आजकल राष्ट्र में थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद ऐसे-ऐसे घोटाले, काण्ड या भ्रष्टाचार के किस्से उद्घाटित हो रहे हैं कि अन्य सारे समाचार दूसरे नम्बर पर आ जाते हैं। पुरानी कहावत तो यह है कि ”सच जब तक जूतियां पहनता है, झूठ पूरे नगर का चक्कर लगा आता है।“ इसलिए भ्रष्टाचार एवं घोटाले के प्रसंगों को कई बार इस आधार पर गलत होने का अनुमान लगा लिया जाता है। पर हमारे देश में ऐसे मामलें तो सच ही होते हैं, घोटाले झूठे नहीं होते। यह बात अलग है कि इन मामलों को दबाने वाली शक्तियां ज्यादा ताकतवर होती है। सच जब अच्छे काम के साथ बाहर आता है तब गूंँगा होता है और बुरे काम के साथ बाहर आता है तब वह चीखता है। सीबीआई की एक विशेष अदालत ने कोल आबंटन के एक मामले में कोयला मंत्रालय के चमकते चेहरे-पूर्व सचिव एच.सी. गुप्ता, मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव के. एस. करोपहा, तत्कालीन निदेशक के.सी. समरइया को दोषी ठहराया है, इन जिम्मेदार चेहरों पर कालिख का लगना न केवल चिन्ता का विषय है बल्कि शर्मसार करने वाला है। इन्हीं घोटालों एवं भ्रष्टाचार के कारण भारत इन भ्रष्ट मामलों में लगातार गिरावट की ओर अग्रसर है। दुनियाभर के भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के मुताबिक भारत साल 2016 में 2015 के मुकाबले रैंकिंग में नीचे चला गया है।

हमारे देश की यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि भ्रष्टाचार के बहुत कम मामले तार्किक परिणति तक पहुंच पाते हैं। जब ऊंची पहुंच वाले लोग आरोपी हों, तब तो इसकी संभावना और भी क्षीण रहती है। इस लिहाज से कोयला घोटाले के एक मामले में बीते शुक्रवार को आया फैसला एक विरल घटना है, भ्रष्टाचार की लड़ाई में सफलता की एक पायदान चढ़ाई है। सीबीआइ की एक विशेष अदालत ने जिन अधिकारियों को दोषी ठहराया है, उनको भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के तहत सजा बाद में सुनाई जाएगी। इन पूर्व आला अफसरों ने गलत दस्तावेजों के आधार पर मध्यप्रदेश के थिसगोरा बी रुद्रापुरी कोल ब्लाक को मध्यप्रदेश की कंपनी कमल स्पांज स्टील एंड पॉवर लिमिटेड को आबंटित कर दिया। अदालत ने कंपनी और उसके निदेशक को भी धोखाधड़ी तथा आपराधिक साजिश का दोषी करार दिया है। यूपीए सरकार के दौरान के जो घोटाले काफी चर्चा का विषय बने उनमें कोयला घोटाला भी एक था। इससे जुड़े पच्चीस से अधिक मामलों में से केवल तीन में फैसला आ पाया है। इससे पहले निजी कंपनी और उससे जुड़े अधिकारियों को ही सजा सुनाई गई थी। यह पहला मामला है जिसमें मंत्रालय के तब के आला अफसरों पर गाज गिरी है। राजनेता, मंत्री, जन-प्रतिनिधि एवं प्रशासन से जुड़े लोगों ने अपने स्वार्थ एवं लालच के लिये देश के अस्तित्व एवं अस्मिता को दांव पर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कुछ दिन पूर्व ही लालू यादव एवं पूर्व वित्त मंत्री चिदम्बरम् भी ऐसे ही भ्रष्ट आरोपों की जांच के दायरे में आये हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री भी प्रतिदिन किसी-न-किसी भ्रष्टाचार के आरोप का सामना कर रहे हैं। कोई ‘चारे’ का तो कोई ‘चंदे’ का चोर हैं, भ्रष्टाचारी है।

करीब एक हजार करोड़ के चारा घोटाले में लालू यादव को पांच साल की सजा मिली हुई है। उनसे चुनाव लड़ने का अधिकार छिन चुका है। उसी तरह अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पर शुरुआती दिनों से चंदे के हेर-फेर के आरोप लगते रहे हैं। केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के नेटवर्क का इस्तेमाल किया और गलत तरीके से चंदे की उगाही करते रहे। सबसे बड़ी बात है कि अन्ना आंदोलन के दौरान वेे राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में जिस पारदर्शिता की वकालत करते थे। जब अपनी बारी आई तो उन चंदों पर और उन्हें देने वाले नामों पर कुंडली मारकर बैठ गए। बड़ी बात ये है कि इस मामले में कई बार उनके अपने ही साथियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के और भी गंभीर आरोप हैं। उनपर निजी घूसखोरी का चश्मदीद गवाह भले ही पहली बार सामने आया हो, लेकिन दिल्ली में उनकी सरकार के भ्रष्टाचारों की लिस्ट तैयार की जाय तो वह बहुत ही लंबी हो सकती है। जैसे दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री और उनके साले सुरेंद्र कुमार बंसल पर जाली कागजातों के आधार पर पीडब्ल्यूडी विभाग के ठेके लेने और फर्जी बिल बनाने के आरोप हैं। उसी तरह केजरीवाल ने राजेंद्र कुमार नाम के उस अफसर को अपना मुख्य सचिव बनाया जिसपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। डिप्टी सीएम समेत कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के कई मामले चल रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के कथित हवाला लिंक की छानबीन भी की जा रही है। दूसरों को ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने वाले केजरीवाल के मंत्री जैन पर हवाला के माध्यम से 16.39 करोड़ रुपये मंगाने के आरोप हैं।

जाहिर है, भ्रष्टाचार के इन ढेर सारे मामलों की तरह कोयला घोटाला भी भ्रष्ट नौकरशाही और बेईमान कारोबारियों के गठजोड़ की तरफ इशारा करता है। यह पद के दुरुपयोग का मामला भी है, जिसके बिना कोई घोटाला संभव नहीं हो सकता। यूपीए सरकार के दौरान कोयला घोटाले का खुलासा 2012 में सीएजी की एक ड्राफ्ट रिपोर्ट से हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2009 के बीच गलत तरीके से कोल आबंटन किए गए। नियम-कायदों की किस कदर धज्जियां उडाई गई, इसकी बानगी यह मामला भी है जिसमें कई पूर्व नौकरशाहों को दोषी पाया गया है। कंपनी के आवेदन में भरी त्रुटिया थी, अधूरापन था, दिशा-निर्देशों की अवहेलना की गई थी, कंपनी ने अपने राजनीतिक रिश्तों और पैसों की ताकत का गलत इस्तेमाल करके यह आवंटन हासिल किया था। यही नहीं, राज्य सरकार ने केएसएसपीएल को कोल ब्लाक आबंटित न करने की सलाह दी थी। इस सब के बावजूद उसका आवेदन मंजूर कर लिया गया। उस दौरान कोयला मंत्रालय का प्रभार तत्कालीन प्रधानमंत्री के पास था। इसलिए अदालत ने एचसी गुप्ता को प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखने का दोषी भी पाया है। लेकिन क्या मनमोहन सिंह इस सवाल से बच सकते हैं कि आबंटन के लिए उन्होंने नीलामी की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई थी?

यह कोई छोटा घपला-घोटाला नहीं है, सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक कोयला घोटाले से देश को 1.86 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। जाहिर है, यह प्राकृतिक संसाधनों की भारी लूट का मामला भी है, प्रशासन की पारदर्शिता एवं ईमानदारी को तार-तार करने का मामला है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी इसी तरह का था। कोयला घोटाले में कई राजनीतिकों के भी नाम सामने आए थे। जैसे-जैसे न्याय प्रक्रिया आगे बढ़ेगी संभव है तत्कालीन सरकार के बड़े राजनेताओं के नाम उजागर हो जाये। यह विडंबना ही है और सरकारी एजेन्सियों पर सरकार के दबाव का मामला भी है कि केएसएसपीएल को कोल ब्लाक आबंटित करने के मामले में सीबीआई ने आरोपपत्र दाखिल करने के बजाय क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। सीबीआई ने तब कहा था कि इस मामले में पर्याप्त सबूत नहीं हैं जिससे आरोपियों को सजा दिलाई जा सके। लेकिन अदालत ने क्लोजर रिपोर्ट मंजूर नहीं की। 

इस तरह की भारत में भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ कार्रवाही के लगातार खराब प्रदर्शन से पता चलता है कि सरकार छोटे और बड़े हर स्तर पर भ्रष्टाचार से निपटने में लगातार नाकाम हो रही है। भ्रष्टाचार के गरीबी, अशिक्षा और पुलिस कार्रवाइयों पर असर से दिखता है कि देश की अर्थव्यवस्था भले ही बढ़ रही हो लेकिन साथ ही असमानता भी बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के परिणाम भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन यह एक शुभ संकेत है कि इस दिशा में कुछ तो सार्थक होता हुआ दिख रहा है। 

पूर्व सरकारों की नीतियों का ही परिणाम है कि हम लगातार भ्रष्ट से भ्रष्टतर होते गये। दिन-प्रतिदिन जो सुनने और देखने में आता रहा है, वह पूर्ण असत्य भी नहीं था। पर हां, यह किसी ने भी नहीं सोचा कि जो हाथ राष्ट्र की बागडोर सम्भाले हुए थे, क्या वे सब बागडोर छोड़कर अपनी जेब सम्भाल लेंगे? ऐसा कभी हुआ नहीं। शक की सुई इतने लोगों की तरफ घूमी है कि जिनकी तरफ नहीं भी घूमी, वे भी वहम के घेरे में आ गए हैं। जिनकी तरफ सुई घूमी, वे कह रहे हैं, ”हमारी जनता उत्तर देगी“। जिनकी तरफ नहीं घूमी वे कह रहे हैं, ”बिना काले धन के हम बागडोर सम्भालने के लिए तख्त तक पहुंच ही नहीं सकते।“ राजनीति में भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बनाने एवं भ्रष्टाचार को राजनीति की विवशता जताने की इन परिभाषाओं को बदले बिना भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं जीती जा सकती। प्रजातंत्र एक पवित्र प्रणाली है। पवित्रता ही इसकी ताकत है। इसे पवित्रता से चलाना पड़ता है। अपवित्रता से यह कमजोर हो जाती है। ठीक इसी प्रकार अपराध के पैर कमजोर होते हैं। पर अच्छे आदमी की चुप्पी उसके पैर बन जाती है। अपराध, भ्रष्टाचार अंधेरे में दौड़ते हैं। रोशनी में लड़खड़ाकर गिर जाते हैं। हमें रोशनी बनना होगा और रोशनी भ्रष्ट व्यवस्था से प्राप्त नहीं होती।


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