इस सबकी शुरूआती बुनियादों को खुद हमने मजबूती प्रदान की. अलग-अलग तरीकों से हम इस पाप के संवाहक बने. नतीजा आज हमारी पूरी बिरादरी झेल रही है. मध्यप्रदेश के भोपाल सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर यदि कहती हैं कि उन्हें मीडिया से कोई डर नहीं है, तो सच मानिए कि इसकी वजह खुद मीडिया वाले हैं. कई दृष्टांत काले अध्यायों की तरह याद आ रहे हैं. दिग्विजय सिंह,  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. एक युवा पत्रकार ने कालांतर में प्रदेश के मुख्य सचिव बने एक अफसर के खिलाफ सवाल पूछ लिया. सिंह ने जवाब देने की बजाय पूरी ठकुरास के साथ पत्रकार से कहा, इतनी ही समस्या है तो आप लोकायुक्त में शिकायत कर दीजिए.
 वह युवा सकपका कर रह गया, क्योंकि इस सलाह का शेष मीडियाकर्मियों में से कुछ ने शर्मनाक चुप्पी तो कुछ ने वाहियात हंसी के साथ समर्थन किया था. दिल्ली में कांशीराम ने जूते और गालियों से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रति अपने रुख का इजहार किया था. किंतु कुछ ही दिन बाद वही मंडली कांशीराम के बगल में बैठकर खीसें निपोरती हुई अपनी पिघल चुकी रीड की हड्डी को छिपाने का जतन करती दिख गयी. भोपाल में झुग्गी माफिया की हैसियत वाले एक नेता ने अंग्रेजी अखबार के पत्रकार से कहा था, तुझे जो छापना है, छाप ले. मुझे कोई फरक नहीं पड़ता.
 यह कथन उस अखबार में हू-ब-हू छपा, लेकिन अखबारकर्मियों ने इसके तीखे विरोध का कोई जतन नहीं किया.तो अब क्यों इस बात की फिक्र की जाए कि साध्वी प्रज्ञा ने सीहोर के पत्रकारों की विश्वसनीयता पर खुलकर सवालिया निशान लगाये हैं? किस वजह से यह मातम या क्रोध हो कि सांसद ने कहा है कि उसे मीडिया से कोई डर नहीं है? क्योंकि मौजूदा हम में से कई और अतीत का हिस्सा बन चुके अनेक हमपेशा ही ऐसे हालात के मुख्य जिम्मेदार हैं. इन हालात के बहुत बड़े गुनहगार वह शीर्ष पदस्थ पत्रकार कहे जाएंगे, जिन्होंने अखबार मालिकों और नेताओं/आला अफसरों के बीच संवाद का सेतु स्थापित किया.


आज इस पुल की दीवारों को देखिये. आपको वहां अनंत क्षमतावानपत्रकार ही जिंदा चुने हुए नजर आ जाएंगे. क्योंकि इस पुल ने दनादन अखबारों को जन्म दिया और उतने ही वेग से पत्रकारिता की हत्या कर दी. कभी सोचिए कि हम इस पेशे की कौन सी अवस्था देखने को अभिशप्त हैं. सोशल मीडिया पर हर राह चलता हमें कोसता है. एक पालतू जानवर तक से हमारी तुलना की जाती है. यहां तक कि हम कहीं गोदी मीडिया तो कहीं भक्त या चम्मच भी कह दिया जा रहा है. इस सबकी वजह यह भी कि हम रेशा-रेशा बिखरने में मसरूफ हैं. एक अदद बाइट हमें पेशागत एकता के सूत्र से एक झटके में अलग कर देती है.


मालिकान के किसी काम को पूरा कराने का जिम्मा हमें पत्रकार की बजाय खिदमतगार बना देता है. कितने शर्मनाक लम्हे कि सोशल मीडिया पर हम किसी नेता के साथ सेल्फी पोस्ट करने में गौरव का अनुभव करने लगे हैं. प्रभावशाली अफसर (फिर चाहे वह जितनी भी पतित प्रवृत्ति का क्यों न हो) के जन्मदिन पर हमारी बिरादरी उसे सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं देती है. गुंडे-मवाली नेताओं को हम भाईसाहब या दादा कहकर संबोधित करते हैं. जब हालात यहां तक पहुंच गये हों तो फिर प्रज्ञा से कैसी शिकायत. इस सांसद के पीछे विरोध का नाटकीय डंडा लेकर मत दौड़िये. अपने भीतर झांकिए. आप पाएंगे कि वहां एक पत्रकार पक्षाघात का शिकार होकर पड़ा है. उसे यह रोग हमने ही दिया है. उसका उपचार भी हम ही कर सकते हैं. पहले अपनी बीमारी दूर कीजिए. फिर आप पाएंगे कि हमारे पेशे का वह खोया गौरव नवीन काया लिये हुए हमारे साथ आ खड़ा हुआ है.


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