भारत की न्यायपालिका आज खुद कटघरे में है.कौन लाया है? क्यों हुआ ऐसा? उद्देश्य क्या? क्या एक सुनियोजित राजनीतिक मसला है या वास्तव में इन 4 न्यायाधीशों का स्वयं का दर्द है? यदि स्वयं स्वार्थ का दर्द है- (जिसकी सम्भावना सबसे ज्यादा दिख रही है) फिर विश्व का सबसे जानदार लोकतंत्र खतरे में कैसे? ऐसे कई सवाल है ,जिसका जवाब देश को चाहिए.देश की जनता जानने को इच्छुक है.जरा सोचिये ,जब देश की न्यायपालिका खुद कटघरे में आ जाये तो आम जनता का क्या होगा? ये सबसे बड़ा सवाल है.
देश की आज़ादी के 70 वर्षों के बाद  सम्भवतः पहली बार 2018 में उच्चतम न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने अपने मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली पर सवाल उठाया है .वो भी मीडिया में जाकर.जिससे की किसी भी प्रकार मीन मेख निकालकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लपेटे में लाया जा सके.लेकिन सरकार की भूमिका इस पूरे प्रकरण में नहीं के बराबर दिख रही है.हालाँकि कायदे और जजों के सेवा संहिता के तहत किसी भी प्रकार ये चारो जज आम जनता के बीच जाकर अपने प्रमुख या व्यवस्था के खिलाफ कुछ भी नहीं बोल सकते या लिख सकते है.लेकिन आश्चर्य की बात है कि ये चारो विद्वान् न्यायाधीशों ने सभी प्रकार के स्वयं के बनाये गए कानूनों से  परे हटकर एक क्रांतिकारी मुहिम शुरू करने की असफल कोशिश कर डाली,जिसे एक विशेष किस्म की राजनीति की शुरुआत कही जा रही है.
वैसे ये पहली बार की बात नहीं है.पहले सब कुछ परदे के पीछे होता था.सब कुछ सुनियोजित तरीके से.किसी में ये हिम्मत नहीं होती थी की वो सरकार के खिलाफ कुछ भी बोले या करे.1986 से अब तक मैंने बहुत ही करीब से कई राज्यों और केंद्र में न्यायपालिका की इस अद्भुत व्यवस्था को देखा है,समझा है और जानने की कोशिश की हैं .मैंने ये भी देखा है की किस प्रकार उच्च और उच्चतम न्यायालय में जज बनने के लिए राजनेताओ से मदद ली जाती रही हैं.मैं कई ऐसे जजों को जानता हूँ.पर आज स्थिति कुछ उलट सी हो गयी लगती है.
सरकार चलाने में भाजपा और कांग्रेस की अलग अलग शैली है.कांग्रेस सिध्ह्हस्त है तो भाजपा को अभी शासन के कई कई गुर सीखने हैं.भाजपा एक लुंज पुंज हुयी व्यवस्था को एक ही स्ट्रोक से बदलना चाहती है.जो असम्भव सा दीखता है.चाहे प्रधानमंत्री श्री मोदी कितना भी महती प्रयास कर ले.शायद सैधांतिक सोच और पुराने कांग्रेस भक्त नौकरशाहों की वजह से मोदी सरकार की कई महत्वपूर्ण लोक कल्याण की योजनाये आम आदमी तक नहीं पहुँच पा रही है.
रही बात इन चारों क्रांतिकारी जजों की .इन्हे सोचना चाहिए कि देश बड़ा या स्वयं का स्वार्थ .यदि सोचा है तो वो दिखना भी चाहिए .पर राष्ट्र हित में हमारा सवाल है कि क्या इन्होने अब तक न्यायिक सुधार की प्रक्रिया को लागू करने की मांग की? क्या इन सबने देश के उच्चतम न्यायालय के साथ जिला स्तर के अदालतों में लाखों लंबित मामलों को त्वरित गति से निपटाने के लिए कोई विशेष प्रक्रिया या कोई विशेष नीति अपनायी.आम आदमी को त्वरित न्याय मिले ,उसके लिए क्या किया ?यदि हाँ तो वो क्या,यदि नहीं तो -ऐसा क्यों? चर्चा दोनों पक्षों की होनी चाहिए .
इस बारे में वर्ष 2016 के जून महीने  में लन्दन के हाउस आफ कॉमन्स सभागार एक सेमिनार में मैंने  माननीय जस्टिस श्री जस्ती चलेमश्वर से भारत और ब्रिटेन में तुलनातमक तौर पर न्यायिक सुधार और न्यायिक सक्रियता  को लेकर सवाल पूछा था.पर उनकी तरफ से संतोषजनक जवाब नहीं मिला था.अवसर था देश की जानी मानी संस्था इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार “मेक इन  इंडिया कानून व्यवसाय और  मीडिया” का. मैं भी उस सेमिनार में एक वक्ता के तौर पर आमंत्रित  था.
इस क्रम में  मैं  इन चारो विद्वान न्यायाधीश महोदयों के दर्द को देखकर और सुनकर अचंभित हूँ.देश में एक मानद परंपरा रही हैं की न्यायपालिका को तथाकथित राजनीति से दूर रखा जाये.पर ऐसा नहीं हुआ.सूत्रों का दावा है की ये सब कांग्रेस की रणनीति के अनुसार हुआ.कांग्रेस से जुड़े कई वकील राजनेताओं  की दिमाग की ये योजना बताई जा रही है.जिससे मोदी सरकार के खिलाफ एक माहौल बनाया जा सके.
इसलिए इन जजों के विद्रोही रुपी कदम के तुरंत बाद  कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने एक बयान दिया और मोदी सरकार और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को घेरने की जुगत में पूर्व जज लोया की आकस्मिक मौत की विशेष जांच की भी मांग कर दी. इस मसले पर वामपंथी नेता डी राजा भी सक्रिय दिखे. गौरतलब हैं कि जज लोया भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े के एक मसले की जाँच कर रहे थे,उसी दरम्यान जज लोया की ह्रदय गति रुक जाने से आकस्मिक मृत्यु हो गयी थी.
पर एक दिन के अन्दर ही  नया बदलाव दिखा .भला हो न्यायविद श्री राजन गोगोई का,जिन्हें मात्र एक दिन में समझ में आ गया की शायद उनका कदम गलत था,शायद इसीलिए श्री गोगोई ने कहा की ये हमारा आंतरिक मामला है,इसे हम आपस में निपट लेंगे.
ये भी एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि भारत के उच्चतम न्यायालय में कुल 25 न्यायाधीश हैं ,लेकिन सबसे बड़े कष्ट में ये चार जज  साहेब ही रहे.क्यों ? शेष 21 को कोई अपने प्रमुख न्यायाधीश न्यायाधिपति दीपक मिश्र से कोई शिकायत नहीं रही.इसलिए इन चारों के इस मुहिम को काफी गहराई में जाकर विश्लेषण की जरुरत है ,जिससे देश को समझ में आ सके कि राजनीति से अब हमारी न्यायपालिका भी अछूती नहीं रही.
देश में कार्यपालिका,विधायिका की तरह न्यायपालिका भी हमारे गणतंत्र का अहम हिस्सा है.आज़ादी से लेकर अबतक सभी व्यवस्था अपनी शैली में चल रही थी,पर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं था,पर उसका नाटक जरुर था.जिसकी पूरी विशेषज्ञता कांग्रेस को है.
न्यायपालिका और राजनीति के रिश्ते को लेकर पहले भी कई प्रकार की कहानियां हमने सुनी है.शायद आगे भी सुनेगे.न्यायपालिका और राजनीति के अद्भुत रिश्तों का ही ये परिणाम रहा है की देश के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद जस्टिस रंगनाथ मिश्र जैसे विद्वान् कांग्रेस के राज्य सभा सांसद बने.इसके पहले भी कई जज अपने अपने कारणों से चर्चा में रहे ,जिसमे पूर्व चीफ जस्टिस सभरवाल के भ्रष्टाचार की कहानियां सबको पता है.
वैसे तो उन जजों की लम्बी सूची है जिनके रिश्ते विभिन्न राजनीतिक दलों से रहे हैं और उन सबकों को उसका समय समय पर लाभ भी मिलता रहा है .पर आज की स्थिति में मेरी उन चारों जजों सहित न्यायपालिका के सभी उच्च स्तम्भों से करबद्ध विनती है की इस संस्था को राजनीतिकरण से बचाए और देश के लिए किसी राजनीतिक दलों के हाथ में न खेले.हम सबको पता है देश से बड़ा कोई भी नहीं.


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