यह आश्चर्य नहीं बल्कि चिंता का विषय है कि `पद्मावती’ फिल्म को देश की कुछ प्रादेशिक सरकारें विरोध करने वाले लोगों की भाषा बोलने लगी हैं. इससे विरोध थमेगा नहीं, अलबत्ता उन असामाजिक तत्वों को बल मिलेगा जो नरेंद्र मोदी सरकार के डर से दुबके हुए हैं. विरोध या `पद्मावती’ को बैन करने की मांग करने वाली राज्य सरकारों के रवैए से यह लगता है कि ये सरकारें अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को भूल गई हैं. ये सरकारें विरोध को शांत करने की कवायद करतीं और फिल्म में से विवादास्पद अंशों को निकलवाने के बाद उसे रिलीज कराकर दोनों पक्षों को खुश करने का काम करतीं तो समाज के लिए अच्छा होता. मगर ऐसा नहीं होने से देशभर में माहौल बिगड़ रहा है और फिल्मवालों को यह भी महसूस हो रहा है कि वे अघोषित काला कानून के शिकार हो रहे हैं.

इसमें कतई दो राय नहीं कि जब इतिहास से जुड़ी किसी कहानी पर कोई फिल्म बनती है तो फिल्मकार उसमें कुछ लिबर्टी लेने की कोशिश करते हैं जिससे ऐतिहासिक तथ्यों में घालमेल हो जाता है. लेकिन गलतियों को सुधारने के लिए सरकारी संस्था सीबीएफसी है जिसे सेंसर बोर्ड भी कहते हैं. यही संस्था सबसे पहले फिल्म देखकर उसे दर्शकों के देखने लायक प्रमाणपत्र देती है. दुर्भाग्य से इस संस्था ने अब तक फिल्म देखी नहीं है, सिर्फ फिल्म के ट्रेलर को प्रमाणपत्र दिया गया है. ट्रेलर दर्शकों को आकर्षित करने के लिए बनाए जाते हैं जिसे देखकर लोग फिल्म देखने के लिए सिनेमाघरों में पहुंचें. ट्रेलर तो कामयाब हुआ जिसने `पद्मावती’ के प्रति लोगों को जागरूक कर दिया.

इसी ट्रेलर से यह भी गलतफहमी पैदा हुई कि फिल्म में पद्मावती की कहानी के साथ छेड़छाड़ किया गया है और खलनायक अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) को महिमामंडित किया गया है. विरोध के स्वर तेज हो गए और इसमें खासकर वे नेता आगे आ गए जो भाजपा से जुड़े हुए हैं. इससे राजनीति की भी बू आने लगी और इसमें मुहर तब लग गई जब कुछ भाजपा सरकारों के मुख्यमंत्रियों ने भी विरोध में राजनीतिक फैसले ले लिए, जबकि मुख्यमंत्रियों का काम विवाद बढ़ाना नहीं बल्कि विवाद को खत्म करना होता है. शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्रियों ने सरकारी संस्था सेंसर बोर्ड की मदद नहीं ली और आंदोलनकारी की तरह `पद्मावती’ को बैन करने का फैसला ले लिया. यहां तक कि इन भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने अपनी जाति के बीच अपनी साख बनाए रखने के लिए कानून-व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देकर `पद्मावती’ को बैन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र भी भेज दिया. इन कमजोर मुख्यमंत्रियों के फैसले से मोदी की भी ताकत कमजोर होती दिखती है.

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वैश्विक स्तर पर भारत की ताकत बढ़ी है. लेकिन विरोध करने वाले इन भाजपाई मुख्यमंत्रियों ने यह एहसास करा दिया कि वे कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के मामले में कमजोर हैं. ऐसे मुख्यमंत्री सत्ता पर कैसे काबिज रह सकते हैं. महाराष्ट्र में भी भाजपा के देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री हैं जिनकी छवि मोदी की तरह ताकतवर नेता की है. अभी तक उन्होंने यूपी, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश की तरह कोई कमजोर फैसला नहीं लिया है जबकि सरकार में उनके साथ शिवसेना है जो कट्टर हिन्दुवादी राजनीतिक पार्टी है. वैसे, महाराष्ट्र सरकार का अपना इतिहास भी रहा है. जब भी किसी फिल्म का विरोध हुआ है उसने उस विरोध को खत्म करने में भूमिका निभाई है और केंद्र से सुरक्षा बल मंगाकर फिल्म को रिलीज कराने का भी इतिहास बनाया है.

`पद्मावती’ में इतिहास से छेड़छाड़ को लेकर जहां तक विवाद है तो इसे निपटाना जरूरी है. ऐसा नहीं है कि संजय लीला भंसाली को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खुली छूट दे दी जाएगी. लेकिन उनके लिए रास्ता सेंसर बोर्ड का है, दूसरा कोई रास्ता नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि विरोध करने वाले लोग कह दें कि उन्हें अब विरोध नहीं है तो भंसाली बिना सेंसर प्रमाणपत्र के फिल्म रिलीज भी नहीं कर सकते हैं. उन्हें `पद्मावती’ को सेंसर बोर्ड की कसौटी पर खड़ा उतारना ही पड़ेगा. इस फिल्म के विवाद से यह भी सवाल उठ रहा है कि पाठ्यक्रमों में जो इतिहास पढ़ाए जा रहे हैं उसमें कितनी सच्चाई है.

पिछले दिनों महाराणा प्रताप के युद्ध वाले इतिहास को बदलने की कोशिश की गई. देश की आजादी के सत्तर साल बाद इतिहास के पन्नों को बदला जाएगा तो उसे सही मानकर कैसे स्वीकार किया जा सकता है. पद्मावती का भी अपना इतिहास है. मलिक मुहम्मद जायसी ने `पद्मावत’ रचना लिखी थी और उसे अब तक पढ़ा जाता है. इस रचना की मदद भंसाली ने भी ली होगी, यह माना जा सकता है. लेकिन भंसाली को अपनी `पद्मावती’ में सही इतिहास को बताने के लिए सेंसर बोर्ड के रास्ते आगे आना चाहिए. पद्मावती सिर्फ एक महारानी नहीं थीं बल्कि वह महिला समुदाय की मान-मर्यादा भी हैं. यह बात पद्मावती की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी मानती हैं. लेकिन `पद्मावती’ को लेकर विरोध का जिस तरह से माहौल बना है उससे लगता है कि इस `पद्मावती’ से कुछ भाजपाई सरकारें भी डर गई हैं, उनका डर किस तरह का है यह तो वही बता सकती हैं. बहरहाल, डरी हुई भाजपा सरकारें विरोध का माहौल बदलने के लिए राजनीति छोड़कर सकारात्मक भूमिका अपनाएं तो इससे विवाद भी खत्म होगा और उनकी साख भी बच सकती है.


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