आखिर वही होना था.जो हुआ.कभी छात्र नेता रहे  मुप्पवारापू वेंकैया नायडू भारत के 15 वें उपराष्ट्रपति निर्वाचित हो गए.सच में जमीन से जुड़ा किसान का बेटा देश के इस सर्वोच्च पद का हकदार बना. दावेदार तो उन्हें देश के वरिष्ठ राजनेता नरेन्द्र मोदी ने बनवा ही दिया था. देश के इतिहास में पहली बार तीनो सर्वोच्च पदों-राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति और प्रधान मंत्री पदों  पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कार्यकर्त्ता-गण विराजमान हुए है.ये उन लोगो के लिए चिंतन की बात है कि जो आज भी भाजपा और आरएसएस के विरोध का कभी भी कोई मौका नहीं छोड़ते.कहते है जिसका ज्यादा विरोध होता है.वही सोने की तरह चमकता है.शायद देश की फिजां आज की तारीख में यही बयाँ कर रही हैं.

आज के उपराष्ट्रपति चुनाव के परिपेक्ष्य में राष्ट्र कवि  राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने सौ साल पहले लिखा था,जो की आज भी समीचीन है, –हम कौन थे,क्या हो गए है,और क्या होंगे अभी..आओ विचारे ,आज मिलकर यह समस्याए हम सभी.  गुप्त की ये पंक्तियाँ हमारे नए उपराष्ट्रपति  मुप्पवारापू वेंकैया नायडू पर फिट बैठती है.सच है श्री वेकैया नायडू  अपने स्तर पर देश और पार्टी के लिए संकटमोचक रहें है.किसी भी प्रकार की समस्यायों को चुटकियों में निपटाने में वह माहिर रहे हैं.अपने मिलनसार स्वाभाव की वजह से उनके दुश्मन कम,पर दोस्त ज्यादा है.जिसका लाभ आने वाले दिनों में देश को मिलेगा.

श्री नायडू ने अपने जीवन के इस सफर को कई प्रकार की मुश्किलों का सामना करते हुए पूरा किया है.जो कि हर किसी के लिए अनुकरणीय है.ये बात दीगर है कि विरोधी पक्षों ने समय समय पर उन्हें घेरने की कई प्रकार की कोशिशें की.पर वे सब के सब असफल रहे.कहते है-सांच को आंच कहाँ.इसलिए सत्यमेव जयते की भारतीय शैली पर श्री वेंकैया जी विजयी रहे और आज देश के उपराष्ट्रपति है.शायद आने वाले दिनों में वह सर्वानुमति से देश राष्ट्रपति भी बन जाये तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी.

उपराष्ट्रपति पद का नामांकन भरते वक़्त श्री वेंकैया नायडू जी अति भावुक से हो गए थे.उनका कहना था वह तो अभी देश और पार्टी की और सेवा करना चाहते थे.उनकी इच्छा अधूरी रह गयी.क्योकि अब वह संविधान के कई दायरों में स्वमेव बंध जायेंगे,जिसके वे अभ्यस्त नहीं रहे.लेकिन अब राज्य सभा की कार्यवाही पहले से ज्यादा सरस.रोचक और ज्ञानवर्धक हो जाएगी,जब नए उपराष्ट्रपति श्री नायडू जी उच्च सदन राज्य सभा का सभापतित्व करेंगे.

जल,जंगल और जमीन से जुड़े  वेंकैया नायडू  को मैंने 1992 से देखा है,जाना है,समझने की कोशिश की है.एक जमीन से जुड़ा शख्स सबका दोस्त और सदैव हाज़िरजवाबी के लिए मशहूर.एक ऐसा दक्षिण भारतीय राजनेता,जिसकी काव्यात्मक-रागात्मक हिंदी सुनकर ठेठ हिंदी कहे जाने वाले नेता और बुद्धिजीवी भी कई बार आश्चर्यचकित होते देखे गए हैं.

वैसे श्री  नायडू के लिए तो कई बाते है.मेरे पास कई संस्मरण हैं.कहने के लिए ,बताने के लिए ,उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर .लेकिन मैं एक ऐसी वाकया का जिक्र करना चाहूँगा ,जिससे उनकी कार्यशैली,नेता और पार्टी के प्रति समर्पण की झलक मिलती है.घटना अक्टूबर 1993 की बात है, मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव था.श्री वेंकैया नायडू जी चुनाव के केंद्रीय प्रभारी थे.श्री लालकृष्ण आडवाणी राष्ट्रीय अध्यक्ष थे.मैंने चुनाव कवरेज के लिए श्री आडवाणी जी के साथ गया था.उस यात्रा में पत्रकार दीपक चौरसिया भी ग्वालियर तक साथ गए थे.श्री आडवाणी जी के सचिव दीपक चोपड़ा भी हम सब के साथ थे,उस यात्रा में करीब 7 दिनों तक क्रमवार मै उनके साथ था.उस वक़्त श्री वेंकैयानायडू की अद्भुत कार्यशैली से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ.वे सोते कब थे.जागते कब.पता ही नहीं चला.हम और दीपक जी फैक्स मशीन लिए खबर भेजने के लिए परेशान रहते थे.उन ख़बरों के प्रकाशन के बाद श्री आडवाणी जी उन सभी ख़बरों का अवलोकन कर सके.उसके लिए श्री वेंकैया जी परेशान होते थे.इसके अलावा किस क्षेत्र में श्री आडवाणी के साथ कौन साथ रहेंगे,मंच सज्जा से लेकर,मंच सञ्चालन की पूरी ख़बरें श्री वेंकैया जी के पास होती थी.सूचना,सम्वाद और समन्वय के अद्भुत संगम हैं श्री वेंकैया जी.इसे कहते है,कार्य के प्रति निष्ठां और अपने नेता और पार्टी के प्रति समर्पण.

“पिछले साल 2016 में  श्री वेकैया जी ने  अपने दिल्ली आवास पर उत्तर भारत का बड़ा पर्व “सावन तीज” का आयोजन किया था.पहल तो भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय जॉली की तरफ से था.इसके बावजूद श्री वेंकैया जी सपरिवार उस आयोजन में शरीक हुए और सबको बधाइयाँ दी और ली भी,देश में सांस्क्रतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने भी उनका कई प्रकार से कई मौकों पर योगदान रहा.

दूसरी तरफ, देश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले  महात्मा गाँधी के पोते और बहुआयामी प्रतिभा के धनी श्री गोपाल कृष्णा गाँधी के साथ बहुत बुरा हुआ.सब कुछ जानते हुए उन्हें चुनाव नहीं लड़ना था.पता नहीं वह ऐसी नौका पर क्यों सवार हो गए थे,जिसे कभी भी तथाकथित गंतव्य तक नहीं पहुँच सकती थी.इसे कहते हैं विनाश काले,विपरीत बुद्धि.

कहते हैं, मरता क्या नहीं करता .कांग्रेस धीरे धीरे मर रही है.कांग्रेस वाले ही ऐतिहासिक कही जाने वाली पार्टी का क्रिया-कर्म करने में लगे हैं.बुरे फंसा दिए गए श्री गोपाल गाँधी.सच में.क्या थे.क्या हो गए,वो भी किसके साथ,क्यों-  गोपाल कृष्ण गाँधी.

मेरा निजी मत है कि गोपाल गाँधी जैसे व्यक्तित्व को ये उपराष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ना था,भला हारने के लिए भी कोई लड़ता है क्या?,ये भी एक नई कहानी बनी, देश के लिए.लेकिन श्री गाँधी करते भी क्या..उन्हें तो सब लोगो ने मिलकर पहले फंसाया,फिर उलझाया और अंत ने बुरी तरह हरवा दिया.इससे ऐसा प्रतीत होता है कि देश के अलावा कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी में गांधीवाद अब अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है.

कोई माने या माने.हम तो चाहेंगे कि गांधीवाद जिंदा रहे.देश में और विदेशों में भी.पर जब उनके खास और अपने कहे जाने वाले ही उनको खत्म करने पर तुले हो,तो हम क्या कर सकते हैं,जो भी हो ,हम गाँधी और गांधीवाद को जिंदा रखने की हर संभव कोशिश करेंगे,जिससे आने वाली पीढ़ी सच और झूठ में फर्क करना सीख सके .  

इसके साथ ही अपने देश के 15 वें उपराष्ट्रपति  मुप्पवारापू वेंकैया नायडू  से भी यही अपेक्षा है कि वह गांधीवाद को जिंदा रख उनके सत्य और अहिंसा के सन्देश को पूरे विश्व में प्रचारित करते रहेंगे और गीता के श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते माँ फलेषु कदाचन” को अपनी शैली में महिमामंडित करते रहेंगे.


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