देर आयद दुरुस्त आयद !

सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसलों से-देश का-आम आदमी कुछ बातें सोचने के लिए मजबूर हो गया-है. आईये समझते-हैं कैसे ? इसे समझने के लिए कोर्ट के कुछ ताज़ा फैसलों पर एक नज़र डालते हैं ,

1. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मन्दिर में हर उम्र की स्त्री को प्रवेश का अधिकार देकर सालों पुरानी धार्मिक प्रथा का अंत कर दिया है. लेकिन बेंच में शामिल एकमात्र महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने पाबंदी का समर्थन करते हुए कहा कि धार्मिक रीति रिवाजों में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए.

2. इससे दो दिन पहले राम मंदिर मुकदमे पर सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 2:1 के बहुमत से अपना ताजा फैसला सुनाया. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने फारूकी के निर्णय को सही ठहराया कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है जबकि जस्टिस नजीर का मानना था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना धार्मिक आस्था से जुड़ा मामला है इसलिए इसे वृहद पीठ को सौंपा जाए.

3. इससे कुछ समय पहले ट्रिपल तलाक के केस में भी फैसला 3:2 के बहुमत से आया था जिसमें दो जजों चीफ जस्टिस खेहर और जस्टिस नजीर ने अल्पमत में दिए अपने फैसले में कहा था कि तीन तलाक धार्मिक प्रथा है इसलिए कोर्ट इनमें दखल नहीं देगा.

इन फैसलों के विरोध में जिन जजों ने अपना पक्ष धार्मिक आस्था के नाम पर रखा उनका पक्ष एक साधारण-पुरुष अथवा महिला-के नाते सही-हो सकता है लेकिन एक न्यायाधीश के पद पर बैठे एक जिम्मेदार व्यक्तित्व के नाते नहीं, दरअसल सुप्रीम कोर्ट को यह बात समझनी चाहिए कि देश का नागरिक सुप्रीम कोर्ट के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखता है. जब वह हर तरफ से हार जाता है, सिस्टम के आगे घुटने टेकने के लिए विवश कर दिया जाता है तो वह कोर्ट की शरण में जाता है. इसलिए न्यायाधीश की कुर्सी-पर बैठे जज को यह समझना चाहिए की इस समय-वह न्याय का देवता है. इसलिए उसे-हर भावना से ऊपर उठकर, पंथ समप्रदाय से परे होकर केवल एक न्यायाधीश बनकर- सोचना चाहिए ना की एक महिला अथवा पुरुष .

यह बात इसलिए भी कहनी पड़ रही है क्योंकि अयोध्या में बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने इतने सालों बाद-अपने ताजा फैसले में अब जाकर यह स्पष्ट कहा कि इस मामले को वह धर्म अथवा धार्मिक आस्थाओं के नजर्रिये से नहीं देखेगा . इस विवाद में वह केवल तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही निर्णय लेगा. निसंदेह यह स्वागत योग्य ऐसा निर्णय है जिसकी प्रतीक्षा देश को लम्बे समय से थी लेकिन यह भी सत्य है कि इस निर्णय को लेने में माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कई साल लग गए.

सुप्रीम कोर्ट को यह कहने में इतना समय लग गया कि हमारे लिए यह मामला आस्था का नहीं बल्कि एक आम भूमि विवाद है इसलिए इस मामले में भावनात्मक और राजनैतिक दलीलें नहीं सुनी जाएंगी. सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले की सुनवाई को अगले लोकसभा चुनावों तक टाल देने की मांग की थी. अब-शायद उन्हें अपनी इस दलील का जवाब मिल गया होगा कि यह न तो एक राजनैतिक मुद्दा है और न ही धार्मिक आस्था का मुद्दा. यह केवल एक भूमि के टुकड़े पर स्वामित्व का मुद्दा है.

1853 से लेकर 2018 तक का समय-किसी मामले में फैसला लेने के लिए कम नहीं होता. वह भी तब जब यह बात इतिहास में दर्ज हो कि 1527 में बाबर के आदेश पर अयोध्या में इस मस्जिद का निर्माण किया था. यह ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हो कि 1940 से पहले इस मस्जिद को-"मस्जिद -ए-जन्म अस्थान" अर्थात जन्म स्थान की मस्जिद कहा जाता था. इस तरह इस स्थान को हिन्दुओं के आराध्य देव श्रीराम की जन्मभूमि के रूप में स्वयं ही स्वीकार किया जाता रहा हो. इसके अतिरिक्त आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की खुदाई में मस्जिद के नीचे एक भव्य मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हों!

लेकिन दिक्कत यह है कि हमारे देश में मुद्दा कोई भी हो वह गौण हो जाता है और राजनीति बड़ी. इस मामले में भी अब तक कुछ ऐसे ही हुआ. यह मानने के कई कारण मौजूद हैं कि पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा जानबूझकर इस मुद्दे को उलझाया गया. वोटों की राजनीति की गई और धर्म के नाम पर लोगों को बाँटा गया. अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति को अपनाया गया.

नहीं तो क्या कारण है कि आज तक यह विवाद खत्म नहीं हुआ ? अगर देखा जाए तो विवाद केवल यह है कि एक पक्ष का कहना है कि विवादित स्थल पर पहले एक राम मंदिर था जिसे तोड़ कर एक मस्जिद का निर्माण किया गया.-एक आम मुकदमे के ही तरह इस का फैसला भी तथ्यों और सुबूतों के आधार पर किया जाता जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने अभी कहा. लेकिन यह खेद का-विषय है कि इससे पहले इस मुकदमे के मूल विषय से अधिक इसमें एक विशेष पक्ष की-धार्मिक भावनाओं को विशेष महत्व देकर विवाद को बनाए रखा गया. लेकिन अब इस सब के पीछे छिपी राजनीति बेनकाब हो चुकी है. क्योंकि सच्चाई यह है कि आज भी इस देश के आम आदमी का पूरा जीवन अपनी रोजी रोटी और एक सम्मान जनक जीवन यापन की जुगत में ही निकल जाता है. वो बेचारा तो-इन राजनेताओं की राजनीति के चलते उन के हाथों की कठपुतली मात्र बन कर रह जाता है.

क्योंकि यह एक निर्विवाद सत्य है कि हर व्यक्ति चाहे किसी भी सम्प्रदाय का हो, ईश्वर के किसी भी रूप को मानता हो, उसके प्रति उसकी श्रद्धा उसका निजी मामला होता है और हर पंथ में यह कहा गया है कि ईश्वर को सच्चे मन से कहीं भी किसी भी समय याद किया जा सकता है. अपने आराध्य की स्तुति में भाव महत्वपूर्ण होता है स्थान नहीं. इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है स्वागत योग्य है लेकिन यह दुखद है कि इस बचकानी दलील को खारिज करने में सालों लग गए लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद.

 


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