वर्ष 2014 के आम चुनाव में केन्द्र में एकल बहुमत हांसिल कर सहयोगी दलों के साथ पीएम नरेन्द्रभाई मोदी के नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र सरकार का गठन किया... इसके बाद एक एक करके कई राज्यों में भी भाजपा ने प्रादेशिक सरकारों का गठन किया, लेकिन यूपी चुनाव में आश्चर्यचकित कर देनेवाली कामयाबी के बाद भाजपा के विजय रथ की रफ्तार धीमी पड़ गई... गुजरात चुनाव जैसे-तैसे जीता तो राजस्थान के उपचुनाव में भाजपा बुरी तरह-से नाकामयाब हो गई.
केन्द्र में भाजपा सरकार आने के बाद हौंसले बुलंद थे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दस करोड़ भाजपा सदस्यों का लक्ष्य लेकर निकल पड़े, नतीजा? वे भाजपा का सदस्यता का बड़ा लक्ष्य पाने में तो सफल होते गए, लेकिन गुजरते समय के साथ भाजपा समर्थक कम होते गए? कम-से-कम अभी के चुनावी नतीजे तो यही संकेत दे रहे हैं कि भाजपा के सदस्य बढ़ते गए, समर्थक घटते गए.
ऐसा क्यों हुआ? इसका जवाब इतना आसान नहीं है, फिर भी कुछ प्रमुख बिन्दु हैं जो इशारा कर रहे हैं कि भाजपा को लेकर जनता की सोच में बदलाव क्यों आ रहा है...
* भाजपा की ज्यादातर प्रादेशिक सरकारें केन्द्र सरकार के सापेक्ष बेहद कमजोर साबित हो रही हैं, हालांकि केन्द्र सरकार के कामकाज को लेकर भी जनता कुछ खास खुश नहीं है किन्तु देशहित के मद्देनजर केन्द्र सरकार के प्रति आक्रमक नहीं है.
* भाजपा इन चार वर्षों में सैद्धान्तिक तौर पर जितनी प्रभावी रही है उतनी ही प्रायोगिक तौर पर अप्रभावी रही है.
* आतंकवाद नियंत्रण, स्वच्छता अभियान, कालाधन नियंत्रण जैसे मुद्दों पर जनता ने केन्द्र सरकार पर भरोसा भी किया और साथ भी दिया किन्तु आमजन की मूल जरूरतों... रोटी-रोजगार से जुड़े अच्छे दिनों का इंतजार?... इंतहा हो गई इंतजार की.
* वर्ष 2014 में आमजन को पीएम नरेन्द्र मोदी और भाजपा, दोनों पर पूरा भरोसा था, किन्तु इस वक्त? पीएम मोदी पर तो जनता का भरोसा अब भी कायम है, पर भाजपा की पकड़ कमजोर हो रही है. 
* देश को नरेन्द्रभाई मोदी जैसे नेतृत्व की जरूरत तो अब भी है, पर भाजपा का क्या? 
* केन्द्रीय भाजपा अपने सहयोगी दलों की तो दूर, अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भी नहीं सुनती है.
* आमजन को ही नहीं, भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं को भी लगता है कि केन्द्रीय भाजपा एक तरफा निर्णय लेती है और किसी भी सलाह/सवाल पर ध्यान नहीं दिया जाता है.
* भाजपा की प्रादेशिक सरकारें केन्द्र सरकार की छाया की तरह काम कर रही हैं. ये सरकारें प्रदेश की जनता की जरूरतों और उम्मीदों को छोड़ कर केन्द सरकार के विविध कार्यक्रमों की कामयाबी में ही जोरशोर से जुटी हुईं हैं.
* आमजन को पहले की कांग्रेस सरकार और अभी की भाजपा सरकार के इरादों में तो फर्क महसूस होता है किन्तु कामकाज के तौर-तरीकों में कोई खास अंतर नजर नहीं आ रहा है... ताजा कई घोटालों ने केन्द्र सरकार के प्रभावी नियंत्रण पर भी प्रश्रचिन्ह लगा दिए हैं?
* पद्मावत, आर्थिक/जातिगत आधार पर आरक्षण जैसे मुद्दों पर केन्द्र सरकार की भूमिका पर भी बड़ा प्रश्रचिन्ह है? ऐसे मुद्दों को लेकर केन्द्र सरकार न तो कोई नीति बना रही है और न ही कोई निर्णय ले रही है. कितनी अजीब बात है कि जहां एक ओर भाजपा की कईं प्रादेशिक सरकारें फिल्म पद्मावत पर प्रतिबंध लगा रही थी, वहीं केन्द्र की भाजपा सरकार हिंसा, विरोध प्रदर्शन की मौन-दर्शक बनी हुई थी? 
* आमजन की नजर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा की केन्द्र सरकार, कांग्रेस की पहले की सरकार से किस तरह बेहतर है? क्योंकि... सरकारी कामकाज वैसा ही है... जन समस्याएं वैसी ही हैं... घोटाले वैसे ही हैं, और... जवाब के इंतजार में सवाल भी वही हैं. 


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