भारत की विदेश नीति में मोदी प्रभाव ज्यादा है, बनिस्पत सुषमा के. कोई कुछ भी कहे,प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने विदेशों में भारत के जयघोष का जो डंका बजाया है,वो आज तक कमोबेश अटलबिहारी बाजपाई को छोड़कर किसी प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ने बजाया.
 भारतीय संस्कृति के तहत ये बात चरितार्थ और प्रमाणित है कि हैं- दंभ ईश्वर का आहार है.यदि आप दम्भी हो गए या कहीं से उस दंभ का अंश मात्र में आप में आ गया तो आपके अन्दर की इंसानियत मर जाती है. शायद देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ ऐसा ही हो रहा है . कभी नम्रता,शोखी,अदब,नफासत,नज़ाकत,तहजीब के लिए मशहूर रही श्रीमती स्वराज,आज वो पहले  वाली सुषमा स्वराज नहीं रही है. कारण जो भी हो,उनमे दंभ,गरूर ज्यादा दिखने लगा है.लगता है कभी मनमोहनी मधुर भाषा वाली अतिलोकप्रिय,हरदिल अज़ीज़ सुषमा स्वराज कही खो गयी हैं .यदि ऐसा होता तो विदेश मंत्री श्रीमती स्वराज के वार्षिक पत्रकार सम्मेलन में वो दंभ,तल्खी,गरूर,अतिआत्मविश्वास नहीं दिखता.बार बार मै का प्रभाव ज्यादा, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र भाई मोदी को कम आंकना नहीं होता.
2014 के पूर्व और बाद की  सुषमा स्वराज बिलकुल अलग दिखती है. चेहरे से चिरपरिचित हंसी,मनोविनोद सा स्वाभाव, बात-बात पर मुस्कुराना गायब सा हो गया है. ये एक बड़ा सवाल है सुषमा स्वराज जैसी भारत की दिग्गज राजनेता के लिए.जो दंभ से बोलती है-मैंने 11 चुनाव लड़ लिए,भारतीय राजनीति को 41 साल दे दिए.तो क्या माननीय सुषमा जी,आपने इस गरीब देश पर बहुत बड़ा एहसान कर दिया? देश की जनता आपकी आरती उतारे. सुषमा जी,आज तक आप अपने लिए एक संसदीय क्षेत्र नहीं बना सकी,एक विधायक वाला क्षेत्र नहीं बना सकी.आपके करीबियों का कहना है कि आपका आधार आम जनता में कम,भाजपा के बड़े नेताओ में ज्यादा रहा.गणेश परिक्रमा की माहिर रही अपने आस पास किसी  महिला नेता को नहीं बढ़ने दिया. हरियाणा की निवासी सुषमा जी,मध्यप्रदेश से सांसद है क्यों ?
28 मई 2018 को सालाना पत्रकार वार्ता में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हुंकारती हैं.पर एक सवाल के जवाब से तिलमिलाकर कहती है, हाँ मैं ट्विटर मंत्री हूँ. ट्विटर से मैंने बड़े-बड़े काम किये हैं. कई लोगो की जानें बचायी है.बहुत सही सुषमा जी.बड़ा काम किया.आप बधाई की पात्र है.आपके जज्बे को सलाम.जहाँ तक ट्विटर को अपने क्रेडिट से जोड़ने वाली चार वर्षीय विदेश मंत्री सुषमा जी को मालूम होगा कि ऐसा काम कांग्रेस की पिछली सरकार में कई बार हो चूका था,कांग्रेस के शासन काल में विदेश मंत्रालय के अति लोकप्रिय  प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने ट्विटर के माध्यम से कई क्रांतिकारी सामाजिक कार्यों को अंजाम दे चुके थे.लगता है सुषमा स्वराज ने पुरानी सरकार की उस तकनीक को अपना क्रेडिट देकर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही है .
सुषमा जी कहती है,कार्यों को लेकर मैं रात को न तो सोती हूँ न ही मंत्रालय/मिशनो  के किसी अफसर को सोने देती हूँ.जबकि ये बात दीगर है कि देश के विदेशो में स्थित ज्यादातर मिशनो में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के फ्लैगशिप कार्यक्रमों के बारे में पूरा विवरण भी नहीं मिलता.इन मसले पर विदेश मंत्रालय को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए.
वैसे सुषमा स्वराज को हिंदी का  उद्भट्ट  विद्वान बताया जाता हैं. वैसे उनकी भाषण और भाषा शैली का कोई जवाब नहीं.ऐसा मेरा निजी अनुभव है. उनके कई संसदीय भाषणों का साक्षी रहा हूँ मैं.लेकिन हिंदी की सदैव तरफदारी करने वाली सुषमा स्वराज के पास संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाये जाने को लेकर तनिक भी  फ़िक्र नहीं दिखती.इसको लेकर तत्कालीन सरकार ने 2007 में ही एक विशेष  प्रस्ताव पारित किया था .वो भी संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सभागार में.पर आज तक कुछ नहीं हुआ.
मेरा मत है हिंदुस्तान में हिंदी के कथित विकास के नाम पर देश के आम जनता के टैक्स के पैसों से महज़ खाना पूर्ति के लिए विश्व हिंदी सम्मेलनों  का नाटक बंद करवा देना चाहिए.हिंदी के कथित विकास को लेकर अब तक 10 सम्मलेन हो चुके है .परिणाम वही ढांक के तीन पांत.यहाँ तक कि यदि हम विदेश मंत्रालय में हिंदी में काम काज के बारे में समीक्षा करे तो चौकानेवाले तथ्य हम सबके सामने आ सकते हैं.गौरतलब है कि पुनः 18-20 अगस्त 2018 को मॉरीशस में 11वां विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन किया जा रहा है.फिर भी एक आशावादी हिंदी प्रेमी होने के नाते मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि जिन ज्यादातर प्रस्तावों पर पिछले 10 सम्मेलनों में कुछ नहीं हुआ,शायद सुषमा जी की प्रयासो से मारीशस के सामुद्रिक और हसीन वादियों में कुछ चमत्कार हो जाये और देश की 80 प्रतिशत से  ज्यादा हिंदी भाषा-भाषी जनता का कुछ भला हो जाये,जिससे देश मैकाले की प्राचीन गिरफ्त से त्वरित गति से बाहर आ सके.
संयुक्त राष्ट्र के समग्र सुधार की वकालत तो करती हैं सुषमा स्वराज ,लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में आज भी भारत की मौजूदगी के कारणों के बारे में पूरी बाते करने से मुहं फेर लेती है. जब कि “अपने मुंह,मिया मिट्ठू” वाली कहावत के तर्ज़ पर दावा करती हैं उनके जैसा कोई विदेश मंत्री नहीं.ऐसा एक सवाल के जवाब में कहती है,लोग देख ले.विदेश मंत्रालय के सवालों का जवाब वही दे रही हैं.पीमओ नहीं दे रहा.ये वाकया भी 28 मई 2018 के सालाना पत्रकार सम्मेलन का हैं.
वैसे सुषमा स्वराज हो या कोई और, कुछ भी कहे, आज की तारीख में, विश्व में अति लोकप्रिय नेता व भारत के प्रधानमंत्री नरेद्र भाई मोदी अतुलनीय श्रेणी में आ चुके है.उनके द्वारा सम्पादित कार्यों से अमेरिका से जनकपुर(नेपाल) की आम जनता अभिभूत है.गदगद हैं .आनंदित हैं.गर्वोन्नत है.खासकर पिछले 4 वर्षों में कई देशों के भ्रमण के बाद मेरा अपना भी अनुभव है कि श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने की बाद विश्व क्षितिज पर भारत का मान और सम्मान बढ़ा है.भारत की पूछ बढ़ी है.
संभवतः इसीलिए देश में विदेशी पूँजी निवेश में 43 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि हुई है.इस वृद्धि की मूल वजह प्रधानमंत्री श्री मोदी के वे सभी महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम है,जिससे देश के साथ-साथ विश्व भी प्रभावित हुआ है,लाभान्वित हुआ है.ये भारत के समग्र विकास के लिए मोदी सरकार की असाधारण उपलब्धियां हैं. किसी भी देश के लिए एक बड़ी बात है.ये कोरी लफ्फाजी नहीं,शुद्ध आंकड़ा है,जिसे कोई भी मोदी विरोधी कही भी जांच सकते है ,चाहे वो विरोधी अपनी पार्टी का हो या विरोधी पार्टी का.क्योकि कहते हैं -सांच को आंच क्या..
भला हो, अपने अति लोकप्रिय विश्व नेता और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी का,जिनकी अद्भुत कार्य क्षमता,वाक् शैली,मित्रवत व्यवहार,शालीनता, सहृदयता,मर्म स्पर्श भाषण,अनुपम जनपयोगी कार्यों से विश्व स्तर पर भारत के आन,बान और शान में चार चाँद लगे हैं और आगे भी लगते रहेंगे.


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