भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. आजादी के सत्तर वर्षों के बाद भी हमारे देश में राजनीति की जो दशा और दिशा है, उसे देख कर हताश ही हुआ जा सकता है. निर्वाचन आयुक्त ओमप्रकाश रावत ने हाल ही में राजनीतिक विसंगतियों पर चिन्ता जाहिर करते हुए  कहा कि किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना आज राजनीति का सामान्य लक्षण हो गया है. अगर कोई चुनाव जीत जाता है तो उसने चाहे जितने गलत और चाहे जितने क्षुद्र तरीके अपनाए हों, चाहे जिन हथकंडों का सहारा लिया हो, उसे कुछ भी गलत नजर नहीं आता, उसे कोई अपराध-बोध नहीं सताता, वह मान कर चलता है कि उसके गुनाहों पर परदा पड़ गया है. जबकि लोकतंत्र तभी फूलता-फलता है जब चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी हों. दोहरा राजनीति चरित्र लोकतंत्र के लिये सबसे घातक है और ऐसे ही चरित्र की निष्पत्ति है चुनावी बाॅन्ड. चंदा देने वाले कॉरपोरेट ऐसे धारक बॉन्ड खरीद सकते हैं और बिना पहचान बताए राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में दे सकते हैं. चुनावी बॉन्ड आरबीआई जारी करेगा. राजनीतिक पार्टियों को दान देने वाला बैंक से बॉन्ड खरीद सकेगा और दान देने वाला किसी भी पार्टी को बॉन्ड दे सकेगा. राजनीति चंदे पर नियंत्रण एवं उसकी पारदर्शिता कैसे संभव होगी? समस्या और गहरी होती हुई दिखाई दे रही है.
रावत ने लोकतंत्र की कमियों को दिल्ली में एसोसिएशन आफ डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) की तरफ से आयोजित राजनीतिक एवं चुनाव सुधार विषयक परिचर्चा उजागर किया. क्या उनकी इस पीड़ा के पीछे राजनीति का दोहरा चरित्र, आपराधिक चरित्र, मूल्यों का अवमूल्यन है? इसके पीछे राज्यसभा के लिए गुजरात में हुए चुनाव का अनुभव भी रहा होगा? या बिहार में जो कुछ हुआ, वह भी लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर ही करता हुआ दिखाई दिया है. जो हो, इस मौके पर उन्होंने पेड न्यूज को ऐसा चुनावी अपराध माने जाने की भी वकालत की, जिसके लिए कम से कम दो साल की सजा होनी चाहिए. रावत ने प्रस्तावित चुनावी बांड के प्रावधान पर आयोग के एतराज को दोहराते हुए जन प्रतिनिधित्व कानून में उस प्रस्तावित संशोधन की भी आलोचना की, जिसके तहत राजनीतिक दलों को छूट होगी कि वे चाहें तो चुनावी बांड के रूप में चंदा देने वालों के नाम न बताएं. रावत की चिंता वाजिब है. बात केवल रावत की चिन्ताओं की ही नहीं है, बल्कि लगातार लोकतंत्र के कमजोर होते जाने की भी है. 
तात्कालिक राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये दीर्घकालिक मूल्यों को नजरअंदाज कर देना वर्तमान राजनीति संस्कृति का केन्द्रीय भाव बन गया है. राजनीति का अपराधीकरण इसी प्रक्रिया के दौरान हुआ है. पहले सिर्फ कांग्रेस को इसका दोषी समझा जाता था, लेकिन आज शायद ही कोई राजनीति दल इससे बचा हो, जिस पर दाग नहीं लगा हो. एक जमाने में राममनोहर लोहिया कांग्रेस को ‘भ्रष्टाचार की गंगोत्री’ कहा करते थे. लेकिन आज कौन-सी पार्टी है जो सार्वजनिक जीवन में शुचिता का पालन कर रही है? शोचनीय बात यह है कि अब भ्रष्टाचार के दोषी शर्मसार भी नहीं होते. इस तरह का राजनीतिक चरित्र देश के समक्ष गम्भीर समस्या बन चुका है. राजनीति की बन चुकी मानसिकता और भ्रष्ट आचरण ने पूरे लोकतंत्र और पूरी व्यवस्था को प्रदूषित कर दिया है. स्वहित और स्वयं की प्रशंसा में ही लोकहित है, यह सोच हमारी राजनीति मंे घर कर चुकी है. यह रोग राजनीति को इस तरह जकड़ रहा है कि हर राजनेता लोक के बजाए स्वयं के लिए सब कुछ कर रहा है.
सम्पूर्ण राष्ट्रीय परिवेश में घोर निराशा के स्वर सुनाई देते हैं. वजह यह है कि लोगों को रोज राजनीतिक पतनशीलता के दर्शन और अनुभव होते हैं. ऐसा नहीं कि अब राजनीति में अच्छे लोग नहीं बचे हैं, या इसमें कोई भला आदमी अब नहीं आता. राजनीति में अच्छे लोग अब भी हैं और किसी आदर्शवाद से प्रेरित होकर राजनीतिक कर्म का रास्ता अख्तियार करने वाले अब भी मिल जाएंगे. लेकिन वे राजनीति की मुख्यधारा नहीं हैं. जो मुख्यधारा है उसके बारे में आम धारणा यही है कि वह अराजक, पतित और भ्रष्ट है. अधिकतर राजनीतिकों का मकसद बस किसी तरह चुनाव जीतना और सत्ता में जाना हो गया है. चुनाव जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, और सत्ता में आने पर पैसा बनाने के सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं. देश के धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लो. देश के सौ रुपये का नुकसान हो रहा है और हमें एक रुपया प्राप्त हो रहा है तो बिना एक पल रुके ऐसा हम कर रहे हैं. भ्रष्ट आचरण और व्यवहार अब हमें पीड़ा नहीं देता. सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे हैं, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी है. सत्ता में जाने या किसी और तरह के निजी फायदे के लिए, कभी भी पाला बदल लेना आम हो गया है. ज्यादातर पार्टियां परिवारों की जागीर होकर रह गई हैं. ऐसे में, राजनीति को नैतिक तकाजों की याद दिलाने वाली बात हो, और वह भी निर्वाचन आयोग की तरफ से, तो यह रेगिस्तान के बीच एक नखलिस्तान की तरह ही लगता है.
बीस हजार के नगर चंदे को दो हजार तक सीमित करने एवं चंदे की पारदर्शिता वकालत करने वाली सरकार क्या सोचकर चुनावी बाॅण्ड लेकर आ रही है? चंदे को लेकर अगर प्रस्तावित व्यवस्था लागू हो गई तो हमारी राजनीति को चंदे के जरिए प्रभावित करने की कॉरपोरेट जगत की ताकत और बढ़ जाएगी. एक ताजा अध्ययन बताता है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में कॉरपोरेट जगत का हिस्सा बढ़ता गया है. अभी कंपनियों के लिए राजनीतिक चंदा दे सकने की एक कानूनी सीमा तय है. जब उन्हें चुनावी बांड के रूप में असीमित चंदा दे सकने की छूट होगी और इसका ब्योरा छिपाए रखने की इजाजत भी होगी, तो राजनीतिक दलों पर किसका अंकुश होगा- जनता और कार्यकर्ताओं का, या धनकुबेरों का? रावत ने ये सवाल उठाते हुए कहा कि राजनीति में हर ओर और हर स्तर पर हावी विकृतिकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए पार्टियों से लेकर मीडिया और नागरिक जमात तक, सब तरफ से प्रयास होने चाहिए. निहित स्वार्थों के नक्कारखाने में क्या यह आवाज सुनी जाएगी!
राजनीति करने वाले सामाजिक उत्थान के लिए काम नहीं करते बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल है, ”वोटों की“. ऐसी रणनीति अपनानी, जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके, ही सर्वोपरि है. वोट की राजनीति और सही रूप में सामाजिक उत्थान की नीति, दोनों विपरीत ध्रुव हैं. एक राष्ट्र को संगठित करती है, दूसरी विघटित. जब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय है तो उनके प्रयत्नों, नीतियों एवं योजनाओं में भी वैसा होता हुआ दिखाई देना चाहिए. कहीं उनकी भी कथनी और करनी में अन्तर न आ जाये?राजनीतिक चंदे को नियंत्रित करते एवं उसे पारदर्शी बनाने की वकालत करते-करते चुनावी बाॅण्ड कहां से आ गया? क्योंकि यहां सवाल दुहरे मानदंडों का उतना नहीं, जितना संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति राजनीतिक वर्ग के रवैये का है. इस समय प्रत्येक राजनीति पार्टी चाहती है कि जब वह सत्ता में हो, उसके ऊपर किसी का अंकुश न हो, न किसी संविधान का, न कानून का, न किसी तरह की लोकतांत्रिक मर्यादा का. ये सब उसे तभी याद आते हैं जब वह सत्ता से बाहर होती है. जैसे की अभी कांग्रेस, सपा, बसपा आदि पार्टियां. अपनी सब बुराइयों, कमियों को व्यवस्था प्रणाली की बुराइयां, कमजोरियां बताकर पल्ला झाड़ लो और साफ बच निकलो. कुछ अणुव्रत आन्दोलन, भारतीय मतदाता संगठन जैसी मानवीय संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं कि प्रणाली शुद्ध हो, पर इनके प्रति लोग शब्दों की हमदर्दी बताते हैं, योगदान का फर्ज कोई नहीं निभाना चाहता. सच तो यह है कि बुराई लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बुरी तो राजनीतिक सोच हैं. जो इन बुराइयों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरियां बताते हैं, वे भयंकर भ्रम में हैं. बुराई हमारे चरित्र में है इसलिए व्यवस्था बुरी है. हमारा रूपांतरण होगा तो व्यवस्था का तंत्र सुधरेगा.
हमारी राजनीति की कैसी विडम्बनापूर्ण स्थिति है. कोई सत्ता में बना रहना चाहता है इसलिए समस्या को जीवित रखना चाहता है, कोई सत्ता में आना चाहता है इसलिए समस्या बनाता है. जाति धर्म हमारी राजनीति की झुठलाई गई सच्चाइयां हैं जो अब नए सिरे से मान्यता मांग रही हैं. यह रोग भी पुनः राजरोग बन रहा है. कुल मिलाकर जो उभर कर आया है, उसमें आत्मा, नैतिकता व न्याय समाप्त हो गये हैं. नैतिकता की मांग है एवं निर्वाचन आयुक्त के दर्द का हार्द है कि सिफारिश अथवा धन के लालच अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का, गुणवंत का, श्रेष्ठता का हक नहीं छीना जाए. लोकतंत्र को शुद्ध सांसें मिले. 


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