कड़वा सत्य है कि सरकारों का ध्यान भी पूरा शहरों के ही विकास पर टिका रहता है. गांवों की सुध तो माननीयों को तब आती है जब पंचवर्षीय समारोह के आयोजन का समय आता है. भारी निधि होने के बावजूद अपने इलाके के विकास के लिए कितने लोग काम करते है. इसलिये सालों बीत जाने के बाद भी हमारे गांवें का विकास शहरों की तुलना में 25 प्रतिशत भी नहीं हो सका. यूरोप जापान चाइना जैसा देश भी है जहां गांव और शहर में अंतर नजर ही नहीं आता.
इसी भारी अंतर के कारण आज गांव के गांव शहर उठ के आने लगे है. चार जमात पढ़लिख जाने के बाद नई पीढ़ी को गांव में रहना अपने पिछड़ेपन की निशानी लगने लगता है. कुछ ऐसे शिक्षित लोग जो अब गांव को रहने की जगह नहीं मानते, कभी-कभार गांव में चक्कर लगा लेते है. जब आते है, दो-एक लोगों को और शहर आकर काम करने का न्यौता दे आते है. ये अवहेलना गांव को और भी पीछे धकेल रही है. ये बात बेहद तकलीफ देती है कि आजादी के वर्षो बाद भी गांव की स्थिति जस की तस बनी हुई है. गांव के मध्य से निकलते कुछ हाईवे जरूर विकास की कहानी बयां करते है लेकिन उसके साथ अगर उच्च शिक्षण संस्थानों, उद्योगों और जन सुविधा का ध्यान रखा जाता तो क्या गांव की तस्वीर नहीं बदलती? लेकिन हालात इससे इतर है. लोअर अपर मिडिल स्कूल जिनकी पहचान का आलम ये है कि सीलन भरी टूटी दरकी दीवारें, कीचड़ पानी से या फिर जानवरों से भरे खेल के मैदान, कुछ जगह तो कक्षाएं पेड़ के नीचे टाट बिछा कर भी चलती अपनी कहानी कहने लगती है. मिड डे मिल में मिलने वाले भोजन से ही ये बात साफ हो जाती है कि इस देश में गरीब लाजार होना कितना जानलेवा भी हो सकता है. कहने का मतलब ये है कि जितना पिछड़ा गांव होगा उतना अव्यवस्था का वहां बोलबाला होगा. 
सच तो ये है कि गांव के स्कूल हो, अस्पताल हो, सड़कें हो, सबकी व्यवस्था करने वाले भी उसके पिछड़ेपन के रेशियों को ध्यान में रखकर काम करते है. इसीलिए भी शहरों की चकाचौंध के आगे गांव फीके पड़ जाते है. भारत की आजादी के 67 साल बाद भी हमारे गांव किसी विकसित गांव की बानगी नहीं बयां करते. इसके पीछे एक कारण है भारतीय संस्कारों में आता परिवर्तन. आज गांव का आदमी जहां डाक्टर, इंजीनियर या विधायक सांसद बना तो उसका पहला काम होता है शहर में अपना स्थायी निवास बनाना. अपनी गृहस्थी का हर ताना बाना शहरों के इर्द-गिर्द बुनना आरंभ कर देता है. गांव से उसका नाता महज मां बाप या जमीन जायदाद भर से रह जाता है. नई संस्कृति का बोध होते ही एक दो पीढ़ी के अंतराल बाद गांव यूं भी मन मस्तिष्क से विलीन हो ही जाते है. लक्ष्मी मित्तल जैसे अनेक धनपति भी अपने गांव को बिसरा बैठे तो आम आदमी तो यूं भी स्वंय के विकास को महत्व देता है.
और एक बात कहूंगी कि नागरिक के अलावा दोष सरकारी नीति का भी है. उसकी ढुलमुल नीति दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे शहरों के बोझ को कम करने के बजाय उसमें बढ़ोत्तरी ही कर रही है. राजधानियों को स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में गांव को उजाड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोडी जा़ रही. नीति तो ऐसी होनी चाहिए कि शहरों का कल्चर भी न बिगड़े और गांव भी विकसित हो जाए. नियम ऐसा बने कि प्रोफेशनल कोर्स की डिग्री लेने के बाद हर युवा का 3 साल तक गांव में रहकर उसके विकास पर काम करना अनिवार्य हो., उच्च चिकित्सा संस्थान शहर में ही ना खोले जाए. उच्च स्तरीय कालेज कोचिंग सेंटर के अतिरिक्त कौशल विकास के भी उचित प्रबंध हो. लोकल कलाओं को जीवंता मिले. ऐसी व्यवस्था बने कि किसी को भी नौकरी के लिए शहरों की ओर ना भागना पड़े. जो जनसुविधा शहर में उपलब्ध है वो गांव को भी मिले. सड़क बिजली पानी सब चकाचक. 
लेकिन ये सब करने के लिए गरीबी अमीरी की सोच से उठना जरूरी है और उस राजनैतिक सोच से भी जो स्वार्थ नक्कारेपन से भरी है. विकास की परिभाषा को जहां बुलेट ट्रेन के तौर पर देखा जाता है बजाय हर पेट को रोटी कपड़ा और मकान के, आत्महत्या करते उस किसान से जो कर्ज के बोझ में दबा अपनी मेहनत का पूरा फल भी नहीं ले पाता या फिर बेरोजगारी के कुचक्र में फंसे उस युवा से जो चोरी डकैती करने को मजबूर होता है, तो ऐसे देश को बेसिक विकास के लिए सदियों का इंतजार करना होगा. हां उससे पहले बुलेट ट्रेन का सपना तो पूरा हो ही जाएगा.


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