इस साल की बीती 17 सितंबर को लेकर एक कल्पना दिमाग में दस्तक दे रही है. मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन का है. समय भाजपा के लिए संक्रमण वाला था. गुजरात में किसी तरह हार से बची पार्टी को मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में हार का डर यकीनन सता रहा होगा. यहीं से मेरी यह कल्पना आकार लेती है कि उस दिन मोदी को काली टोपी पहने किसी शख्स की ओर से एक आॅडियो कैसेट भेंट किया गया होगा. हरिओम शरण के भजन वाला. जिसमें केवल और केवल एक भजन होगा, तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार, उदासी मन काहे को डरे. ऐसा ही होता दिख रहा है और मुझे कल्पना की अगली श्रेणी में यह भी लगता है कि इस भजन को मोदी सहित अमित शाह और भाजपा के तमाम शीर्ष नेताओं ने पूरे यकीन के साथ अपनी सुबह की प्रार्थना का हिस्सा बना लिया होगा. 

वाकई रामजी एक बार फिर भाजपा का बेड़ा पार लगाने की स्थिति में आ गए लगते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद को लेकर सुनवाई अगले साल तक टाल दी है. ऐसा होते ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना और खुद भाजपा के कई नेताओं और मोदी सरकार के मंत्रियों ने भी इस बात के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार अध्यादेश ला कर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करे. यह दबाव भाजपा की मर्जी के खिलाफ नहीं बनाया गया. इसकी रचना पूरी सहमति से की गई है. इसलिए यह तय मानकर चलिए कि विधानसभा चुनावों के दौर के बाद किसी भी समय मंदिर के लिए अध्यादेश लाने का कदम उठाया जा सकता है. 

ऐसा इसलिए होगा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार कई तरह से गांठबंधन का सामना कर रही है. उसकी स्थिति सन 2014 की तुलना में कमजोर दिखती है. उस पर नोटबंदी की घोर असफलता, जीएसटी पर बनी अलोकप्रिय स्थिति, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम, सुप्रीम कोट में सास-बहू जैसे झगड़े तथा सीबीआई में चौथ वसूली की शैली में मचे घमासान ने सरकार की छवि को और कमजोर किया है. तो ले-देकर सहारा बचता है रामजी का. मोदी के लिए यह फायदे का सौदा होगा.

इसलिए भी कि 2014 के लोकसभा चुनाव ने देश की राजनीति को एक नया संदेश दिया है. देश का बहुसंख्यक मतदाता अपने दम पर सरकार को बहुमत में ला सकता है. बशर्तें वो जातियों मेें बंटा हुआ न होकर हिन्दू होकर वोट करें. भाजपा के उत्थान में देश में हावी इसी सोच ने बड़ा काम किया है. लिहाजा इस समय कांग्रेस सहित देश के तमाम राजनीतिक दल जिनमें क्षेत्रीय पार्टियां भी है, एकाएक सब बहुसंख्यकों के धर्म का विशेष ध्यान रख रहे हैं. कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी को इस दौरान जबरदस्त धार्मिक ज्ञान प्राप्त हो रहे हैं. 2009 और 14 के बीच कांग्रेस को लगता था कि यदि उसका खोया हुआ आधार अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम मतदाता उसके पाले में आ जाएगा तो उसका बेड़ा पार हो सकता है. 2014 में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को सार्वजनिक तौर पर मानना भी पड़ा कि उसकी हार का बड़ा कारण उसका अल्पसंख्यक रूझान था.

अब ऐसे में यदि भाजपा राम मंदिर के मुद्दे पर अध्यादेश लाती है या संसद में कानून बनाने की कोशिश करती है तो बाकी राजनीतिक दलों का स्टेंड उसके लिए संजीवनी का काम करेगा. अध्यादेश के समर्थन एवं विरोध के बीच हिंदू समाज का कट्टरपंथी धड़ा भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाएगा. जो दल अध्यादेश का विरोध करेंगे, उनके खिलाफ बाकी बुनियादी मुद्दो्र को किनारे कर एक नया माहौल बन सकता है. इससे सबसे बड़ी दिक्कत कांगे्रस को होगी. क्योंकि फिलवक्त वह सॉफ्ट हिंदुत्व की डगर पर चल रही है. लेकिन मंदिर मसले पर वह दो नावों की सवारी नहीं कर सकती. उसे स्पष्ट करना होगा कि वह अध्यादेश का समर्थन कर रही है या विरोध. जाहिर है कि कांग्रेस के लिए यह सांप-छछुंदर वाली स्थिति का सबब बन सकता है. इसलिए निश्चित मानिए कि बहुत जल्दी एक बार फिर आगामी लोकसभा चुनाव के धर्म पर आधारित होने वाला समय आने जा रहा है.कांग्रेस को इससे निपटने के लिए अभी से पुख्ता तैयारी करना होगी.

वैसे यह दु:खद है. चार साल से अधिक समय गुजर गया, लेकिन दिल्ली की सरकार रामलला को टेंट से बाहर नहीं ला सकी. कहने का आशय यह नहीं कि कोर्ट के निर्णय से पहले या परे जाकर मंदिर का निर्माण ही करा दिया जाए, आशय केवल यह कि राम के सहारे देश-भर में अपनी स्थिति मजबूत करने वाली भाजपा ने पूर्ण बहुमत मिलने के बाद इस मसले पर गोल-मोल रवैया अख्तियार कर रखा था. यहां तक कि संघ भी इसी शैली में बात करने लगा था. अब जबकि सामाजिक समरसता अभियान के बावजूद दलित आंदोलन और एट्रोसिटी एक्ट को लेकर भाजपा के पक्ष में माहौल नहीं बन पा रहा, तब एक बार फिर भूले-बिसरे गीत की तर्ज पर मंदिर की सुध ली गई है. साफ तौर पर यह समय दिवंगत अर्जुन सिंह के एक नारे को याद करने का है. उन्होंने लिखा था, भाजपा का असली चोला, कुर्सी की खातिर राम को तोला

खैर, मतदाता जागरूक है. किसी समय राममय होकर भाजपा का अंध-समर्थन करने वाले हिंदू भी यह समझ गए हैं कि यह महज सियासी मामला है. इसलिए यदि मोदी एंड कंपनी  तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार... सुनकर आत्ममुग्ध हैं तो उन्हें उस दिन के लिए भी तैयार रहना चाहिए, जब मतदाता राम का नाम बदनाम न करो' का गाना गाते हुए उन्हें सबक सिखाने पर आमादा हो जाए. 


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