बिहार आज भी अपनी नियति पर रो रहा है। विकास की जमीन पर यह राज्य अब भी रेंगता हुआ दिख रहा है। युवाओं को अपनी तकदीर बनाने के लिए पलायन करके दूसरे प्रदेशों की मिट्टी का सहारा लेना पड़ रहा है। वह प्रदेश हमेशा गरीब रहता है जहां के युवाओं को रोजगार नहीं मिल पाता है। अफसोस, इन सबसे बिहार के राजनेताओं को कोई सरोकार नहीं है। करोड़ों रूपए के चारा घोटाले का जिन्न एक बार फिर बाहर आ गया है और भाजपा इस पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए अगले चुनाव में पहलवान बनने के लिए ताल ठोंक रही है। इस समय बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल भी मची हुई है। इससे आम लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।

चारा घोटाले मामले में अदालत के पहले के निर्णय से राजद प्रमुख लालू प्रसाद के राजनीतिक जीवन पर अंकुश लगा था। लेकिन जातिवादी राजनीति के कारण लालू को राजनीतिक वनवास नहीं मिल पाया। उन्होंने अपने दो बेटों और एक बेटी के सहारे पूरी तरह से राजनीतिक ताकत हासिल कर लिया है। महागठबंधन की राजनीति में वह शामिल हैं और खुद को महागठबंधन का बड़ा भाई मानने लगे हैं। इसका मतलब साफ है कि वह महागठबंधन के अगुआ नेता हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चुनौती दी है कि वह अगले चुनाव में उन्हें केंद्रीय सत्ता से बाहर कर देंगे। बड़बोले लालू की इस बात को लोग उनके चुटकुले की तरह ही ले रहे हैं।

लेकिन चारा घोटाले का जिन्न जिस तरह से बाहर आया है और भाजपा जिस तरह से इस घोटाले को लेकर मुखर है उससे यह तो स्पष्ट है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में अपनाई चुनावी रणनीति का प्रयोग बिहार में कर रही है। जातिवादी गठबंधन को तोड़ने की कोशिश हो रही है। इसमें उसे कितनी सफलता मिलेगी यह तो भविष्य बताएगा। फिलहाल, भाजपा बिहार में परिवर्तन का सपना देख रही है। भाजपा को लग रहा है कि लालू की वजह से बिहार में महागठंधन टूटेगा और मोदी की लोकप्रियता के सहारे भाजपा को सत्ता पर काबिज होने में सफलता मिल सकती है। महागठबंधन तोड़ने के लिए भाजपा की ओर से जिस नेता को जिम्मेदारी सौंपी गई है उन्हें प्रदेश भाजपा के कई दिग्गज नेता स्वीकार नहीं करते हैं। यह नेता सुशील कुमार मोदी हैं जो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पुरानी गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। नीतीश की सरकार में सत्ता सुख भोगते हुए सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि बिहार को दूसरे मोदी (नरेंद्र मोदी) की जरूरत नहीं है। इसके बाद उन्हें चुनावी रणनीति से दरकिनार कर दिया गया था। भाजपा में नरेंद्र मोदी के समर्थक सुशील कुमार मोदी को पसंद नहीं करते हैं। सुशील कुमार मोदी जहां नीतीश सरकार को डगमगाने का प्रयास कर रहे हैं वहीं अगर वह बिहार के विकास के लिए केंद्र से सहायता दिलाने और बेरोजगार युवाओँ को रोजगार दिलाने का काम करते तो वह भाजपा को अगले चुनाव में फायदा पहुंचा सकते थे। लेकिन उनकी राजनीति को बिहार के लोग भी समझ रहे हैं। पिछले चुनाव में भी भाजपा की नीति को जानकर ही बिहार के लोगों ने नीतीश-लालू के गठबंधन को मजबूरी में स्वीकार कर लिया था।

इस समय नीतीश के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार में लालू की पार्टी और कांग्रेस शामिल है। नीतीश के लिए महागठबंधन की सरकार चलाना आसान नहीं है। वह बड़ी सावधानी बरतते दिख रहे हैं कि कहीं लालू की गलती का खामियाजा उन्हें भुगतना न पड़े। इसलिए वह लालू परिवार पर बेनामी संपत्ति की जांच पर भी कोई प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। वैसे भी यह लालू के परिवार का मामला है और कानूनी मामले में वह खुद को अलग-थलग रखने में ही अपनी और अपनी पार्टी जदयू की भलाई समझ रहे होंगे। जांच एजंसियों ने लालू की बेटी मीसा और उनके पति के साथ सीए को भी घेरने की कोशिश की है। इसके बाद लालू परिवार ने इसे भाजपा की बदले की राजनीति करार दिया है।  

राजनीति में लालू काफी शातिर माने जाते हैं। वह अपने राजनीतिक साथी की ताकत कमजोर करने में भी माहिर हैं। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के साथ जब गठबंधन किया था तो लालू ने पासवान का राजनीतिक जीवन ही तबाह कर दिया था। बाद में पासवान ने भाजपा का दामन थामकर अपने राजनीतिक जीवन में फिर से जान डालने का काम किया है। लालू के साथ गठबंधन करके नीतीश को भी नुकसान हुआ है। उनकी पार्टी के विधायक कम चुने गए। लेकिन नीतीश अपने काम से बिहार के लोगों का दिल जीतने का काम कर रहे हैं और उन्हें भरोसा है कि अगले चुनाव में वह जदयू को नंबर वन पर रख सकेंगे। शायद अपनी भविष्य की रणनीति के तहत ही वह लालू से दूरी बनाकर चल रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर नीतीश और लालू के विचारों में तालमेल नहीं है। इस समय लालू मजबूर हैं जिससे वह नीतीश पर कोई तीखी टिप्पणी नहीं कर पा रहे हैं। घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोपों में लालू परिवार घिरा हुआ है और लालू की राजनीति बिहार के विकास को लेकर नहीं दिख रही है। वह अपने परिवार को बचाने की राजनीति करते नजर आ रहे हैं।

हालांकि, राजनीति में कोई अछूत नहीं होता। इसलिए यह संभावना हमेशा बनी रहती है कि सत्ता सुख पाने के लिए कोई भी नेता पाला बदल सकता है। बिहार में नीतीश जिस तरह से कार्य कर रहे हैं उससे बिहार का चेहरा बहुत ज्यादा तो नहीं बदला है, लेकिन विपक्षी पार्टी भाजपा के कई दिग्गज नेता नीतीश के कार्य से खुश होकर उनकी तारीफ सरेआम करते नहीं थकते हैं। भाजपा सांसद और बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा तो नीतीश को अपना पारिवारिक सदस्य मानते हैं जो खुलकर नीतीश के समर्थन में बोलते भी हैं। बिहारी बाबू की वजह से एक खास जाति के लोग भाजपा के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं। भाजपा के एक और सांसद डाक्टर भोला सिंह तो नीतीश को बिहार की सांस्कृतिक आत्मा मानते हैं। भाजपा के ऐसे और नेता हैं जो नीतीश के साथ चुनावी रणनीति में भी खड़े हो सकते हैं। बिहार के लिए जब नीतीश ने केंद्र से विशेष दर्जा देने के मांग की तो भाजपा के भी कई नेताओं ने नीतीश के सुर में सुर मिलाया था। नीतीश को बिहार में शराबबंदी से सामाजिक और आर्थिक स्तर पर सफलता दिख रही है। गरीब महिलाओं को अब अपने शराबी पति से मार नहीं खानी पड़ती है और न ही रोटी के लिए किसी के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। यह देखकर ही नीतीश अब दहेज और बाल विवाह के खिलाफ अभियान शुरू करने जा रहे हैं जिसमें भाजपा के भी नेता शामिल होंगे। महिलाओं के विकास के लिए काम करने से नीतीश को राजनीतिक फायदा मिल सकता है। चम्पारण सत्याग्रह के बहाने नीतीश गांधी के विचारों को भी बिहार में फैला रहे हैं। बिहार में छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। क्योंकि, सामाजिक विकास के लिए काम करने वाले नीतीश को बड़े उद्योगपतियों का सहयोग नहीं मिल रहा है। बिहार में कोई भी बड़ा उद्योगपति उद्योग लगाने को तैयार नहीं है जबकि नीतीश उद्योगपतियों से उद्योग लगाने का अनुरोध कर रहे हैं और उन्हें सारी सुविधाएं देने का वादा भी कर रहे हैं। बावजूद इसके उद्योगपति बिहार में उद्योग लगाने में अपना प्रेम नहीं जता रहे हैं। यह माना जा रहा है कि बिहार में उद्योग न लगे इसके लिए भी राजनीति हो रही है। बिहार में राजनीति की दिशा बदलने की जरूरत है तभी बिहार में विकास संभव है।


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