डेरा सच्चा सौदा के मुखिया पर फैसले से सालों बाद पता चला कि बाबा राम रहीम न तो इंसान है और न ही कोई संत, बल्कि वह तो शैतान है. सुनकर लाखों लोगों की आस्था को झटका लगता है. इसी तरह से कुछ और साधु वेषधारी कानून के शिकंजे में हैं. क्योंकि उन्होंने दुष्कर्म किया है. यह हमारी आस्था के साथ छल है. आस्था खतरे में है और समाज चिंता में कि आखिर भरोसा किस पर करें.

हमारी धार्मिक आस्थाएं बहुत मजबूत हैं. उसी आस्था के प्रभाव के बल पर युगों युगों से हमारा देश, दुनिया भर में भारत महान और विश्वगुरू के रूप में माना गया है. लेकिन पिछले कुछ समय से धर्म के नाम पर धार्मिक आस्था का गलत फायदा उठानेवाले जिस तेजी से कानून के दायरे में आते जा रहे हैं, उससे हमारी आस्था का आधार ही डगमगाने लगा है. साधु संतों को हमारे समाज में भगवान के दूत में रूप में सम्मान देने की परंपरा रही हैं. लेकिन जब पता चलता है कि साधु के वेश में हमारी आस्था के साथ छल हो रहा है, तो फिर पूरी धर्म व्यवस्था से ही समाज का मन उठ जाता है. आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है. ताजा मामला बाबा राम रहीम का है. उससे पहले, आसाराम बापू, रामपाल महाराज, राधे मां और स्वामी नित्यानंद जैसे लाखों और करोड़ों की संख्या के अनुयायियोंवाले साधु आज कानून के शिकंजे में हैं. उन पर भयानक, संगीन और शर्मनाक आरोप हैं. हो सकता है, वे कल निर्दोष और निष्कलंक भी छूट जाएं, लेकिन आज तो सच्चाई यही है कि ऐसे लोगों की वजह से हमारी आस्था खतरे में है. समाज का संकट यह है कि जिनके प्रति हमारी आस्था रही है, वे ही जब हमसे छल कर रहे हैं, तो हम भरोसा किस पर करें.

हमारा समाज धर्म को हमेशा अपने से ऊपर मानता है, उसे श्रेष्ठता का सम्मान देता है. इसीलिए धार्मिक नेताओं और धर्म गुरुओं की बात को स्वीकारता है. उनके निर्देशों का अनुसरण करता है. उनकी मान्यताओं को पालता है. लेकिन संभवतया इसी की आड़ में कुछ लोग धोखे से धर्म के ठेकेदार बन कर समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. आश्चर्य इस बात का है कि आस्था के आवरण में धर्म के जरिये धोखा देने का धंधा इतनी तेजी से धमक पड़ा है कि समझ ही नहीं आता किस पर समाज भरोसा करें, और किस पर नहीं. भोले भाले सामान्य लोग ही नहीं, अच्छा - खासा उच्च शिक्षित वर्ग भी बहुत बड़ी संख्या में धर्म के धंधेबाजों की बातों में बहककर आए दिन अपना सर्वस्व लुटाता दिख रहा है. ऐसे ही लाखों अतिआस्थावान श्रद्धालुओं के कारण कोई चमत्कारी बाबा, तो कोई सिद्ध महापुरुष, कोई संत तो कोई गुरू और कोई स्वामी जैसे अनगिनत तरह के रूप धरकर महापुरुष या अवतार के अस्तित्व में समाज में छा गए हैं.

हमारा देश संत परंपरा का संवाहक रहा है. हमारा इतिहास महान संतों से भरा पड़ा है. तुलसीदास, नानक, मीरा, सूरदास कबीर, रैदास, दादू दयाल, चैतन्य महाप्रभु, रामानंद, माधवाचार्य, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, समर्थ रामदास, स्वामी दयानंद, विवेकानंद, राजेंद्रसुरि, दर्शन सागर जैसे महान संत भारतीय समाज के मार्गदर्शक रहे हैं. लेकिन आज देखें, तो संत के नाम पर बाबा राम रहीम, आसाराम बापू, रामपाल महाराज, राधे मां, स्वामी नित्यानंद जैसे कई लोग हैं, जिन पर चल रहे कानूनी मामलों के आधार देखकर कहें, तो भारतीय जनमानस की धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़ करते हुए इन्होंने जीवन के न केवल सारे ऐशोआराम किए है, बल्कि आश्रम जैसी पवित्र जगहों को को ही अपनी अय्याशी का अड्डा भी बनाया.

बीते बीस सालों का इतिहास देखें, तो देश भर से करीब 2 हजार से भी ज्यादा छोटे बड़े ढोंगी साधु महात्माओं की पोल खुलकर देश के सामने आई है. जमीन हथियाने से लेकर, हत्या, बलात्कार, गुंडागर्दी, देहशोषण जैसे उनके कारनामे जगजाहिर हुए हैं. इनमें से ज्यादातर ने बहुत चालाकी के साथ खुद को सबसे पहले तो समाज में अपनी छवि चमकाई. फिर आश्रम की स्थापना करके समाज में अपना आधार बढ़ाया. उसके बाद अपने भक्तों के कुनबे को और बढ़ाने के लिए उन्होंने पहले तो गांव, गली, और विभिन्न जगहों पर अपने प्रवचनों के आयोजन किए. और उसमें जैसे ही सफलता मिली, तो मीडिया को माध्यम बनाकर टीवी पर प्रवचन के लिए अवतरित हो गए. फिर बहुत तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार किया. 

 

उसके बाद एक सोची समझी रणनीति के तहत देश के बड़े बड़े शहरों में समय - समय पर धार्मिक आयोजनों के जरिए उन्होंने अपने कद को विस्तार दिया. बड़ा शहर, तो बड़े लोग और फिर दान भी बड़ा. सो, उनको बड़ा बनते देर नहीं लगी. और जब बड़े हो गए, तो फिर काम उनको बड़े करने चाहिए थे. लेकिन समाज के कल्याण की प्राथमिक सोच न होने के कारण ज्यादातर लोग धर्म के नाम पर लोगों को झांसे देकर स्वार्थपूर्ति में ही रहे. कोई जमीन हथियाने में रहा, तो कोई महिलाओं पर गलत नजर डालकर अपनी गंदी सोच में डूबा रहा. किसी ने हत्या करवाई, तो कोई आर्थिक घोटाले करने में लगा रहा.

संत हमारी परंपराओं के पैरोकार होते हैं, धार्मिक दूत होते हैं, और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक होते हैं. उन्हीं पर हमारी आस्था का आधार टिका होता है. इसीलिए सामान्य लोग ही नहीं, राजा महाराज भी सदा सदा से उनके समक्ष शीश नवाते रहे हैं. लेकिन आज के हालात देखें, तो जो संत, स्वामी और बाबा नाम के लोग कानून के दायरे में हैं, जेल में हैं यै जिन पर मुकदमे चल रहे हैं, उनके बारे में साफ कहा जा सकता है कि वे भारतीय जनमानस की धार्मिक आस्थाओं से खिलवाड़ करते हुए समाज के विश्वास के सथ छल कर रहे हैं. वर्तमान स्थिति में देखे, तो ये सारे लोग अपने कुकर्मों की वजह से जेल के भागीदार हैं.

 

हो सकता है, इन लोगों पर लगे ये सारे आरोप गलत साबित हों जाएं और वे निर्दोष छूटकर फिर से समाज का अंग बन जाएं. या किसी को दोषी होने का बावजूद तथ्यों के अभाव में सजा न मिले. लेकिन यह भी हो सकता है कि आनेवाले समय में कुछ और लोग कानून के शिकंजे में आ जाएं. पर, हमारी धार्मिक आस्थाओं के साथ इसी तरह से छल होना जारी रहा, और उसके परिणाम स्वरूप ईश्वरीय सत्ता की ओर ले जानेवाली संत संस्था से ही समाज का भरोसा डगमगा गया, तो समाज को धर्म की राह कौन दिखाएगा. हमारा समाज धर्म के प्रति हमारी आस्था पर टिका है. आस्था की वजह से ही हमें विश्वास की प्राप्ति होती है. लेकिन छल जब आस्था के साथ ही होने लगे, कपट जब श्रद्धा के साथ ही किया जा रहा हो, तो धर्म पर विश्वास कैसे बचेगा, और हमारी आनेवाली पीढ़ियों को हमारी सभ्यता और संस्कृति के प्रति श्रद्धा कैसे पैदा होगी, मेरी चिंता सिर्फ यही है.


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