डिस्कवरी चैनल का एक रोचक कार्यक्रम है. पश्चिम बंगाल के सुदूर इलाके पर आधारित. जहां रहने वालों की आजीविका काफी हद तक शहद पर निर्भर है. भारी जोखिम भरा काम. उस सुंदरबन में जाने की अनिवार्यता, जहां बाघ का निवाला बन जाने का पूरा डर रहता है. अगला मुकाबला जानलेवा असंख्य मधुमक्खियों से. धुआं करते हुए उनके छत्ते खाली कराने होते हैं. ऐसा करने तथा छत्ते को तोडऩे से पहले आप गुस्से से भरी करोड़ों मधुमक्खियों के बीच घिरे रहते हैं. इस सबसे बचने के बाद कहीं जाकर शहद मिल पाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऐसा ही कुछ; कर दिखाया है. तीन तलाक पर नये कानून को लागू करना आदमखोरों के जंगल में घुसकर खतरनाक मधुमक्खियों के बीच से शहद निकालने जैसी दुरूह प्रक्रिया से कम वाला मामला नहीं रहा
जाति तथा समुदाय पर आधारित राजनीति किसी ऐसे अरण्य से कम नहीं, जहां आदमखोर राजनेता यहां-वहां विचरण करते पाये जाते हैं. इसी जंगल में लगे असंख्य छत्तों के भीतर इस्लाम के; महान उपदेशों जैसा मीठा शहद तो था; किंतु छत्तों तक पहुंचना आसान नहीं था. रास्ते में मौजूद आदमखोरों का डर इसकी प्रमुख वजह रहा. सुंदरबन में बाघ से बचने का एक उपाय आजमाया; जाता है. वनरक्षक जंगल में जाने से पहले सिर के पीछे की तरफ एक इंसानी मुखौटा पहन लेते हैं. बाघ अक्सर पीछे से हमला करता है. इसलिए मुखौटे के चलते वह भ्रमित हो जाता है कि इंसान उसे ही देख रहा है. लिहाजा हमले की आशंका कम हो जाती है. शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पलट देने वालों ने ऐसे मुखौटे का ही सहारा लिया था.
खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने की कोशिश वस्तुत: मुखौटेबाजी का ही प्रतीक थी. लेकिन मोदी ने कोई मुखौटा नहीं पहना. हिम्मत के साथ इस भयावह जंगल में उतरे. आदमखोर गरजते रह गये. पीठ पीछे से हमले के मंसूबे; भी नाकाम रहे. मोदी छत्ते तक पहुचे. कांग्रेस, टीएमसी, असदुद्दीन ओवैसी, अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव, आजम खान, महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला तथा इन जैसी असंख्य मधुमक्खियों ने उन पर; हमला किया. किंतु किसी के भी डंक का कोई असर नहीं हुआ. तुष्टिकरण की राजनीति के विरोध में सुलगने वाले देशवासियों की कमी नहीं है. मोदी के इस कदम के समर्थन में यह सुलगन कुछ यूं बढ़ी कि सारा का सारा माहौल धुएं से भर उठा. मधुमक्खियां हार गयीं और मोदी अनगिनत मुस्लिम बहनों के लिए राहत भरा शहद लेकर आने में कामयाब रहे.
कैसी विडंबना है कि कट्टर से कट्टर मुस्लिम देशों ने पहले ही तीन तलाक को अपने यहां अवैध घोषित कर रखा है. मानसिक जहालत से परिपूरित होने के बावजूद पाकिस्तान जैसे देश ने इस&; कलंक से मुक्ति पायी है. किंतु भारत में खुद मुस्लिम समाज के नुमाइंदे ही इस कुप्रथा को जारी रखने पर जोर दे रहे हैं. वे इस बात को हजम ही नहीं कर पा रहे हैं कि मोदी सरकार उनके समुदाय की महिलाओं को नरक से बाहर ला रही है. फिर नये कानून के विरोध की एक बड़ी वजह तो बहुत ही हास्यास्पद है. तलाक देने की सूरत में जेल जाने के प्रावधान की निंदा की गयी. कहा गया कि ऐसा होने पर आरोपी के परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा. यानी कानून से नाराज वर्ग यह मानता है कि मुस्लिम महिलाएं आज तक इतनी सशक्त नहीं बनायी गयी हैं कि पति के बगैर वे परिवार को चला तक नहीं सकतीं.


उनकी इस दशा के जिम्मेदार इस धर्म के ऐसे स्वयंभू ठेकेदार नहीं तो फिर और कौन हैं? भरण-पोषण की चिंता का यही आधार है तो फिर देश में हरेक विवाहित पुरुष के किसी भी अपराध की सजा पर रोक; लगा दी जाना चाहिए. यही तर्क दिया जाना चाहिए कि आरोपी जेल चला गया तो उसके परिवार की स्थिति बिगड़ जाएगी.; यह सही है कि जिन्हें नहीं सुधरना, वे कानून के बाद; भी नहीं सुधरेंगे, किंतु इससे भी बहुत बड़ा सच यह कि यह कानून सुधारवाद की दिशा में बहुत ऐतिहासिक कदम है. रक्षाबंधन के  पर्व की वेला में मोदी सरकार ने करोड़ों मुस्लिम महिलाओं की रक्षा का जो कदम उठाया है, उसकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है. इसकी ङ्क्षनदा करने वालों की कमअक्ली पर तरस ही खाया जा सकता है. देश में और भी कई ऐसे सुधारों की जरूरत है, उम्मीद है कि मोदी इस दिशा में भी ध्यान देंगे और आदमखोरों से भरे भयावह जंगल में पहुंचकर मधुमक्खियों का भय पाले बगैर यूं ही नवाचार का मीठा शहद इस देश को संचारित करते रहेंगे.


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