इतिहास का ऐसा कोई दौर नहीं गुजरा है जब मानवता के समक्ष चारित्रिक मूल्यों के संकट के सवाल न खड़े हुए हो और  हर बार यह आशंका व्यक्त की गई है कि मानवता का भविष्य अंधकारमय है. कहीं ऐसी कोई उम्मीद की किरण नहीं दिखाई पड़ रही है जो गहन तमस को भेद सके. मानवता के समक्ष खड़े संकट से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन हर दौर में कहीं-न-कहीं से कोई रास्ता निकलता ही रहा है. हर युग में उत्कर्ष और पतन के पन्ने लिखे जाते रहे हैं, हर युग में दैवी और दानवी मनोवृत्तियों का संघर्ष होता रहा है. यह शाश्वत सत्य है कि हर संघर्ष में दैवी-शक्तियां विजयी हुई हैं. लेकिन आज जिस तरह की चारित्रिक गिरावट, संवेदनहीनता एवं महिलाओं के प्रति बर्बरता- व्यभिचार के दृश्य उपस्थित हो रहे हैं, वे गंभीरता के साथ-साथ चिन्ताजनक है. आज किसको छू पाता है मन की सूखी संवेदना की जमीं पर औरतों का यह दुःख दर्द?

पिछले कुछ दिनों में बलात्कार- गैंगरेप के एक के बाद कई मामले आए, जिन्होंने साफ कर दिया कि देश में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. हमारी व्यवस्था और समाज की बुनावट स्त्रियों को लेकर बेहद संवेदनहीन और क्रूर बनती जा रही है. गुरुवार को केरल के त्रिशूर में गैंगरेप की शिकार महिला जब पुलिस थाने पहुंची तो उससे इतने शर्मनाक सवाल पूछे गए कि वह निराश हो गयी. फिर भी उसने हार नहीं मानी और एक अन्य प्रबुद्ध महिला को अपनी पीड़ा बताई तो मामला सामने आया. उस पीड़िता के साथ किसी और ने नहीं उसके पति के दोस्तों ने ही गैंगरेप किया था. एक अन्य दर्दनाक हादसे में पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में एक बूढ़ी स्त्री की देखभाल करने वाली एक महिला गैंगरेप का शिकार हुई. महाराष्ट्र के बुलढाणा की बच्चियों की दास्तान तो बड़ी ही क्रूर एवं त्रासद है, जहां 12 आदिवासी मासूम छात्राओं का यौन शोषण खुद उनके स्कूल के प्रिंसिपल, शिक्षक और कर्मचारी लंबे समय से करते आ रहे थे. कन्या पढ़ाओं-कन्या बचाओं का नारा कितना खोखला एवं बेबुनियाद है- इस एक घटना से उजागर होता है. 

बुधवार को ग्रेटर नोएडा में ईंट के भट्ठे पर काम करने वाली तीन गरीब महिलाओं के साथ छह अपराधियों ने गैंगरेप किया जो पुलिस की वर्दी में आए थे. हैदराबाद में तो बाप-बेटे ने मिलकर जिस शर्मनाक वीभत्स कृत्य को अंजाम दिया, उसने तो सारी सीमाएं ही लांघ दी. वे गरीब मासूम जुड़वां बच्चियों का यौन शोषण कर रहे थे. देश और दुनिया के स्तर पर देखा जाए तो किसी भी देश का, किसी भी दिन का अखबार उठाकर देख लें, महिला अपराध से संबंधित समाचार प्रमुखता से मिलेंगे. हर देश में इस तरह की घटनाएं आम बात है, लेकिन भारत में इनका बढ़ना सोचनीय है. कैसा समाज हम निर्मित कर रहे हैं, जहां औरत की इज्जत को ही तार-तार किया जा रहा है, कहीं झपटमार लोगों द्वारा महिलाओं के आभूषण छीने जा रहे हैं तो कहीं राह चलते उनके साथ दुव्र्यवहार हो रहा है. कहीं कार्यालय के सहयोगी, बाॅस व अड़ोस-पड़ोस के लोग उनका गलत रूप में शोषण कर रहे हैं तो कहीं बलात्कार की घटना घटित हो रही है. कहीं असंतोष, विद्रोह या आक्रोश से भड़के व्यक्ति तंदूर कांड-निर्भया जैसे कांड करने से भी नहीं चूकते. महिला अपराध संबंधी कितनी ही कुत्सित, घृणित एवं भत्र्सना के योग्य घटनाएं आज हम अपने आसपास के परिवेश में देखते हैं. वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा कितना बड़ा होगा, आकलन कर पाना भी कठिन है. सिर्फ महिलाओं के साथ ही नहीं, स्कूल में पढ़नेवाली दस-बारह साल की कन्याओं के साथ ही ऐसी घटनाएं सुनने में आती हैं, जिसकी कल्पना कर पाना भी असंभव है. खास तौर पर काॅलेज में एवं उच्च शिक्षा प्राप्त करनेवाली छात्राएं तो आज इतनी चिंतनीय स्थिति में पहुंच गई हैं, जहां रक्षक ही भक्षक के रूप में दिखाई पड़ते हैं. वे इतनी असुरक्षित और इतनी विवश हैं कि कोई भी ऊंची-नीची बात हो जाने के बाद भी उनके चुप्पी साध लेने के सिवाय और कोई चारा नहीं है. परिस्थितियों से प्रताड़ित होकर कुछ तो आत्महत्या तक कर लेती हैं. तेजी से बढ़ता नारी अस्मिता एवं अस्तित्व को नौंचने का दौर किसी एक प्रांत का दर्द नहीं रहा. इसने हर भारतीय दिल को जख्मी बनाया है. अब इसे रोकने के लिए प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है. नए समाधान के लिए ठंडा खून और ठंडा विचार नहीं, क्रांतिकारी बदलाव के आग की तपन चाहिए. 

ऐसी कुछ खबरें और भी हैं, वारदातें हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं. इनमें से प्रायः सभी घटनाओं में पुलिस ने कार्रवाई की है और कर रही है, हालांकि उसने कार्रवाई तभी की जब मामला मीडिया में आ गया और उस पर हंगामा मचा. दरअसल रेप या गैंगरेप से संबंधित कानूनों और सजाओं का अपराधियों में अब भी खौफ नहीं पैदा हो सका है. इसका एक सीधा और साफ कारण यह है कि रेप या गैंगरेप के केस में सजा दिलाए जाने की दर अब भी 28 फीसदी ही है. दिल्ली के निर्भया कांड के बाद देशभर में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मामला राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना था. निर्भया कांड के बाद हुई सामाजिक क्रांति के बाद हम सोच रहे थे कि समाज में महिलाएं सुरक्षित हो जाएंगी. औरतों पर अत्याचार रोकने के लिए सरकार ने कई कदम उठाने का फैसला किया था. कुछ उपाय व्यवहार में लाए भी गए लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. इसका एक कारण यह है कि इन कानूनों का दुरुपयोग अधिक हो रहा है, झूठे एवं फर्जी मामले बनाकर निर्दोष लोगों को परेशान किया जा रहा है, पीड़ित किया जा रहा है. दोषी लोग आज भी अपराध करके भी सजा नहीं पा रहे हैं. इन अपराधों को अंजाम देने वाले आरोपियों के पीछे चैंकाने वाला सच यह भी है कि आरोपियों के जहन में कानून का जरा भी खौफ नहीं. अगर आरोपी नाबालिग है तो वह कमजोर कानून का फायदा उठाता है और अगर बालिग है तो वह कोर्ट-कचहरी की पीड़ा को भी आनंद से झेलता है और जुर्म की दुनिया का बादशाह बनने की दौड़ में शामिल हो जाता है. 

मूल बात यह है कि हमारे व्यवस्था को स्त्री के प्रति संवेदनशील नहीं बनाया जा सका है. केरल वाले मामले में देखें, पुलिस ने पीड़िता की मदद करने की जगह जिस तरह से सवाल पूछे, वह रेप करने जैसा ही था. आज भी पुलिस का रवैया बदला नहीं है. वह अब भी सबसे पहले रेप के मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करती है. मामला दर्ज हो भी जाता है तो वह इतने लचर साक्ष्य पेश करती है कि केस सुनवाई के लेवल पर भटक जाता है. पुलिस के इस रवैये का लाभ अपराधी को मिलता है. शिक्षा के मन्दिर भी व्यभिचार के केन्द्र बन गये है. लेकिन ये सिर्फ कानूनी मुद्दे नहीं हंै. सवाल है कि समाज आखिर कहां जा रहा है? कब तक नारी अस्मिता को नौचा जाता रहेगा? इस तरह के घिनौने कृत्य में वे शामिल हैं, जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. समाज में निश्चित रूप से एक बड़ी बीमारी घर करती जा रही है. इस पहलू पर हम सबको गंभीरता से सोचना होगा. जाहिर है, कानून, समाज और परिवार, तीनों स्तर पर की गई कोशिशें ही हमें जंगली होने से बचा सकती हैं.

जब भी सरेराह वारदात होती है तब हम अक्सर यह आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि लोग मूकदर्शक क्यों बने रहे, कुछ लोग पहल करते तो वारदात टल सकती थी, किसी की जान बच सकती थी. सवाल यह है कि आखिर समाज को निष्ठुर किसने बनाया? हमारी मानवीय संवेदना कब, कैसे, क्यों निष्ठुर हो गई? हमारे भीतर सामाजिक चेतना का अभाव जिन कारणों से होता है, उन्हें दूर किए बिना सामाजिक चेतना के हृास को रोका ही नहीं जा सकता. ऐसे दृश्यों और ऐसी घटनाओं के प्रति हम तटस्थ होते जा रहे हैं, सामान्य व्यक्ति से लेकर हर कोई खामोश क्यों रह जाता है. इन स्थितियों के लिए खुद समाज ही जिम्मेदार है. संयुक्त परिवारों का विघटन, अश्लीलता का भौंद्दापन, टीवी संस्कृति का गलत दिशाओं में बढ़ना, शिक्षा पद्धति से नैतिक शिक्षा को हटा देने और पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण समाज की विकृत दशा के कारण हैं. वैसे तो हर अपराध के पीछे अलग-अलग मनोविज्ञान होता है, फिर भी समाज की दशा पर हमें गम्भीरता से चिंतन-मनन करना ही होगा. नये बनते समाज की ओर सचाई से देखा जाये तो यूं समझना चाहिए कि हमने जीने का सही अर्थ ही खो दिया है. यद्यपि बहुत कुछ उपलब्ध हुआ है. कितने ही नए रास्ते बने हैं. फिर भी किन्हीं दृष्टियों से हम भटक रहे हैं. भौतिक और बौद्धिक समृद्धि बटोरकर भी न जाने कितनी रिक्तताओं की पीड़ा सह रहे हंै. जीवन-वैषम्य कहां बांट पाया अपनों के बीच अपनापन. बस्तियां बस रही हैं मगर आदमियत उजड़ती जा रही है.

विलासिता एवं भोग की जंजीरों में जकड़ा हमारा समाज लगातार असभ्य, क्रूर और पिछड़ा होता जा रहा है. चर्चित फ्रेंच दार्शनिक और लेखिका सीमोन द बोऊवा ने सही कहा है कि ‘स्त्री जनमती नहीं है, बल्कि बनाई जाती है.’ आज देश की समृद्धि से भी ज्यादा देश की साख जरूरी है. विश्व के मानचित्र में भारत गरीब होते हुए भी अपनी साख सुरक्षित रख पाया तो सिर्फ इसलिए कि उसके पास विरासत से प्राप्त ऊंचा चरित्र है, ठोस उद्देश्य है, सृजनशील निर्माण के नए सपने हैं और कभी न थकने वाले क्रियाशील आदर्श हैं. साख खोने पर सीख कितनी दी जाए, संस्कृति नहीं बचती. यहां नारी ही नहीं, भारत की आत्मा भी घायल हो रही है. यह नारी की इज्जत का नहीं, भारत की इज्जत का संकट खड़ा हुआ है.


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