बात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से ही आरंभ करती हूं. पिछले तीन दिन के उनके बयानों पर प्रकाश डालना चाहूंगी. पहले आज सुबह के समाचार पत्र में उनकी टिप्पणी-कोरोना संक्रमण झेल रहे किसानों पर बेमौसम बरसात, आंधी, ओलावृष्टि की मार आ पड़ी है और सरकार के पास गेहूं व आम की फसल का ब्यौरा नहीं है. किसान के साथ छलावे की यह घटिया राजनीति भाजपा के चरित्र का ही हिस्सा है. किसानों के हितों की भाजपा सरकार को कोई परवाह नहीं.

26 अपैल को वे फरमाते है कि भाजपा सरकारें राजनीति से बाज नहीं आ रही. प्रदेश में कम्युनिटी किचन और आरआरएस के भंडारे में कोई फर्क नहीं दिखता. खाद्य साम्रगी को संघ अपनी बताकर मोदी थैली में भरकर भाजपाई परिवारों में बांट रहा है. ...भाजपा की सरकार क्या संघ का एंजेंडा बनाने के लिए चुनी गई है.

27 अप्रैल को वे राज्य कर्मचारियों के डीए और भत्ते रोकने के फैसले पर अपना बयान जारी करते है. उनके कथनानुसार ये भत्ते रोकने से अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों की घरेलू अर्थव्यवस्था बिगड़ जाएगी. बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये.

अब सवाल यहां ये है कि सरकार के हर फैसले के विरूद्ध खड़ा होना ही है तो तर्कसंगत ढग से क्यों नहीं खड़े होते   अचानक ही बिगड़े मौसम में किसानों का दर्द समझ में आपको विपक्ष में रहकर ही क्यों आता है जबकि सरकार-प्रशासन-अधिकारी कोरोना को थामने में उलझे पड़े है. क्या आप नहीं जानते कि हो चुके नुकसान का ब्यौरा जुटा पाना इतना भी आसान नहीं और जल्दी तो कतई नहीं. ऐसे में वही आश्वासन दिये जाते है जो मूलतः कोई भी सरकार देती है. कुछ समय बीत जाने के बाद अगर आपको इस संदर्भ में उचित कारवाई होते न दिखे तो आपका सवाल लाजिमी बनता है.

फिर संघ का एजेंडा और कम्युनिटी किचन जैसे आरोप अखिलेश जी जैसे व्यक्तित्व पर शोभा नहीं देते. सबूत और तर्क की बिना पर कुछ भी बोल देना वह भी ऐसे नाजुक समय पर उचित नहीं है. जनता आपसे भी तो सवाल कर सकती है कि आपकी पार्टी ऐसे नाजुक मौके पर क्यों नहीं कुछ ठोस काम कर रही. अखिलेश जी! जनता सब समझती है और नजर भी रखती है कि कौन-कब उसके साथ खड़ा है या क्यूं नहीं है. चंद लोगों को खुष करने के लिए बयान दे देना किसी बड़ी पार्टी के बड़े नेता के लिए रूचिकर नहीं लगता.

मैे कोई भाजपा की अंधभक्त फैन नहीं. बहुत से ऐसे मौके आये है जब मैंने भाजपा की कई नीतियों पर अपना ऐतराज भी जाहिर किया और सपा काल को जमीनी कार्यों में योगी सरकार से बेहतर माना. लेकिन मौके की नजाक़त देखकर अपनी बात को न रखना किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के लिए प्रशंसनीय नहीं हो सकता. उसके लिए मीडिया को ही रहने दें जो एक अर्से पहले अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को 'टीआरपी' की भेंट चढ़ा चुका. हमारे जिम्मेदार नेताआंे को तो ऐसे तनाव भरे माहौल में सरकार और जनता के हित में खडे़ होना चाहिए. आपने कहा कि बेहतर हो कि सरकार अपनी फिजूलखर्जी पर रोक लगाये. येे बात आप किसी और मौके पर कहते तो शायद उतनी न खटकती, लेकिन जब सरकार आने वाले समय को चुनौती मान कर हर क्षेत्र में हर संभव पैसा बचाने का उपक्रम कर रही, उस समय आपकी ओर से फिजूलखर्ची का कोई ठोस सबूत दिये बिना ये कहना वाजिब नहीं लगता. हर बात पर मीनमेख निकालना ही राजनीति नहीं या फिर महज खबरों में बने रहने के लिए कुछ भी कह देना तो जरूरी नहीं. बेवजह बातों का राजनीतिकरण करना आंख में किरकिरी पैदा करता है और मत भूलिए, जनता इसे याद रखती है. हां, राजनीतिक बिसात पर जरूर वैमनस्य को याद रख कर अपनी चालें नहीं चली जा सकती.

अब बात बसपा नेत्री की. बसपा सुप्रीमो कोरोना वायरस की जांच बढ़ाने और प्रवासी गरीब मजदूरों को भरपेट भोजन की व्यवस्था की मांग कर रही. उनके अनुसार सरकार को चाहिए कि लाॅकडाउन से प्रभावित लोगों को सरकार जल्द से जल्द अपने घर पहुंचाएं. मांग तो उनकी उचित है. संदेह भी नहीं कि इस पर सरकार और प्रशासन ने अपने पूरी ताकत झोंक रखी  है. लेकिन यहां भी जनता का बसपा सुप्रीमो से सवाल है कि इस तरह की मांग के अलावा बसपा पार्टी अपने गरीब-दलित -वंचित लोगों के लिए क्या कर रही?

मुझे माफ करियेगा अगर इस संक्रमण के भयानक दौर में किसी भी विपक्षी पार्टी के द्वारा किए गए सराहनीय प्रयासों को देखने से मैं चूक गई हूं तो. लेकिन सुबह से लेकर शाम तक समाचारों को देखते-पढ़ने में कहीं मुझे इनके किसी भी तरह के सहयोगी प्रयासों की झलक भी देखने को नहीं मिली. दर्द-तकलीफ हम सब देखते है लेकिन उसको स्वंय पर लादने से दूर भागतेे है. विपक्ष में बैठ कर ये भूल जाते है कि हम भी कभी सत्ता में थे और किस तरह से अपनी कार्यो और नीतियों को सामने रख कर अपने मुहं मियां मिटठू बनते थे. कलई तो तब खुलती जब जनता जनार्दन अपनी पसंद को मुहर लगा आपको ख़ारिज कर देती है.

चलते-चलते क्रांग्रेस और उनके दिग्गज नेताओं की भी बात कर लें. सोते-सोते जागते इनके नेताओं को भी गाहे-बगाहे ऐसे मौकों पर कुछ तड़का डाल देने का मन करने लगता है. कभी खराब पीपीई किट की आपूर्ति तो कभी कोरोना टेस्टिंग में बरती जानी वाली पारदर्शिता पर सवाल तो आम बात है. प्रियका गांधी का टवीट् पीपीई किट की खराब सप्लाई के मामले में योगी सरकार को कठघरे में खड़ा करता है. गोया खराब किट की सप्लाई का मिलना सरकार के लिए बेहद सम्मानजनक बात हो. उधर आर्थिक मामलों के प्रकांड विद्वान मनमोहन सिंह भी राष्ट्रीय तौर पर आने वाले आर्थिक आपदा की जगह सरकारी कर्मियों के भत्ते को लेकर चिंतित है जिसे सिर्फ एक साल के लिए टाला भर गया है न कि निरस्त किया गया. पार्टी नेता राहुल गांधी ट्वीट कर गुजरात में फंसे आंध्र प्रदेश के 600 मछुआरों को निकालने के लिए मदद देने की मांग कर रहे. उनका कहना है इन मछुआरों के पास पर्याप्त खाना और पानी नहीं है. हैेरानी होती है इस तरह की समस्याओं के लिए सरकार का मुंह तकने वाली पार्टियों से और उन लोगों से जो खुद बरसों सत्ता में रह चुके है और आज भी दूसरी बड़ी पार्टी होने का दावा करते है.

बड़े तो बड़े छोटे मियां सुभानअल्लाह! आगरा प्रदेष कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू आगरा माॅडल के पंचर होने की दुहाई दे रहे. आगरा और आगरा के लोगों को लेकर बेहद चितिंत लल्लू जी, बजाय इसके कि वह खुद आगरा माॅडल को सफल बनाने में अपना हाथ आगे बढ़ाये, योगी सरकार का कोरोना मरीजों के प्रति अमानवीय चेहरा दिखाने में सक्रिय है.

कोरोना महामारी के समय जब हर आम व्यक्ति सरकार प्रषासन को सहयोग देने का भरसक प्रयास रहा है तो क्या देश की ’सो काल्ड’ बड़ी पार्टियों का फर्ज नहीं बनता कि वे भी इस आपदा के समय राजनीति छोड़कर कंधे से कंधा मिलाकर अपनी पार्टी के रसूख को मद्देनज़र रख कोरोना पीड़ितों की मदद को आगे आए. सरकार की मदद कर मिसाल कायम करें और दिखा दें कि हिन्दुस्तान ऐसा मुल्क है जहां राजनैतिक पार्टियां निजी स्वार्थ से उठकर आपदाओं का मिलकर सामना करती है. वोट बैंक से इतर ’इंसानियत’ और धर्म-मजहब से हटकर ’राष्ट्रधर्म’ को सर्वाेपरि समझ अपने कत्र्तव्य का निर्वाह करतीं हैं
 


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