कमाल है यार! हम तो करामातों पर लिख-लिखकर थकते जा रहे हैं, मगर करामातिये हैं कि थकान की परछाई तक उनके आस-पास फटक नहीं पा रही है। लगता तो ऐसा है कि रिले रेस चल रही हो। एक रुका तो दूसरा शुरू हो गया। उमंग सिंघार की उमंग पर ब्रेक लगे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया उनकी जगह सियासी ट्रैक पर दौड़ने लगे। अगली बार दो अन्य कांग्रेस विधायकों, की थी। अब भाई तुलसी सिलावट भी गंभीर आरोप से घिर गये हैं। कहा जा रहा है कि उनके सुपुत्र रिश्वत लेकर तबादले करवा रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार और सत्ता में यदि कहीं शांति है तो वह केवल और केवल शोभा ओझा के खोखले बयानों में ही दिखती है। बाकी तो हर ओर कोहराम मचा हुआ है। शोर इतना ज्यादा कि उनके बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ के खर्राटे कोई सुन ही नहीं पा रहा

जी हां, मुख्यमंत्री वल्लभ भवन के अपने वातानुकूलित कक्ष में खर्राटे भरने से ज्यादा और कुछ कर भी तो नहीं पा रहे हैं। कलयुगी संजय मुख्यमंत्री चैम्बर में बैठे-बैठे ही नाथ के कान में मंत्र फूंक देते हैं कि सब ठीक चल रहा है और मुख्यमंत्री फिर करवट बदलकर चैन की नींद में गाफिल हो जाते हैं। यह तथ्य किसी से नहीं छिपा है कि सारे फसाद की जड़ दिग्विजय सिंह हैं। यह बात भी बारिश के बाद की धूप की तरह साफ है कि समूचा विवाद राज्य सरकार एवं संगठन पर नियंत्रण करने की कवायद का है। दिल्ली दरबार भी बेबस दिख रहा है। निश्चित ही सोनिया गांधी का स्वास्थ्य उन्हें पहले जैसी स्फूर्ति से वंचित कर रहा है। उनकी रही-सही ताकत कभी अनुच्छेद 370 तो कभी एनआरसी में खप जा रही है।
फिर चिरंजीव राहुल के अध्यक्षीय कार्यकाल में जो गड्ढे खुदे, उनकी भरपाई में भी कार्यकारी अध्यक्ष का काफी समय जाया हो ही रहा होगा। इस सबके बीच एक राज्य का मसला सुलझाने का समय ही कहां मिल पा रहा होगा। कुल मिलाकर मामला ऐसी नाव का हो गया है, जो पहले ही तूफान में घिरी हुई थी और अब उसमें एक-एक कर छेद होते चले जा रहे हैं। उस सरकार की सोचिए, जिसके हिस्से ही यह शोर मचा रहे हों कि इसके तमाम लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। मध्यप्रदेश ने ऐसे बदलाव वाले वक्त की कभी भी कामना नहीं की थी। क्योंकि मामला वक्त के बदलाव का नहीं, बल्कि बदला लेने वाले वक्त में तब्दील होकर रह गया है।
यह सब देखकर जनता पार्टी की उस सरकार का कार्यकाल और हश्र याद आ गया, जो अंतत: अपने नेताओं के आपसी घमासान में ही खत्म हो गयी थी। ऐसा उदाहरण सामने होने के बावजूद राज्य की सरकार एवं कांगे्रस संगठन गुटाधीशों के हाथ का खिलौना बनकर रह गये हैं। क्या यह स्थिति उस समय किसी भी लिहाज से ठीक कही जा सकती है, जब प्रदेश के नगरीय निकायों के चुनाव तेजी से नजदीक आते जा रहे हैं। सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद निकाय चुनाव ही कमलनाथ की इज्जत और राज्य में पार्टी की ताकत में कुछ इजाफा कर सकते हैं। लेकिन फिलहाल जो चल रहा है, उसे देखते हुए यह आशंका जतायी जा सकती है कि यहां भी मामला लोकसभा चुनाव जैसा ही हो सकता है।


दिग्विजय सिंह कुल मिलाकर बारात में दूल्हे के फुफाजी जैसा आचरण कर रहे हैं। उसकी प्रतिक्रिया में उमंग सिंघार से लेकर गोविंद सिंह राजपूत जैसे जो स्वर उठे, उनसे साफ है कि निकाय चुनाव के द्वाराचार से पूर्व जनवासे में ही जमकर जूतम-पैजार चल रही है। मुख्यमंत्री सहित प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर नाथ क्रमश: सत्ता एवं संगठन में अनुशासन कायम रखने में पूर्णत: विफल साबित हुए हैं। मालवा में एक कहावत है, ‘गम ये नहीं कि बुजुर्ग महिला मर गयी, गम ये कि इस बहाने मौत ने घर का रास्ता देख लिया।’ देश के सबसे बुजुर्ग राजनीतिक दल में जिस तरह बहुत तेजी से बड़े-छोटे का लिहाज खत्म हुआ है, उसने मौत के घर का रास्ता देखने जैसे हालात ही पैदा किये हैं। मृत्यु किसी इंसान के लिए शाश्वत सत्य है, किंतु किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं। किंतु यहां मामला उलटा होता दिख रहा है, क्योंकि ये ऐसे घटनाक्रम हैं, जिनमें हर कोई अपनी-अपनी सियासी दीर्घायु के फेर में पार्टी को खत्म कर देने पर आमादा है।


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