गिद्ध का स्वभाव होता है लाशों को नोच नोच कर खाना. स्वाभाविक ही है कि वह मृत्यु की प्रतीक्षा करता रहता है कि कब लोग मरें, अधिक से अधिक लोग मरें और मुझे अधिक से अधिक मात्रा में भोजन प्राप्त हो. कई बार तो लोग मरे न भी हों, केवल घायल पड़े हों तब भी गिद्ध मांस नोच नोच कर खाने लगता है. परमात्मा ने उसका स्वभाव ही ऐसा बनाया है.

 परमात्मा ने मनुष्यों के रूप में भी कुछ गिद्ध बनाएं हैं. उन्हें अच्छा समय रास नहीं आता, वह  दिन-रात प्रतीक्षा करते रहते हैं कि कुछ समस्या खड़ी हो, लोग सड़कों पर आएं, जगह-जगह लोग मरे पडे हों, ऐसे दृश्य देखकर उनकी आत्मा को घनघोर प्रसन्नता होती है. इस कोरोनावायरस समस्या के कारण देश में प्रवासी मजदूरों के ऊपर घोर विपत्ति आई हुई है. लोग मजबूर हैं. कहीं सैकड़ों तो कहीं हजारों किलोमीटर की यात्रा करने को चल पड़े हैं. खाने की समस्या है, रहने की समस्या है. उनका दुख असीम है. घर में बैठकर उनके दुखों की कल्पना करना भी मुश्किल है किंतु गिद्धों की मंशा पूरी हो गयी. उन्हें इनका दुख देखकर, इन्हें रास्ते पर भटकता देखकर, इनकी हालत बद से बदतर होते देख कर भयंकर प्रसन्नता हो रही है. फोटो पर फोटो खींचे जा रहे हैं, और अगर बाहर निकलने में डर लगता है और नहीं खींच पा रहे हैं तो अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट से खरीदे जा रहे हैं. वहां भी कमी पड़ रही है तो ट्रकों में यात्रा कर रहे मजदूरों को उतार कर फोटो खींचा जा रहा है और फिर उन्हें ट्रकों में वापस बिठा दिया जा रहा है. कोई कोई तो जिसने सालों साल देश पर राज किया है, जो अपनी दौलत और सामर्थ्य से उनकी जिंदगी बदल सकता था वो उनके दुःखों को कैमरे पर कैद करने की वस्तु मात्र मान कर डाॅकूमेन्ट्री बना  रहा है और यू ट्यूब पर बेच रहा है. आखिरकार गिद्धों के प्रजातियों की कमी थोड़े न है.
अगर कोई मजदूर यात्रा तो कर रहा है लेकिन बहुत दुखी नहीं दिखाई दे रहा है तो यह लोग दुखी हो जाते हैं. इनको दुखी चेहरे चाहिए, फटे हुए पैर चाहिए, मजबूरी की दास्तान चाहिए. अगर पैरों से रक्त ना निकल रहा हो तो रंग लगा कर निकाल देंगे और फोटो खींच लेंगे. सड़कों पर खड़े हुए स्वयंसेवी या सरकार या सामान्य जन जो इनकी सहायता के लिए तत्पर हैं वे इन्हें दिखाई नहीं देते ठीक वैसे ही जैसे गिद्धों को जिंदा इंसानों में कोई दिलचस्पी नहीं होती. उन्हें तो बस खून चाहिए, सड़ा हुआ मांस, ताजा मांस, कैसा भी हो बस मांस चाहिये, उसी तरह इन लोगों को भी भुखमरी के कगार पर खड़ा अधमरा मजदूर चाहिए, मर जाए तो और भी अच्छा; और अगर मरा न हो, कराह रहा हो,चित्कार कर रहा हो तब तो अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि पक्की, अवार्ड पे अवार्ड पक्का. दुखी लोगों को देखते ही ये ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे लाश पर गिद्ध. कभी सुना है कि इन्होंने किसी की सहायता की हो? कभी कोई फोटो देखी है,कोई समाचार सुना है कि इन्होंने किसी की मदद की हो? गिद्ध लाश की सहायता करने लगेगा तो खायेगा क्या? उसमें उसका क्या दोष? यह तो प्रकृति प्रदत सहज स्वभाव है.

आदमी के मरने से पहले गिद्ध दिखाई नहीं देते. कहीं  शांत, छुपे बैठे होते हैं और जैसे ही लाश देखते हैं दौड़ पड़ते हैं. हमारे समाज के गिद्ध भी ऐसे ही हैं. जब सब कुछ सामान्य चल रहा हो, जब सब कुछ अच्छा चल रहा हो यह कहीं दिखाई नहीं देते पर जैसे ही समस्या आती है दुखों का पहाड़ टूटता है, यह उसका व्यवसाय करने निकल पड़ते हैं.जिस तरह गिद्ध आसमान में ऊपर ही ऊपर उड़ते रहते हैं उसी तरह यह मानव रूपी गिद्ध भी समाज में अपना स्थान हमेशा ऊंचा ही समझते हैं. सहायता करना तो क्षुद्र लोगों का काम है, इन सभ्रांत गिद्धों के लिए तो फोटो खींचना, उस फोटो को बेचना और फिर बड़े-बड़े आलीशान कैफे में बैठकर उस फोटो पर चर्चा करना अधिक महत्वपूर्ण कार्य है. इसके बिना उन्हें अपने बुद्धिजीवी होने का अहसास ही नहीं होता. जब बहुजन समाज रोता है तब यह हाथों में जाम लेकर जश्न मनाते हैं.
मशहूर दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र ने कहा है- 'मनुष्यों के अंदर की दुष्टता,अन्याय और स्वार्थ अब मुझे परेशान नहीं करते. यह उतना ही सहज है जितना बंदरों की शरारत, भेड़ियों का शिकार करना या गिद्धों की कभी ना मिटने वाली भूख....


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