लॉकडाउन अपने चौथे चरण में है. इस चौथे चरण में कुछ चीजें खुल चुकी हैं. जो अभी भी बंद हैं उनके विषय में अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद इस चरण के लाकडाउन के खत्‍म होने के बाद वे भी खुल जाएंगी. हम सब इस बात को जानते और समझते हैं कि देश को बंद करके रखा नहीं जा सकता है. जान के साथ जहान को संभालने के लिए एक न एक दिन सब कुछ खोलना तो पड़ेगा ही. लॉकडाउन के इन चार चरणों में हम इस बात को समझ चुके हैं कि आने वाले दिनों में हमें अपनी जिन्‍दगी कैसे जीनी है. बीते दो महीनों में लॉकडाउन में रहकर हमने जीने का जो तरीका सीखा है उसी तरीके पर आगे भी चलना होगा.

कोरोना एक महामारी है और किसी भी महामारी से भागा नहीं जा सकता है. हमें उस महामारी से बचने के रास्‍ते निकालने होते हैं. जब भी महामारियां फैलती हैं लोगों का एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर पलायन होता ही है. इतिहास में ऐसा हुआ है, वर्तमान में हो रहा है और भविष्‍य में जब भी कोई नई महामारी आएगी, उस समय भी ऐसा ही होगा. इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि हर त्रासदी और महामारी के बाद पुरानी मान्‍यताएं टूटती हैं और नए तौर-तरीके सामने आते हैं. पूरी की पूरी व्‍यवस्‍था बदल जाती है. इस बार ऐसा नहीं होगा, नहीं कहा जा सकता है.

महामारियों का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब भी महामारी आती है सरकार की तैयारियों की पोल खुल जाती है. चाहे कोई भी सरकार हो, कहीं की भी सरकार हो, किसी की भी सरकार हो हर त्रासदी और महामारी आने पर स्थिति को संभालने में नाकाम रहती हैं. इस बार भी यही हो रहा है.ऐसी स्थिति से निपटने के लिए सरकारों के पास एक ही नुस्‍खा होता है सामाजिक अथवा शारीरिक दूरी. इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता है, क्‍योंकि दूरदर्शिता की भी एक सीमा होती है. जब तक समस्‍याओं से सामना नहीं होता है तब तक उसका निदान भी नहीं निकाला जा सकता है.  

महामारियां जान-माल के नुकसान के साथ-साथ अर्थव्‍यवस्‍था को भी तबाह करती हैं. जब भी अर्थव्‍यवस्‍था पटरी से उतर जाती है तब समाज में असंतुलन की स्थिति उत्‍पन्‍न हो जाती है. महामारियां अमीर और गरीब के बीच भेदभाव नहीं करती हैं मगर इन महामारियों से निपटने के लिए दोनों के पास जो साधन और संसाधन होते हैं उनमें अंतर होता है. एक वर्ग इन महामारियों से अपने को बचाने में सफल हो जाता है जबकि दूसरा वर्ग इसकी चपेट में फंस जाता है और उनका जीवन अत्‍यधिक मुश्किल हो जाता है.

आने वाले दिन कैसे होंगे, इस विषय में अभी से अंदाजा लगाना मुश्किल है. लेकिन एक बात तो तय है कि भविष्‍य में समाज सेवी संगठनों की भूमिका महत्‍वपूर्ण होगी. विशेषरूप से राष्‍ट्रवादी समाज सेवी संगठनों के ऊपर बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी होगी. उसे समाज की जरूरतों को समझना होगा और उसके अनुरूप कार्य करना होगा. समाज को उसकी आर्थिक क्षमता के आधार पर वर्गों में विभाजित कर हर वर्ग की समस्‍याओं को गंभीरता से समझकर उसके अनुरूप कार्य योजना तैयार करनी पड़ेगी. हमें इस बात को समझना पड़ेगा कि यदि हमारा पड़ोसी किसी मुश्किल में है तो वह समस्‍या हमारी भी है. इसी सोच के साथ हमें उन समस्‍याओं को सुलझाना होगा.

सेवा भावी संगठनों को इस समय सबसे अधिक ध्‍यान मध्‍यमवर्गीय परिवार पर देना चाहिए. यह एक ऐसा वर्ग है जो अपनी समस्‍याएं किसी से कह नहीं पाता है और भीतर ही भीतर घुटता रहता है. जिन लोगों का रोजगार खत्‍म हो गया है उनकी समस्‍याओं को भी समझते हुये उसके निराकरण की जरूरत है.


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