बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने सुशासन और गुड गवर्नेस के लिए हर चुनौती का सामना कर रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख लालू प्रसाद की वजह से बिहार के भविष्य को लेकर एक बार फिर सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या बिहार अपने पुराने दिनों में लौटेगा या विकास की राह पर चलता रहेगा। नीतीश के शासन में मरता हुआ बिहार बहुत मुश्किल से ठीक हो रहा है। गरीब प्रदेश के रूप में इसकी पहचान मिट रही है। बिहार के लोगों में अच्छे दिन के आस बढ़े हैं। लेकिन बीते दिनों लालू के माफिया डॉन एवं राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के साथ कथित विवादास्पद बातचीत के टेप उजागर होने से नीतीश के सामने बिहार से राजनीतिक अपराध का चेहरा हटाने की नई चुनौती खड़ी हो गई है। इसे हटाना नीतीश के लिए आसान नहीं है। क्योंकि, उनके सामने राजनीतिक मजबूरियां हैं। बिहार में महागठबंधन की सरकार है और लालू की पार्टी महागठबंधन का हिस्सा है।

नीतीश से पहले लालू राज में बिहार में अपराध इस कदर था कि बिहार को लोग अपहरण का कारखाना मानते थे। बिहार की आर्थिक व्यवस्था बिगड़ गई थी और यह बिहार सौ साल पीछे चल गया था। लालू के बयानबाजी से दूसरे राज्यों में रहने वाले बिहारियों को बेवजह मार खानी पड़ी थी और जान बचाकर अपने गांव लौटना पड़ा था। बिहार की जागरूक जनता ने लालू को सबक सिखाया और उनके हाथ से सत्ता छीन कर नीतीश को सौंप दी थी। लगभग दो दशक तक सत्ता से दूर रहने वाले लालू अपनी राजनीतिक चाल से नीतीश से महागठबंधन करके फिर से सत्ता में लौट आए हैं। टेप विवाद से अभी बाहर निकले भी नहीं कि लालू को करोड़ों रूपए के चारा घोटाले मामले में सुप्रीम कोर्ट से भी झटका लग गया। अदालत ने अलग-अलग धाराओं में अलग-अलग मुकदमे चलाए जाने का आदेश दिया है। इससे उनके और उनकी पार्टी का क्या रूख होगा, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन नीतीश के लिए सरकार चलाना आसान नहीं है। बतौर मुख्यमंत्री नीतीश जब भी सरकार की ओर से कोई कठोर फैसला लेते हैं तो उसके लिए लालू की भी सहमति ली जाती है।

टेप प्रकरण में विपक्षी पार्टी भाजपा के हमले को कुंद करने के लिए नीतीश ने जांच के आदेश दे दिए हैं। उनका यह आदेश सिर्फ राजनीतिक नहीं है। इससे पहले शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल भिजवाने का फैसला नीतीश ने लिया था और शहाबुद्दीन की कथित राजनीतिक धमकी के बावजूद नीतीश ने लालू की नाराजगी की चिंता नहीं की थी। दूसरी ओर सत्ता पर काबिज होने के लिए ललचाई आंखों से देखने वाली भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी ने तो चारा घोटाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश आते ही नीतीश के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह लालू का साथ छोड़ दें तो भाजपा उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार है। उनके इस प्रस्ताव में बिहार की भलाई कम और सत्ता सुख पाने की लालच ज्यादा दिखती है। इसे बिहार की जनता को समझना जरूरी है।

बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन लगभग एक जैसी है। इन प्रदेशों में तमाम राजनीतिक पार्टियां अपनी वजूद को जिंदा रखने के लिए जात-पांत और अपराधियों की मदद लेती है। सत्ता की कुर्सी हासिल करने के लिए ज्यादा से ज्यादा आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को मैदान में उतारती है। ऐसे में राजनीतिक अपराध पर लगाम लगाना आसान नहीं है। बिहार विधानसभा में जो विधायक चुनकर आएं हैं उनमें से 59 फीसदी विधायक आपराधिक छवि वाले हैं। इनमें जद (यू), राजद और कांग्रेस के अलावा भाजपा के भी विधायक शामिल हैं। सबसे ज्यादा आपराधिक छवि वाले 49 विधायक लालू की पार्टी के हैं।

लालू से पहले नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर बिहार पर शासन किया था और उस काल में अपराध पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था। उन दिनों लालू की राजनीतिक ताकत काफी कमजोर थी। लेकिन अब सत्ता में आने से लालू का रूतबा बढ़ा हुआ है। उनके दो बेटे सरकार में मंत्री हैं यानी लालू के दोनों हाथ सरकारी तंत्र का काम कर रहे हैं। महागठबंधन की सरकार बनते ही बिहार में अपराध का ग्राफ बढ़ने लगा तो भाजपा ने बिहार में जंगल राज लौटने का आरोप लगाया। नीतीश को आलोचनाओँ का शिकार होना पड़ा। क्योंकि, उन्होंने गृह विभाग अपने पास रखा हुआ है। लेकिन नीतीश ने अपनी रणनीति के तहत अपराध पर काबू करने की कोशिश की। बावजूद इसके राजनीतिक नेताओं और इंजीनियरों की हत्याएं हुई। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। इस हत्या में कथित रूप से शहाबुद्दीन के शामिल होने का आरोप है। इसके अलावा तीन भाइयों की कथित हत्या मामले में भी शहाबुद्दीन आरोपी है। उस पर 40 से ज्यादा आपराधिक मामले हैं। सीवान का यह कुख्यात डॉन वर्तमान में भी राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य है। वह सीवान और भागलपुर जेल में रहकर समानांतर सरकार चलाता था। नीतीश के कानूनी प्रयास के बाद जब शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल भेजने का अदालती आदेश हुआ तब उसने नीतीश के बारे में कहा था कि वह परिस्थितियों के नेता हैं। शहाबुद्दीन के इस बयान पर लालू ने कोई टिप्पणी नहीं की थी। शहाबुद्दीन खुद मानता है कि नीतीश ने ही उसकी राजनीतिक दुर्गति की है। लेकिन लालू शहाबुद्दीन से दूरी नहीं बढ़ा पा रहे हैं। जिस चैनल ने लालू-शहाबुद्दीन का टेप उजागर किया उस चैनल का दावा है कि 15 अप्रैल 2016 को शहाबुद्दीन ने लालू के आवास पर तैनात कथित उपेंद्र के मोबाइल पर फोन किया था। इस बातचीत में वह लालू से पुलिस की कार्यशैली की शिकायत कर रहा है और हिंसा होने की घटना का जिक्र कर रहा है। इस टेप को लेकर राजद के नेताओँ का बयान है कि शहाबुद्दीन पार्टी के सदस्य हैं और उनका लालू से बात करना अपराध नहीं है। राजद के नेताओं की यह सोच बिहार में राजनीतिक अपराध की मनोवृति को बढ़ावा देने वाली है। 

नीतीश में भी एक जिद है कि वह बिहार का विकास करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने भाजपा से राजनीतिक संबंध तोड़े और जिस लालू को 20 साल तक कोसते रहे उनके साथ महागठबंधन करके नई सरकार चला रहे हैं। बिहार के कुछ लोग लालू से गलबहियां करने पर नीतीश से नाराज भी हैं। लेकिन नीतीश अपने काम से लोगों का दिल जीतने का प्रयास कर रहे हैं। जद (यू) के नेताओँ का मानना है कि जिस दिन लालू आपराधिक छवि वाले नेताओँ से मुंह मोड़ लेंगे उस दिन नीतीश को बिहार से राजनीतिक अपराध का चेहरा हटाने में कामयाबी मिल जाएगी और यह न सिर्फ बिहार की सेहत के लिए अच्छा होगा बल्कि भाजपा का बिहार में राज करने का सपना भी अधूरा रह जाएगा। नीतीश के शासन में बिहार में अपराध का ग्राफ गुजरात, केरल, राजस्थान और मध्य प्रदेश की अपेक्षा नीचे खिसक गया है। उनका दावा है कि पूर्ण रूप से शराब बंदी के कारण भी अपराध में गिरावट आई है। शराब बंदी के बाद नीतीश दहेज के खिलाफ भी अभियान शुरू कर रहे हैं। बिहार में दहेज हत्याएं काफी होती हैं। यह बिहार के लिए अभिशाप है। यह माना जा रहा है कि शराब पर पाबंदी से राजनीतिक अपराधी खफा हैं। पुलिस यह दावा कर रही है कि सैकड़ों लीटर जब्त शराब चूहे पी गए हैं। लेकिन इससे नीतीश विचलित नहीं हैं। उनका मानना है कि वह राजनीति में रहें या न रहें, शराब बंदी से समाज में बदलाव लाकर रहेंगे। इस समाज में राजनीतिक अपराधियों का चेहरा नहीं होगा।    


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