समूचे देश की नजरे हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात के चुनावों पर लगी है. चुनाव लोकतंत्र का प्राण है. लोकतंत्र में  सबसे बड़ा अधिकार है- मताधिकार. और यह अधिकार सबको बराबर मिला हुआ है. पर अब तक देख रहे हैं कि अधिकार का झण्डा सब उठा लेते हैं, दायित्व का कोई नहीं. अधिकार का सदुपयोग ही दायित्व का निर्वाह है. इन दोनों प्रान्तों में मतदाता अपने अधिकार का सदुपयोग करते हुए लोकतंत्र के इतिहास के इस महत्वपूर्ण चुनाव की गवाही देगा. प्रतिदिन चुनावों की तस्वीर चुनाव परिणामों का गणित बदल देती है. लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं एवं चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए हैं उससे यही प्रतीत होता है कि दोनों ही प्रान्तों की हवाओं में केसरिया रंग की बयार बह रही है, जहां हिमाचल में भाजपा सत्ता में वापसी करने की ओर अग्रसर है, वहीं गुजरात में एक बार फिर संकेत विकास के पक्ष में है. उधर चारों ओर से घिरती कांग्रेस वोट के लालच में जातिवाद और मजहबी राजनीति के सहारे अपनी डूबती नाव को पार लगाने की कोशिश में है और अपने युवराज का वही चिराग रगड़ रही है. ऐसे में लोकतंत्र का ऊंट किस करवट बैठेगा? जवाब माहौल में तैर रहा है.

कांग्रेस के लिये अब तक प्रत्याशियों के चयन में घोषित आदर्श कुछ भी रहे हों, पर जाति और धर्म का आधार कभी मिटा नहीं, यही इस पार्टी की विडम्बना है और यही आज की दशा का कारण भी. इसे बदलकर आधार योग्यता और आचरण बनाना होगा, तभी कांग्रेस अपनी डूबती नाव को बचा सकती है. मतदाता जब जाति और धर्म से पूर्वाग्रहित हो जाते हैं तब राजनीति दूषित हो जाती है. एक तनाव का रूप ले लेती है. अगर हिंसा से राज प्राप्त करना है तो फिर एकतंत्र और लोकतंत्र में क्या फर्क रह जाएगा, यह समझ अब तो इस पार्टी में आनी ही चाहिए. पार्टी को यह भी सोचना होगा कि चुनाव मात्र राजनीति प्रशासक ही नहीं चुनता बल्कि इसका निर्णय पूरे अर्थतंत्र, समाजतंत्र, जीवनतंत्र आदि सभी तंत्रों को प्रभावित करता है. प्रश्न उठता है- कांग्रेस के साथ यह गड़बड़ कैसे हुई और भाजपा को सामाजिक सफलता का मंत्र कैसे मिला!

दरअसल, कभी राष्ट्रीय विचारों का सामूहिक मंच रही कांग्रेस पार्टी को कुनबे की बपौती समझने की भूल नेहरू काल से ही शुरू हुई. पार्टी के भीतर पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुख्ता होते इस विचार का दंश अंततः सांगठनिक एवं वैचारिक कमजोरी के तौर पर पार्टी को झेलना पड़ा. इसकी उपेक्षा हुई होती तो भारतीय राजनीति की दिशा और दशा कुछ और ही होती. यदि इस पार्टी ने एक परिवार को ही तारणहार न माना होता तो पार्टी की भी दिशा-दशा आज जितनी भयावह एवं रसातल वाली नहीं होती. जबकि भारतीय जनता पार्टी ने परिवारवाद को कभी प्रश्रय नहीं दिय. यदि कहा जाए कि पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद का दर्शन आज भाजपा की व्यापकता एवं जन-आस्था की सोच को सही रखने वाली सीख साबित हुआ है. आज जम्मू-कश्मीर से लगते पर्वतीय राज्य हिमाचल में जहां जनता राजनीतिक भ्रष्टाचार से आक्रोशित है, वही काठियावाड़ से गांधीनगर तक जातीय समीकरणों ने राज्य की राजनीति में उथल-पुथल मचाई हुई है. आदिवासी, दलित, पाटीदार के प्रश्न भी खड़े हैं. लेकिन इन प्रश्नों एवं विकास के बीच संग्राम में जीत किसकी होती है, जल्दी ही सामने आ जायेगी.
बात सही है कि चुनाव पूर्व होने वाले सर्वेक्षण अंतिम परिणाम नहीं होते, लेकिन यह भी सच है कि सर्वेक्षण चुनाव की दशा-दिशा का संकेत जरूर कर देते हैं. गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर जो सर्वेक्षण के परिणाम सामने आए हैं, उसके हिसाब से इन दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार बनती नजर आ रही है. इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणामों के आधार पर ही 2019 के आम चुनाव का परिदृश्य तय होना है. 
टाइम्स नाउ न्यूज चैनल, इंडिया टुडे ग्रुप और एक्सिस माइ इंडिया ओपीनियन सर्वे के अनुसार गुजरात में भाजपा एक बार फिर से सरकार बनाने जा रही है और हिमाचल प्रदेश में वापसी की राह पर है. जबकि कांग्रेस की हालत में कोई खास सुधार होता नहीं दिख रहा. गुजरात में पिछले कुछ समय से भले ही जीएसटी, नोटबंदी और पाटीदार आंदोलन हो रहे हों, लेकिन लोगों का भरोसा अब भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर कायम है. सर्वेक्षण के अनुसार 66 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से गुजरात को फायदा हुआ है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कामकाज का भी गुजरात के ज्यादातर लोगों ने समर्थन किया है. गुजरात के पिछले दिनों हुए स्थानीय चुनावों में तो भाजपा ने कांग्रेस का सूपड़ा ही साफ कर दिया. यहां के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस से 35 सीटें छीन लीं. उसने 126 में से 109 सीटें जीतीं.
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य में कांग्रेस के हाथ से सत्ता जा सकती है और भाजपा की सत्ता में वापसी की प्रबल संभावना है. एबीपी न्यूज-सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वेक्षण में बताया गया है कि इस बार भाजपा को हिमाचल प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिलने के असार हैं. इस सर्वेक्षण में कहा गया है कि राज्य की जनता ने बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था को बड़ा मुद्दा माना. करीब 68 प्रतिशत लोगों ने माना कि कांग्रेस के शासनकाल में राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति अधिक खराब हुई. भाजपा की इस जीत से कांग्रेस मुक्त भारत की दिशा में एक कदम और कदम बढ़ेगा.
मां, माटी, मनुष्य की चिंता बड़ी अच्छी बात है. भारत में राजनीति करने वाली हर पार्टी कुछ हेरफेर के साथ ऐसे ही मुहावरे लेकर जनता के पास जाती है. लेकिन गरीब को हमेशा सरकार का मुंह ताकते रहने वाला प्राणी बनाए रखने की राजनीति से सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों का ही होता देखा गया है. लेकिन न तो भाजपा और न कांग्रेस ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को साफ-सुथरा और जवाबदेह बनाया. अब ये दोनों पार्टियां चुनाव के वक्त गरीबों की एक दूसरे से बढ़कर हितैषी होने का दावा किस मुंह से कर रही है? गरीबों के लिए चलाई जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं की हकीकत यह है कि भूख से मरने की खबरें आती रही हैं. अरसे से चल रहा एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम कुपोषण पर काबू पाने की दुनिया की सबसे बड़ी योजनाओं में से एक है. इसके बावजूद भारत के बच्चों में करीब अड़तालीस फीसद कुपोषण के शिकार हैं. बच्चेे ही नहीं यहां मां भी लगातार कमजोर होती जा रही है, एक तरफ आधे से ज्यादा महिलाएं अनेमिया यानी खून की कमी से पीड़ित हैं, दूसरी तरफ 22 फीसदी महिलाएं बीमारी की हद तक मोटापे का शिकार हैं. साल 2017 की ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट ने इस तथ्य को उजागर करते हुए बताया है कि दुनिया में 15 से 49 साल की उम्र सीमा में सबसे ज्यादा अनीमिक महिलाएं भारत में ही हैं. इस रिपोर्ट की खासियत यह है कि यह पिछले साल मई महीने में जिनीवा में हुई वल्र्ड हेल्थ असेंबली में तय किए गए लक्ष्यों के बाद आई है और उनकी रोशनी में 140 देशों के हालात का जायजा लेती है. भारत की स्थिति ज्यादा चिंताजनक इसलिए मानी जा रही है क्योंकि लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय यहां पीछे की तरफ गति देखी जा रही है. पिछले साल की रिपोर्ट में यहां अनीमिक महिलाओं का प्रतिशत 48 था जो इस बार 51 हो गया है. इस मामले में सरकारी प्रयासों पर बारीकी से नजर रखनेवालों ने ठीक ही गौर किया है कि सरकार महिलाओं में कुपोषण की समस्या को पहचानने तो लगी है, लेकिन इसे नियंत्रित नहीं कर पा रही है. अगर सरकार कुछ कारगर प्रयास कर पाती तो हालात पहले के मुकाबले और बदतर तो न होते. आखिर ये बुनियादी सवाल क्यों नहीं चुनावी मुद्दे बनते? क्यों नहीं चुनाव के समय सरकार की नाकामयाबियों की चर्चा प्रमुखता से की जाती?
लोकतंत्र में चुनाव संकल्प और विकल्प दोनों देता है. चुनाव में मुद्दे कुछ भी हों, आरोप-प्रत्यारोप कुछ भी हांे, पर किसी भी पक्ष या पार्टी को मतदाता को भ्रमित नहीं करना चाहिए.”युद्ध और चुनाव में सब जायज़ है“- इस तर्क की ओट में चुनाव अभियान को निम्न स्तर पर ले जाने वाले किसी का भी हित नहीं करते. पवित्र मत का पवित्र उपयोग हो. देश के दो प्रमुख प्रान्तों के भाल पर लोकतंत्र का तिलक शुद्ध कुंकुम और अक्षत का हो. मत देते वक्त एक क्षण के लिए अवश्य सोचें  कि आपका मत ही इन प्रान्तों के चमन को सही बागवां देगा.


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