मध्यप्रदेश में ...तो वो हो गया, जिसकी दिसंबर, 2018 से पहले किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी और जिसके हो जाने का पिछले कुछ समय से अधीरता से इंतजार किया जा रहा था. ज्योतिरादित्य सिंधिया आखिरकार भाजपा में शामिल हो गये. अपने तमाम रंजो-गम को सिंधिया ने शालीनता की चादर में ढंककर रखा. नपे तुले शब्दों में मीडिया के सामने बात रखी. बातचीत का संपूर्ण वात्सल्य रस उन्होंने नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह, जेपी नड्डा, विनय सहस्त्रबुद्धे एवं वीडी शर्मा के लिए बरसाया. सिंधिया ने निंदा रस का प्रवाह केवल मध्यप्रदेश सरकार एवं कांग्रेस संगठन तक किया. किसी व्यक्ति का नाम लेने से वह बचते रहे. जिस कर्ज माफी को लेकर उन्होंने कुछ दिन पहले सड़क पर उतरने की बात कही थी, उसी मसले को अपने दु:ख की प्रमुख वजह बताया. नये सियासी बहीखााते को खोलते समय ज्योतिरादित्य ने भूल-चूक, लेनी-देनी वाले स्थान पर पार्टी द्वारा सच से नजर चुराने, वो पुरानी कांगे्रस का रोना रोने जैसे हिसाब-किताब दर्ज कर दिए

सियासी मंडी की इस सौदेबाजी में सिंधिया ने मोदी है तो मुमकिन है कहकर ग्राहक का संतोष ही हमारा परम धर्म है की याद ताजा कर दी. तेजी से हुए इन घटनाक्रमों का असर यह कि सिंधिया को तुरंत ही राज्यसभा का टिकट दे दिया गया. कांगेस ने अपने इस वरिष्ठ नेता की जिन अहम-अहम मसलों पर तगड़े तरीके से उपेक्षा की, उनमें राज्यसभा जाने का मामला प्रमुखा रूप से शामिल रहा है. लेकिन इस निर्णय की इबारत किसी ताजा मसले पर नहीं लिखी गयी. यह अहं की उस लड़ाई का एक मौजूदा परिणाम है, जिसमें कमलनाथ अहंवादी प्रवृत्ति के न होते हुए भी दुश्मन के सीधे निशाने पर आ गये. फिलहाल अधर में गुलाटियां खाती मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे नाथ की बड़ी गलती उनका इस दिशा में कुछ करना नहीं रही, बल्कि महाभूल यह हुई कि उन्होंने वह सब नहीं किया, जो बतौर एक वरिष्ठ कांग्रेसी एवं मुख्यंत्री उन्हें करना चाहिए था. यह सारा प्रपंच दिग्विजय सिंह के कारण हुआ.

नाथ सरकार में पहले ही दिन से इस पूर्व मुख्यमंत्री ने किसी सुपर चीफ मिनिस्टर की तरह दखल दिया. सिंधिया से अपनी सियासी प्रतिद्वंद्विता को उन्होंने समूची सरकार एवं संगठन की अंदरूनी लड़ाई में तब्दील कर दिया. दरअसल, राज्यसभा की एक सीट का मामला इतना प्रतिष्ठा का प्रश्न ही नहीं था, जितना सिंह ने इसे अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते बना दिया. यह किसी से नहीं छिपा था कि मध्यप्रदेश से उच्च सदन के लिए खाली हो रही तीन रिक्त सीटों में से एक सीट के जरिए दिग्विजय अपने सियासी वानप्रस्थ को गृहस्थाश्रम के रूप में तब्दील करना चाह रहे हैं. इसीलिए सिंधिया की भद्द पिटाई का जो दिग्विजयी जतन शुरू किया, उसका नतीजा आज के घटनाक्रम से हुई हानि के रूप में नाथ सरकार सहित समूची कांग्रेस के सामने है. शोभा ओझा और जीतू पटवारी सिंधिया के लिए जिसे पार्टी ने इतना दिया... का प्रयोग कर रहे हैं. जाहिर है कि सच का सामना आसान नहीं होता.


वरना सिंधिया के हक में तो, जिसने पार्टी के लिए इतना सहा वाली बात भी निर्विवाद रूप से कही जा सकती है. प्रदेश में करीब डेढ़ साल पुरानी कमलनाथ सरकार के बनने में सिंधिया का कम योगदान नहीं रहा. वे मुख्यमंत्री पद के सक्षम दावेदार थे. ऐसा न हो पाने की सूरत में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का ताज तो उन्हें दिया जाना बनता ही था. लेकिन ये दो बेहद अहम सम्मान तो दूर, सिंधिया को राज्यसभा की एक अदद सीट के लायक तक नहीं समझा गया. दरअसल ज्योतिरादित्य कांग्रेस के घोषित और अघोषित, दोनों ही तरह के परिवारवाद के शिकार हो गये. बीते लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की बेहद शर्मनाक स्थिति के सिंधिया अकेले जिम्मेदार नहीं थे. वहां पार्टी की कमान तो उन प्रियंका वाड्रा ने भी संभाली थी, जिन्हें इस दल ने इंदिरा गांधी जैसी चमत्कारिक शख्सियत समझकर भेजा था. जीतना तो दूर, राहुल गांधी ही कांग्रेस की परंपरागत सीट अमेठी से हार गये.


अब परिवार वाले दल में यह साहस कहां कि इस हार के लिए वाड्रा को दोषी ठहराया जाता. तो हुआ यह कि इसका ठीकरा अघोषित रूप से सिंधिया के सिर पर फोड़ा गया. और तेजी से पार्टी के भीतर वह किनारे किये जाते रहे. यह तो हुआ घोषित परिवारवाद. इधर, मध्ण्यप्रदेश में नाथ तथा दिग्विजय के बीच वाला अघोषित परिवारवाद भी सिंधिया के लिए अपमान का सबब बनता चला गया. नाथ ने एंटी-सिंधिया कैम्प की हर मुहिम को मौन समर्थन दिया. यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि इसका नतीजा घतक हो सकता है. सिंधिया ने सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने की चुनौती दी थी. जवाब में नाथ ने पूरे दंभ के साथ तो उतर जाएं वाली बात कही. ऐसा कहने से पहले वे दिल्ली दरबार में लम्बी मंत्रणा करके बाहर निकले थे. आलाकमान से मिले आशीर्वाद के बाद मेरे पास मां है की अकड़ वाली यह दंभोक्ति भाजपा के लिए वह सुनहरा मौका साबित हुई, जिसका पार्टी को दिसंबर, 2018 के बाद से ही बेसब्री से इंतजार था. भाजपा में सिंधिया का राजनीतिक भविष्य चाहे जो भी हो, लेकिन कमलनाथ सरकार के खतरे में दिख रहे वर्तमान के लिए दिग्विजय द्वारा भूतकाल में की गयी वह तमाम गलतियां दोषी हैं, जिनके लिए नाथ ...जो हैं तटस्थ समय लिखेगा उनका भी इतिहास वाली लाइन में पूरी तरह फिट नजर आ रहे हैं.


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