मैं तब उस टीवी पत्रकार पर हंसा था. तब के लिए आज शर्मिंदा हो रहा हूं. मैंने उसके वीडियो सोशल मीडिया पर देखने के बाद उसकी निंदा की थी, जिस पर अब मुझे ग्लानि हो रही है. उस पत्रकार ने किसी शख्स के कंधे पर बैठकर बाढ़ रिपोर्टिंग की थी. निश्चित ही यह गलत था, लेकिन थ्योरी आफ रिलेटिविटी का दामन आज जब मजबूरी में थामा तो लगा कि वह पत्रकार केवल गलत था, बेशर्म नहीं. इस पवित्र पेशे की कई मूल भावनाओं का कातिल नहीं. यह कहने की वजह यह कि तब जो कुछ हुआ था, अब वह इतने और विकृत रूप में सामने आया है कि पराये कंधे पर चढ़े हमपेशा की वह गलती तुच्छ महसूस हो रही है. आप पढ़ रहे हैं देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर एक अखबार. मास्ट हैड के ऊपर यह दावा वाकई एक बड़े अखबार का ही है. लेकिन यह जरूरी तो नहीं हैं न कि नाम बड़ा हो तो काम भी बड़ा ही रहे. इनके बीच जमीन-आसमान का अंतर भी होता है और यह अखबार कभी भी इसका अपवाद नहीं रहा है. कल इस अखबार ने मध्यप्रदेश  के मालवा में कोरोना के हाटस्पाट बने उज्जैन की एक तस्वीर छापी

गरीब परिवेश की एक बच्ची सड़क से गेहूं के दाने बटोर रही थी. फोटो का विवरण कुछ ऐसे भावुक अंदाज में लिखा गया कि पढ़कर कलेजा मुंह को आ गया. अखबार ने बताया कि कोरोना एवं गरीबी के चलते बच्ची यूं बिखरे हुए गेहूं को बटोरकर अपना और परिवार का पेट पालने की जद्दोजहद कर रही है. कैमरे के क्लिक से लेकर कलम की सियाही तक ने मिला-जुला असर करके इस छायाचित्र को दिलो-दिमाग में पैबस्त कर दिया. लेकिन उज्जैन से ही सच का जो एक वीडियो सामने आया है वह इसे कैमरा और कलम, दोनों की कलाकारी का शर्मनाक मामला बता रहा है. संवेदना को सनसनी की तरह बेचने का यह घटिया मामला है. एक वीडियो वायरल हो रहा है. इसे युवा उज्जैन नामक संगठन ने उस बच्ची से मिलकर बनाया है. और यह सवाल भी उठाया है जब अखबार लोगों से कोरोना के नाम पर भारी दान ले रहा है तो इस अखबार के कैमरामैन और पत्रकार ने इनकी मदद क्यों नहीं की? इस वीडियो में यही बच्ची बता रही है कि वह गेहूं के दाने अपनी बकरियों को खिलाने के लिए बटोर रही थी.

और यह गेहूं भी उन्हीं लोगों ने बिखेर कर यह दृश्य क्रिएट किया. कितना निंदनीय कृत्य है यह. किसी सामान्य मामले को भावुकता का तड़का लगाकर यूं परोसा जाना निहायत ही घटिया मानसिकता के अलावा क्या कहा जाएगा. जो परिवार बकरियां पालने की हैसियत रखता हो, निश्चित ही वह इस भुखमरी की हालत में नहीं होगा कि उसे रास्ते पर बिखरे अनाज के चंद दानों में खुद की भूख मिटाने का प्रबंध दिख जाए. किन्हीं सामान्य हालात की इतनी विकृत प्रस्तुति से क्या वह सारा परिवार शर्मिंदगी का पात्र नहीं बन जाएगा. निश्चित तौर पर वह एक गरीब परिवार है और उसे उज्जैन के सामाजिक संगठन युवा उज्जैन के लोगों ने जरूरत का सामान मुहैया भी कराया. ऐसे दृश्य उन तमाम लोगों की संवेदनशीलता पर सवालिया निशान है जो इस आपदा काल में लोगों सहयोग के लिए हर जगह सक्रिय हैं. दरअसल कुछ हट कर करने का दबाव इस तरह के गुनाहों की मुख्य वजह बनता है. कॉपोर्रेट कल्चर नामक बीमारी इसकी बहुत बड़ी वजह है.


यही वह कल्चर है, जिसके तहत अखबार के हर बंदे को प्रत्येक महीने यह बताना होता है कि एक्सक्लूसिव काम के नाम पर उसने क्या-क्या किया है. जब स्वयं का परफॉरमेंस गिनाने की यह प्रक्रिया प्रमोशन और नौकरी बचे रहने का बड़ा रास्त बन जाए तो फिर कई मर्तबा वही होता है, जो यहां हुआ है. स्टाफ को उल्लेखनीय काम बताने का दायित्व सौंपना गलत प्रक्रिया नहीं है, लेकिन जब यह काम पहले अनुचित और फिर असहनीय दबाव की शक्ल ले ले तो कई मर्तबा झूठ का सहारा लेना पड़ जाता है. इसलिए इस तरह की 'हरकत' के लिए उस फोटोग्राफर और खबर बनाने वाले की निंदा के अलावा क्या अखबार के ऐसे अमानवीय प्रबंधन को कोसाना गलत होगा? इसे किसी मीडिया समूह का अंदरूनी मामला बताकर इस पर चुप नहीं रहा जा सकता है. ऐसी घटनाएं सामने आने के बाद पत्रकारों की पूरी बिरादरी हंसी का पात्र बन जाती है. सोशल मीडिया जैसा माध्यम सामने आने के बाद इन गलतियों को सारे मीडिया के लिए 'जनरलाइज' करने में देर नहीं की जाती है.
कुछ अखबारों ने वाकई इस दिशा में बहुत सुधारात्मक कदम उठाये हैं. एक राष्ट्रीय अंगरेजी दैनिक के भोपाल संस्करण ने करीब ढाई साल पहले खबर छापी थी. दावा किया कि तत्कालीन भाजपा सरकार से नाराज प्रदेश की मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने पार्टी आलाकमान से शिकायत का मन बना लिया है. जब सिंधिया बहनों ने इस खबर का तथ्यात्मक तरीके से खंडन किया तो अखबार ने पहली वाली खबर वाले आकार में ही इन बहनों का पक्ष प्रकाशित किया था. इधर इस बड़े अखबार का ही मामला याद कीजिए. अखबार ने एक आदमी द्वारा लगाए गए आरोप के आधार पर भाजपा विधायक विश्वास सारंग के खिलाफ भारी-भरकम खबर छाप दी थी. जब सारंग ने एक-एक आरोप में छिपे झूठ को उजागर कर दिया, तब भी अखबार ने कोई शर्म नहीं की. उसने अगले दिन सारंग द्वारा दिए गए तथ्यों को यह कहकर प्रकाशित कर दिया कि दरअसल उसके रिपोर्टर ने ही आरोपों की पूरी गंभीरता से तफ्तीश करने के बाद अब सच प्रकाशित कर दिया है. अब जिस मीडिया जगत में अपनी गलती को माने जाने के ऐसे अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हों, वहां यह तय है कि गलत को सही बताकर पेश किये जाने की संस्कृति को भी संरक्षण मिल ही जाएगा. यह स्थिति शर्मनाक है और है एक कड़वा सच भी.


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