हर राष्ट्र का सर्वाेच्च मंच उस राष्ट्र की पार्लियामेंट होती है, जो पूरे राष्ट्र के लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होती है, राष्ट्र-संचालन की रीति-नीति और नियम तय करती है, उनकी आवाज बनती है व उनके ही हित में कार्य करती है.राष्ट्र के व्यापक हितों की सुरक्षा करती है.भारत का लोकतंत्र न केवल सशक्त है बल्कि अनूठा एवं प्रेरक है, उसका सर्वोच्च मंच लोकसभा है.इनदिनों लोकसभा के सत्र की कार्यवाही नियोजित एवं सुचारू ढंग से चल रही है उसके लिए नये लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला को श्रेय दिया जा सकता है.उनके अनुभव एवं क्षमताएं सदन को नई दृष्टि देने के लिए तत्पर है.उनके सदन संचालन की दक्षता एवं कौशल की ताजी हवा के झोंकों का अहसास देश का सर्वोच्च लोकतांत्रिक सदन लोकसभा महसूस कर रहा है.वे लोकसभा को कुशलता से संचालित करने में न केवल खरे उतर रहे हैं बल्कि नये प्रतिमान स्थापित करते हुए सदन की गरिमा एवं गौरव की अभिवृद्धि कर रहे हैं.नई लोकसभा में पचास प्रतिशत से अधिक बिल्कुल नये सांसद होने के बावजूद वे इस सदन की कार्यवाही को अनुशासित भी कर रहे हैं और अनुप्रेरित भी कर रहे हैं.निष्पक्ष होकर अपनी भूमिका का निर्वहन भी कर रहे हैं.वे इस सदन की गरिमा को नए स्तर तक ले जाने में सक्षम साबित हो रहे हैं.
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष व सत्ता पक्ष के बीच सदन में व्यवस्था बनाये रखने के मुद्दे पर वह सहमति प्राप्त करने में सफलता अर्जित की है जिससे विरोधी पक्ष को जबरन शोर-शराबा न करना पड़े एवं सदन की गरिमा अक्षुण्ण रखी जा सके.लोकसभा कुछ खम्भों पर टिकी एक सुन्दर ईमारत ही नहीं है, यह एक अरब तीस करोड़ जनता के दिलों की धड़कन है.उसके एक-एक मिनट का सदुपयोग हो.वहां शोर, नारे और अव्यवहार न हो, अवरोध पैदा नहीं हो.ऐसा होना निर्धनजन और देश के लिए हर दृष्टि से महंगा सिद्ध होता है.यदि हमारे प्रतिनिधि ईमानदारी से नहीं सोचंेगे और आचरण नहीं करेंगे तो इस राष्ट्र की आम जनता सही और गलत, नैतिक और अनैतिक के बीच अन्तर करना ही छोड़ देगी.लेकिन इस बार के सदन की कार्रवाई को देखकर कई धारणा बदल गयी और नयी उम्मीदें जगी है कि लोकसभा की शालीनता एवं सभ्यता नई ऊंचाइयों पर आरोहण करेंगी.देश का भविष्य संसद के चेहरे पर लिखा होता है, यदि वहां मर्यादाहीनता एवं अशालीनता का प्रदर्शन होता है तो समस्याएं सुलझने की बजाय उलझती जाती है.छोटी-छोटी बातों पर अभद्र शब्दों का व्यवहार, हो-हल्ला, छींटाकशी, हंगामा और बहिर्गमन आदि ऐसी घटनाएं है, जिनसे संसद जैसी प्रतिनिधि संस्था का गौरव घटता है.यह बात चुने हुए प्रतिनिधियों को समझाने एवं उन्हें प्रशिक्षित करने में बिड़लाजी जिस तरह की सिद्धहस्तता का परिचय दे रहे हैं, वह काबिलेतारीक है.
संसद करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व कर उनकी आवाज बनती हैं.हमारे राष्ट्र की लोकसभा का यही पवित्र दायित्व होता है कि वह उसकी पवित्रता एवं स्वस्थता कायम रखे तथा सभी प्रतिनिधि भगवान् और आत्मा की साक्षी से इस दायित्व को निष्ठा व ईमानदारी से निभाने की शपथ लेते हैं.लेकिन विगत कुछ वर्षों में हमारे इस सर्वोच्च मंच की पवित्रता और गरिमा को अनदेखा किया जाता रहा है.जब भी इसका सत्र आहूत होता था, उससे पूर्व ही इसकी कार्यवाही नहीं चलने देने का शोर शुरू हो जाता था और फिर जो दृश्य व प्रतिनिधियों का व्यवहार एवं आचरण दिखता था वह सिर झुका देता था.भारतीय संसद का यह दर्द मर्मभेदी पुकार बनकर अनेक बार उभरता रहा है.जो मंच जनता की भावना की आवाज देने के लिए है, उसे स्वार्थ का मंच एवं आपसी द्वेष एवं नफरत का अखाड़ा बना दिया जाता था और दलगत राजनीति से ऊपर नहीं उठने दिया जाता था.क्या सत्ता पक्ष, क्या प्रतिपक्ष, दोनों अपनी शपथ और दायित्व की मूल भावना को सर्वथा भूल जाते हैं, और कई-कई दिनों तक कार्यवाही नहीं चलने देते थे.देश के करोड़ों रुपये का नुकसान होता था.लेकिन इस बार ऐसा  बदला हुआ दृश्य है कि शुकून दे रहा है.विपक्ष के मुद्दों को उठाये जाने की अनुमति अध्यक्ष जिस उदार दिल से दे रहे हैं वह प्रशंसनीय है और विपक्ष जिस नियम-कायदे के अनुसार अपनी बातें रख रहा है वह भी स्वागतयोग्य है.सत्ता पक्ष की ओर से भी जिस प्रकार का संयम एवं अनुशासन बरता जा रहा है वह भी प्रेरक एवं अनुकरणीय है.इससे यह भी सिद्ध होता है कि लोकसभा अध्यक्ष पद पर केवल लम्बे संसदीय अनुभव रखने वाले सांसद का चुनाव जरूरी नहीं होता.देखना यह होता है कि इस पद पर बैठा व्यक्ति सभी पक्षों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखता है अथवा नहीं और वह सभी पक्षों के साथ यथोचित न्याय करने का हौंसला रखता है या नहीं.सदन में जब मूल्य एवं नैतिक मानक कमजोर हो जाते हैं और सिर्फ निजी हैसियत को ऊँचा करना ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है तो वह सदन निश्चित रूप से कमजोर हो जाता है।
पिछली सोलहवीं लोकसभा एवं उससे पहले की लोकसभा में पक्ष-विपक्ष के सांसद विरोध प्रकट करने का असंसदीय एवं आक्रामक तरीका ज्यादा से ज्यादा अपनाकर अपने विरोध को विराट बनाने के लिये सार्थक बहस की बजाय शोर-शराबा और नारेबाजी करते रहे थे.लेकिन सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में ही जिस तरह से विपक्ष के मुद्दों को उठाने के मामले पर यह कहकर सहमति बनाई गई है कि किसी भी सदस्य को बोलने से नहीं रोका जायेगा बशर्ते वह अपनी बात नियमों के अनुसार रखे, उससे सदन में ऐसे अनुशासन का माहौल बनता दिखाई दे रहा है जिसके प्रति सभी पक्षों के सदस्यों की स्वप्रेरित निष्ठा है.जाहिर है ऐसा माहौल बनाने के लिए सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखा गया है.संसद में रचनात्मक बहस तभी हो सकती है जब दोनों पक्षों में एक-दूसरे के विचारों को शान्ति के साथ सुनने की क्षमता जागे और दूसरे की बात पूरी हो जाने पर अपने सवालों को उठाया जाये.बहस का मतलब टोका-टाकी, छींटाकशी, आरोप-प्रत्यारोप या दूसरे के भाषण के दौरान अपना भाषण शुरू करना नहीं हो सकता.इससे संसद का माहौल बिगड़ता है.
आजादी के बाद 70 वर्षों में भी हम अपने आचरण और काबिलीयत को एक स्तर तक भी नहीं उठा सके.संसद के सदस्यों के सदन के भीतर व्यवहार करने और आचरण करने की पूरी नियमावली (मैनुअल) है परन्तु अब तक इसका पालन करने में लगातार कोताही बरती गई है जिसकी वजह से सदन के भीतर भी कभी-कभी वातावरण असहज, अशालीन एवं असभ्य बनता रहा है.नेता और नायक किसी कारखाने में पैदा करने की चीज नहीं हैं, उनकी काबिलीयत और चरित्र को गढ़ने का काम भी लोकसभा ही करती है.संविधान की शब्दधाराओं को ही नहीं उसकी भावना को महत्व देने के गुणों का विकास भी यहीं से होता है.बोलने की आजादी का सदुपयोग करना भी यही पर सिखाया जाता है.नये अध्यक्ष ने जिस तरह इस ओर ध्यान दिलाना शुरू किया है और लोकसभा को प्रशिक्षण की प्रयोगशाला बना दिया है, वह स्वागत योग्य है.सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने लोकसभा में किसी मन्त्री के वक्तव्य के बाद विपक्ष द्वारा उससे स्पष्टीकरण पूछने की परंपरा शुरू कर दी है.यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि लोकसभा में विपक्षी सदस्यों की शंकाओं को उठाने से यह कहकर रोक दिया जाता था कि ऐसी परिपाटी केवल उच्च सदन राज्यसभा में ही है.इन सब व्यवस्थाओं से सदन की गरिमा निश्चित रूप से बढ़ेगी और सदस्यों का सम्मान भी आम जनता के बीच ऊंचा उठेगा क्योंकि पूरे देश में यह सन्देश जायेगा कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि अपनी हर जिज्ञासा को समाहित कराने के अधिकारी है और उनके इन अधिकारों को पूरा करने के लिये सदन तत्पर हुआ है.विपक्ष के सांसदों की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वे सरकार को किसी भी तरह की कोई गफलत, त्रुटि एवं मनमानी न करनेे दें और उसे सावधान करते हुए सकारात्मक सुझाव दें.यह काम तभी हो सकता है जब सदन में सुचारू तरीके से बहस हो, उसकी कार्यप्रणाली शालीन एवं नियोजित हो.अतः नई लोकसभा अपने भीतर ऐसे परिवेश को जन्म दे रही है जो स्वयं आगे आकर नवनिर्माण करें, दायित्व की बागडोर थामे और सुधार, स्वस्थता एवं विकास का कार्य शुरू करें.लोकसभा बड़े आदर्शों की अपेक्षा एक छोटा-सा सवाल अपने आपसे करने की कोशिश कर रही है कि नयी लोकसभा की अगवानी में अलविदा किसे कहे? अतीत के उन घटना-प्रसंगों को अलविदा कहें जिनकी वजह से लोकसभा के सपने एवं संकल्प अधूरे रहे और उसकी गरिमा धूमिल होती रही है.शुरुआत तो अच्छी हो रही है देखिये आगे क्या होता है?
 


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