एक पुरानी कहावत है कि सौ कोस में पानी और सौ कोस में बानी बदल जाती है और जब नए जमाने के रेडियो की बात करते हैं तो यह कहावत सौ टका खरा उतरती है. भोपाल में आप जिस एफएम को सुन रहे हैं, वह सीहोर होते हुए उज्जैन और देवास में उसकी बानी बदल जाएगी. इन शहरों में एफएम चलेगा वही लेकिन उसकी बानी बदल जाती है. भोपाल में कों खां सुन रहे होते हैं तो इंदौर का एफएम आपको भिया कहता हुआ सुनाएगा. इस वेरायटी ने रेडियो की दुनिया को बदल दिया है. वैसे रेडियो के आविष्कार मारकोनी को लोग भूल गए होंगे, यह स्वाभाविक भी है लेकिन उनके बनाये रेडियो को हम कभी नहीं भूल पाएंगे. संचार के सबसे प्राचीन किन्तु प्रभावी तंत्र के रूप में रेडियो ने समाज में स्थापित है. रेडियो का मतलब होता था ऑल इंडिया रेडियो जो बाद में आकाशवाणी हो गया. नए जमाने में, नए दौर का रेडियो प्रचलन में है और उनमें सबसे ज्यादा पॉपुलर एफएम रेडियो है. रेडियो से कम्युनिटी रेडियो की तरफ बढ़ते कदमों को देखकर आप नए भारत की बदलती सूरत को देख सकते हैं. भारत में कम्युनिटी रेडियो अभी शैशवस्था में है तो दुनिया के कई देशों ने इसे अलविदा कह दिया है. वे अब वेब रेडियो और डिजीटल रेडियो की दुनिया में प्रवेश कर गए हैं. भारत के लिए कम्युनिटी रेडियो अभी एक नया अनुभव है लेकिन रेडियो से कम्युनिटी रेडियो और इन दोनों के बीच एफएम रेडियो के सफर को जानना रोचक होता है.
रेडियो का इतिहास बताता है कि जगदीश चन्द्र बसु ने भारत में तथा गुल्येल्मो मार्कोनी ने सन 1900 में इंग्लैंड से अमरीका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश भेजने की शुरुआत कर दी थी, पर एक से अधिक व्यक्तियों को एक साथ संदेश भेजने या ब्रॉडकास्टिंग की शुरुआत 1906 में फेसेंडेन के साथ हुई. ली द फोरेस्ट और चाल्र्स हेरॉल्ड जैसे लोगों ने इसके बाद रेडियो प्रसारण के प्रयोग करने शुरु किए. तब तक रेडियो का प्रयोग सिर्फ नौसेना तक ही सीमित था. 24 दिसम्बर 1906 की शाम कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन ने जब अपना वॉयलिन बजाया और अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो ऑपरेटरों ने उस संगीत को अपने रेडियो सेट पर सुना, वह दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत थी. इससे पहले 1917 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद किसी भी गैर फौजी के लिये रेडियो का प्रयोग निषिद्ध कर दिया गया. 1927 तक भारत में भी ढेरों रेडियो क्लबों की स्थापना हो चुकी थी. 
भारत में रेडियो प्रसारण की पहली शुरुआत जून 1923 रेडियो क्लब मुंबई द्वारा हुई थी लेकिन इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी के तहत देश के पहले रेडियो स्टेशन के रूप में बॉम्बे स्टेशन तब अस्तित्व में आया जब 23 जुलाई 1927 को वाइसराय लार्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया. 1936 में भारत में सरकारी ‘इम्पेरियल रेडियो ऑफ इंडिया’ की शुरुआत हुई जो आज़ादी के बाद ऑल इंडिया रेडियो या आकाशवाणी बन गया. नवंबर 1941 में रेडियो जर्मनी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का भारतीयों के नाम संदेश भारत में रेडियो के इतिहास में एक और प्रसिद्ध दिन रहा जब नेताजी ने कहा था, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा.’ इसके बाद 1942 में आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना हुई जो पहले जर्मनी से फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिये समाचार प्रसारित करता रहा. सन 1947 में देश के विभाजन के समय भारत में कुल 9 रेडियो स्टेशन थे, जिनमें पेशावर, लाहौर और ढाका तीन पाकिस्तान में चले गए, भारत में दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ के 6 केंद्र रह गए, लेकिन आज देश में रेडियो के कुल 420  प्रसारण केंद्र हैं और आज देश की 99.20 प्रतिशत जनसँख्या तक आल इंडिया रेडियो का प्रसारण पहुंच रहा है.
स्वतंत्रता के पश्चात से 16 नवम्बर 2006 तक रेडियो केवल सरकार के अधिकार के था. धीरे-धीरे आम नागरिकों के पास रेडियो की पहुँच के साथ इसका विकास हुआ. टेलीविजऩ के आगमन के बाद शहरों में रेडियो के श्रोता कम होते गए, पर एफएम रेडियो के आगमन के बाद अब शहरों में भी रेडियो के श्रोता बढऩे लगे हैं. पर गैरसरकारी रेडियो में अब भी समाचार या समसामयिक विषयों की चर्चा पर पाबंदी है. 1995 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है. वर्ष 2002 में एनडीए सरकार ने शिक्षण संस्थाओं को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी. 16 नवम्बर 2006 को यूपीए सरकार ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी गई है. 
मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की उपयोगिता एवं प्रभाव का विश£ेषण करते हैं तो पाते हैं कि समूचे भारत वर्ष में मध्यप्रदेश इकलौता राज्य है जहां राज्य शासन द्वारा 9 कम्युनिटी रेडियो का संचालन किया जा रहा है. 8 रेडियो स्टेशन मध्यप्रदेश के आदिवासी जिलों में स्थापित हैं तो देश का पहला स्वाधीनता संग्राम पर केन्द्रित रेडियो आजाद हिन्द भोपाल से संचालित होता है. राज्य के जनजातीय विकास विभाग के उपक्रम वन्या द्वारा आरंभ किए गए रेडियो वन्या में कार्यक्रमों का प्रसारण स्थानीय बोलियों यथा गोंडी, भीली, सहरिया, कोरकू में कार्यक्रम का प्रसारण किया जाता रहा है. हालांकि बड़े बजट के साथ स्थापित किए गए इन कम्युनिटी रेडियो का लाभ जैसा अंचल के लोगों को मिलना चाहिए, उतना नहीं हो पा रहा है. सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार के लिए तथा समय-समय पर जनजागरूकता के लिए रेडियो वन्या का उपयोग किया जाए तो ना केवल शासकीय धन का समुचित उपयोग होगा बल्कि जनजातीय समाज तक बदलाव के संदेश आसानी से पहुंचाया जा सकेगा. एक बार उच्चस्तर पर वन्या रेडियो की समीक्षा और कसावट की जरूरत है. रेडियो से लेकर कम्युनिटी रेडियो केवल मनोरंजन के लिए नहीं होते हैं बल्कि आपदा समय में भी रेडियो मदद्गार हो सकता है. आपदा के समय जैसे भूकंप, सुनामी या बाढ़ आदि में भी रेडियो काफी मददगार रहता है. ऐसे समय में जब बिजली आदि भी चली जाती है तो बैटरी चलित रेडियो के माध्यम से मुसीबत में फंसे लोग मार्गदर्शन के साथ सही सूचनाएं भी प्राप्त कर सकते हैं.
आज हम जब विश्व रेडियो दिवस मना रहे हैं तब एक बार फिर पलटकर देखना अच्छा लगता है कि कैसे रेडियो का विकास हुआ और संचार के विकसित होते माध्यमों के बीच रेडियो ने अपनी जगह बनायी है. देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘मन की बात’ से रेडियो के माध्यम से लोगों तक पहुंचने का जो उपक्रम किया है, उससे आगे निकलकर रेडियो को जनोपयोगी बनाने की जरूरत है. पुन: मध्यप्रदेश के संदर्भ में चर्चा करते हैं तो राज्य शासन के कम्युनिटी रेडियो के माध्यम से जनजातीय समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याणकारी योजनाओं को आसानी से पहुंचाया जा सकता है. इसके लिए मन से नहीं दिल से प्रयास करने की जरूरत है क्योंकि रेडियो को सरकारी फाइल बनाने के बजाय उसे जिम्मेदार बनाना होगा.

 

 
 


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