इतने दिनों की बेबुनियादी सूरत (गुजरात) कपडा मार्किट में आंदोलन कर के मुँह छुपाना पड़ रहा है. बिना कुछ साबित किये ही लोगों  को बेकारी के आंदोलन में झोंक दिया. अब  बताना पड़ रहा है कि प्रमाण देखो कि हमने मंत्रियो से मुलाकात करने गए तो सही वहाँ भले ही मुँह की खानी पड़ी .गुजराती हुक्मरान इतने बुरे वक्त से पहली बार गुजरे , जब आंदोलन  करके  भी  खुद को प्रमाण देने पड़ रहे हैं. बड़ी मुश्किल है. आंदोलन में भाषण बाजी भी करो , नेता गिरी भी करो और प्रमाण भी पेश करो. इससे पहले भी सूरत कपडा व्यापारी के छोटे मोटे आंदोलन तो हुए परन्तु  लोगों को  दिखता था. 
जनता बड़ी दुष्ट है. इस पर कोई भला लीडर कैसे भरोसा करे? जब बताया जाता है कि देखो कैसा चकाचक एयरपोर्ट बन गया है,उस पर फ्लाइट की रूट भी बढ़ा दी गयी है तो लोग भरोसे  की जमीनों में  गोते लगाने लगते हैं. इनकी नजर सिर्फ उफनती गटर की बदबू पर जाती है, गटर खोदने में मिले काम से हुए आर्थिक विकास पर नहीं जाती. इनकी नजर रेट लिस्ट पर जाती है, फ्रिजर में रखे सेब की गोलाई और चमक पर नहीं जाती. आम जनता न सिर्फ मूर्ख है, बल्कि मजबूर भी है और शायद खुद्दार भी .जिसे दुकान का शटर खोलने में वक़्त लग भी जाये परन्तु जमीं पर बिछे चिलर खुद की झोली में लेने से शर्मशार तो होना ही होगा.
पर आप यह बात सरेआम क्यों नहीं कहना शुरू कर देते? जनता को आत्म निरीक्षण करने के लिए मजबूर के साथ मजबूत होना पड़ेगा. उसका अज्ञान छंटेगा और खुद्दारी का अहं टूटेगा तो सहृदय पवित्र जनता की उज्ज्वलता प्रकट होगी. इस उज्ज्वलता में वह आप जैसे महान नेता के नेतृत्व  निर्माण को देखकर धन्य होना तय कर लेगी.
हम आंखों में मंजन  डालकर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि देखो हम कहाँ कहाँ मरे-मरे नहीं फिर तस्वीरें भी सबूत के तौर  पर खिंचवाई . हमारे पास प्रमाण है कि हम बड़े मंत्रीयों  से मुलाकात करने गए थे  अपनी बात भी रखी थी .परन्तु कुछ खास नहीं हुआ और उसकी पूर्ति के लिए आपको इतना  सहन करना पड़ा
जो हुआ है, वह हमने किया है. जो नहीं हुआ है, वह दूसरों की वजह से नहीं हुआ है. हम तो करने के शौकीन हैं. करते रहे. अभी जो आप दुकाने खोल कर इतना मशकत करने के लिए  चहक रहे हैं, वह टेक्नोलॉजी भी तो हमारी दी हुई  ही है. पर जनता इस वरदान को नहीं समझती. यदि पहले ही ये  
जीएसटी का फंडा अपना कर कार्य कर दिया होता तो शायद ही नहीं यक़ीनन गुजरात आज छह -सात महीने पीछे नहीं होता तरक्की में . आपको अभी समझ में  भी नहीं आएगा क्यूंकि  आप हमारे खिलाफ हैं.
आपको जब निर्माण नहीं दिखता तो आपको प्रमाण देखने चाहिए.
वे मुझे प्रमाण देखने की राय दे रहे हैं. मैं निर्माण देखने की जिद कर रहा हूं. बच्चा बीस साल का होगा तो मूंछों की रेखा चमकेगी, पर सरकारें मानती हैं कि वे बच्चे को जीने दे रहे थे, इसीलिए तो वह जवान हो पाया. उनका मानना है कि प्रमाण है कि  कार्य हुआ है. मैं कहती  हूं, कहीं प्रमाण देने के लिए ही तो आंदोलन नहीं हुआ है? जब कोई चीज सिद्ध करनी होती है, तो प्रमाण तैयार किए जाते हैं. राजा के पास वस्त्र नहीं थे, लेकिन प्रमाण था, क्योंकि पूरे जुलूस भर लोग कहते रहे, राजा का वस्त्र कितना सुंदर है. सिर्फ एक बच्चे ने कहा, राजा नंगा है. तो, जो बच्चे ने कहा, वह लाखों के लिए सच का सच होना था. 
राजाओं के पास प्रमाण-निर्माण की फैक्टरी होती है. वे प्रमाण पहले बनाते हैं, निर्माण बाद में साबित हो जाता है. आपको प्रमाण चाहिए या निर्माण चाहिए? राजा कहते हैं, प्रमाणों का क्या है, वो तो कत्ल में कातिल के पक्ष में भी जुटाए जा सकते हैं. आप हां कहते हैं तो वे कातिल को आजाद कर देते हैं. फिर वे प्रमाण दिखाकर कहते हैं, मकतूल ही कातिल था. आप तालियां बजाते हैं, वे अगले प्रमाण के निर्माण में लग जाते हैं.

वे बता रहे हैं, सूरजमुखी उधर नहीं देख रहा जिधर सूरज है, सूरज उधर की ओर मुड़ गया है जिधर सूरजमुखी था. वे आपके खरबूजे की शक्ति परखने के लिए छुरी पर गिरने का प्रमाण जुटाने को उद्धत हैं. वे ध्रुवीय भालू दिखा रहे हैं और कहते हैं यह जमकर बरफ होने का प्रमाण है. वे गरीब का पतला पेट दिखा रहे हैं और प्रमाण है कि यह सरकारी डाइटिंग प्रोजेक्ट का परिणाम है. वे खा रहे हैं और कहते हैं, यह देश की समृद्धि का प्रतीक है.

किसी जमाने में उन्होंने बताया था कि हमारे सात कदम सूरज की ओर चल रहे हैं. उन्हीं के नक्शे-कदम पर किसी ने इंडिया के पीले चेहरे को पीली रोशनी में शाइनिंग का प्रमाण दिखा दिया था.प्रमाणों की फैक्टरी चल रही है. पर यह फैक्टरी वही प्रमाण निर्मित करती है, जिसके पीछे उनका धंधा टिका है.अब ये तो तय करना अब भी मुश्किल ही है कि आंदोलन प्रमाण बना या निर्माण.


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