बिहार में बारहवीं की परीक्षा में 65 फीसदी छात्रों के फेल हो जाने से यहां की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। यह सवाल करना लाजिमी है कि क्या बिहार में अंधे कुएं में शिक्षा मिल रही है? बिहार में शिक्षा में इतनी गिरावट क्यों आ गई है? क्या बिहार के छात्र सिर्फ चोरी से ही पास करते हैं? बिहार के युवाओं का भविष्य क्या होगा? इतने सारे सवाल सिर्फ सवाल करने के लिए नहीं हैं बल्कि बिहार की शिक्षा और युवाओं को लेकर चिंता है। बिहार और बिहार की शिक्षा कई मायनों में पहले से ही बदनाम है। बिहार से बाहर प्रतिभाशाली बिहारी युवाओँ को भी शक की निगाह से देखा जाता है और मजाक के तौर पर उनसे पूछ भी लिया जाता है कि डिग्री फर्जी तो नहीं है? यह अपमान हर कदम पर सहना पड़ता है जबकि देश को सबसे ज्यादा आईएएस अफसर देने वाले राज्यों में बिहार का भी अपना प्रमुख स्थान है। बीते दिनों यूपीएससी के नतीजे आए जिसमें 30 से ज्यादा बिहारी छात्र हैं।

यह सच है कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था बहुत अच्छी नहीं है। बावजूद इसके मेधावी छात्र बिहार से पलायन करके उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली और अन्य प्रदेशों का रूख करते हैं। लेकिन इस पलायन को रोकने या अपने ही राज्य में बेहतर शिक्षा पाने के लिए राज्य सरकार की ओर से पहल नहीं होती है। शिक्षा कुछ इस तरह से देने की कोशिश होती है जिससे छात्रों का शैक्षणिक बुनियाद कमजोर रहता है। जब कर्पूरी ठाकुर राज्य के मुख्यमंत्री थे तब उनके जमाने में कर्पूरी डिवीजन में छात्र पास करते थे यानी कि अंग्रेजी में फेल तब भी पास का प्रमाणपत्र मिलता था। बाद में पूरक परीक्षा देकर अंग्रेजी में पास करना पड़ता था ताकि बिहार से बाहर छात्रों को परेशानी न हो। बिहार में अब तक जितने मुख्यमंत्री हुए हैं किसी ने शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए क्रांतिकारी कदम नहीं उठाए हैं। इसके पीछे शिक्षा माफिया का हावी होना भी एक वजह है। पूरे राज्य में स्कूलों और कालेजों की दशा पर किसी को भी रोना आ सकता है। कहीं पेड़ के नीचे स्कूल चल रहे हैं तो कहीं स्कूल को छत नहीं है। कालेजों को मान्यता नहीं है या नियमों का पालन नहीं कर रहा है, फिर भी कागज पर चलाए जाते हैं। छात्र अपनी मेहनत से या पैरवी कराके परीक्षा में पास होते हैं। स्कूल या कालेज को शिक्षक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। महिला शिक्षक तो अपने नन्हें बच्चों की देखभाल स्कूल के बच्चों ही करवाती हैं। इन हालातों को सुधारना आसान नहीं है। क्योंकि, क्षेत्रीय मुखिया या विधायक अपने राजनीतिक प्रभाव से सरकार तक असलियत जाहिर ही नहीं होने देते। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल बांटी और फिर लड़कों को भी साइकिल दी। इससे स्कूलों और कालेजों में लड़के और लड़िकयों की संख्या तो बढ़ी, लेकिन रूबी टॉपर कांड ने सरकार को हिलाकर रख दिया। खुलेआम परीक्षा में चोरी पर लगाम लगाई गई और कोडिंग करके कॉपी की जांच कराई गई तो इस बार बारहवीं का नतीजा ही छात्रों का भविष्य बिगाड़ने का काम कर दिया। विपक्षी दल भाजपा का आरोप है कि प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों से कॉपी की जांच करवाई गई थी। अगर आरोप में सच्चाई है तो इसके लिए दोषी और शिक्षकों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

बिहार का दुर्भाग्य है कि यहां हर मामले में राजनीति की जाती है जिससे असली मुद्दा गायब हो जाता है। इस बार टॉपर गणेश कुमार को गिरफ्तार किया गया है। उस पर आरोप है कि उसने गलत उम्र बताकर बारहवीं की परीक्षा दी और संगीत के जरिए वह टॉपर बना जबकि उसे संगीत की जानकारी नहीं है। अब पूरे बिहार में घोटालों और भ्रष्टाचार का संगीत बज रहा है। बिहार में उम्र कम कराकर या दूसरे शहर से आकर परीक्षा देना कोई नई बात नहीं है। असल मुद्दा यह है कि 65 फीसदी छात्र कैसे फेल हो गए? इतने छात्रों के फेल होने का मतलब है कि अब तक जो छात्र पास होते रहे हैं उनमें से ज्यादातर छात्र गलत तरीके से पास हुए होंगे? ताज्जुब तो यह है कि कुछ ऐसे फेल छात्र हैं जो आईआईटी-जेईई की प्रवेश परीक्षा पास हो गए हैं। इनकी मेधा पर कैसे सवाल खड़ा किया जा सकता है? दो दशक पहले भी 1997 में 14 फीसदी छात्र पास हुए थे। परीक्षा में कदाचार रोकने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडे और बिंदेश्वरी दुबे ने भी कठोर कदम उठाए थे जिससे नतीजों में गिरावट आई थी। नीतीश के कड़े फैसलों से भी यह गिरावट देखने को मिल रही है। लेकिन इस नतीजे ने कई सवाल खड़े किए हैं। इसमें कुछ राजनीति हो सकती है। क्योंकि, दो साल बाद चुनाव भी होने वाले हैं। वैसे शिक्षा माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। वर्ष 2000 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री जयप्रकाश यादव को जेल जाना पड़ा था और शिक्षा राज्यमंत्री जीतन राम मांझी जमानत लेकर बच गए थे। बाद में मांझी बिहार के मुख्यमंत्री भी बने थे। वह अभी भाजपा गठबंधन में हैं। इस बार के बारहवीं के नतीजे पर नीतीश को शिक्षा माफिया के साथ राजनीतिक गठजोड़ को खत्म करने की चुनौती है। अगर वह इसमें सफल हो जाते हैं तो बिहार के साथ बिहार के युवाओँ का भी भविष्य बनेगा। नहीं तो फिर शिक्षा से जुड़े मेडिकल, बीएड जैसे कई घोटाले फिर सामने आएंगे। मेडिकल घोटाले के तार तो मुंबई से भी जुड़े थे। यहां की एक प्रिंटिंग प्रेस से पेपर लीक कराया जाता था।

परीक्षा में कदाचार या पेपर लीक की घटना सिर्फ बिहार में ही नहीं होती। बिहार से सटे राज्य झारखंड, उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। लेकिन बिहार को सबसे ज्यादा बदनामी मिलती है। बावजूद इसके बिहार में बदलाव देखने को नहीं मिलता है। यह सबसे दुखद बात है। इस बार बिहार के साथ झारखंड में भी परीक्षा के नतीजे अच्छे नहीं हैं। झारखंड के एक ऐसे स्कूल का नतीजा आया जहां से एक भी छात्र ने परीक्षा नहीं दी थी, लेकिन उस स्कूल के छात्र पास हो गए। अब इस नतीजे पर क्या कहा जाए? इससे यह तो जाहिर होता है कि व्यवस्था में गड़बड़ी है। यह गड़बड़ी राजनीति की वजह से है। शिक्षा माफिया का राजनीति से संबंध है और उस पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। यह सिर्फ बिहार, झारखंड या उत्तर प्रदेश की स्थिति नहीं है बल्कि दिल्ली में भी यही हाल है। अगर सरकार ने शिक्षा को लेकर कमर कस ली होती तो प्राइवेट स्कूलों और कोचिंग क्लासेस का व्यापार इतना नहीं बढ़ पाता। स्कूल-कालेज के छात्र कोचिंग क्लासेस में ही दिखते हैं। आज तो हालत यह है कि कुछ राज्य की सरकार कोचिंग क्लासेस चलाने वालों को सरकारी स्कूल चलाने का ऑफर दे रहे हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों में बेहतर पढ़ाई और अच्छे नतीजे की कल्पना कैसे की जा सकती है? सरकारी स्कूलों की किताबों में हर साल तथ्यात्मक गलतियां छपती हैं। कुछ स्कूल तो सिर्फ अनुदान के लिए कागज पर चलते हैं। दूसरी ओर सीबीएसई और आईसीएसई स्कूलों के नतीजों से तुलना हो रही है। वैसे, इस बार सीबीएसई के नतीजों में भी छह फीसदी की गिरावट आई है। लेकिन सवाल यह है कि बेहतर शिक्षा के लिए क्या किया जाए? बिहार की ताजा घटना पर शिक्षाशास्त्री चुप हैं। शायद उनके सुझाव भी अमल में नहीं लाए जाते होंगे। क्या यह संभव है कि जीएसटी की तरह एक पाठ्यक्रम एक देश लागू हो यानी कि पूरे देश में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में एक ही पाठ्यक्रम से पढ़ाई हो। शिक्षा के लिए बजट भी बढ़ाने की जरूरत है। बिहार में नीतीश ने इस बार शिक्षा के लिए 25 हजार करोड़ रूपए का बजट रखा है। लेकिन इसे खर्च करने में सावधानी बरतनी पड़ेगी। बेरोजगारों को सिर्फ रोजगार देने के लिए सरकार फिर से 8-10 हजार रूपए में शिक्षक की बहाली न करे। फर्जी प्रमाणपत्र के साथ नौकरी करने वाले शिक्षकों पर कार्रवाई हो। शिक्षकों को सरकारी कामों से अलग रखा जाए। शिक्षा के लिए जो बुनियादी जरूरतें हैं उसे पूरी की जाए। नीतीश के लिए अपने राज्य में बिगड़ी हुई शिक्षा व्यवस्था उसी तरह से चुनौतीपूर्ण है जिस तरह से बिहार को अपराध मुक्त करने की चुनौती है। 


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