कोरोना काल में भारत में श्रमिक समाज खासा परेशान हैं.उनके समाज में अकाल मृत्यु.असमय मौते.दिल दहला देने वाली घटना.रोते ,बिलखते लोग,कोरे आश्वासन देते नेतागण  व सरकारे.8 मई 2020 की औरंगाबाद रेल पटरियों पर 16 मजदूरों की अकाल मृत्यु की ह्रदय विदारक रेल दुर्घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है.प्रधान मन्त्री नरेन्द्र भाई मोदी  दुखी दिखे.शोक व चिंता जाहिर किया.रेल मंत्री पीयूष गोयल को निर्देश दिया गया.मुआवज़े की बात की गयी.एक जांच समिति भी गठित की गयी.शायद फौरी तौर पर ऐसा पहली बार हुआ हो.जब राज्य की गलतियों पर केंद्र ने पहल की.कारवाई की.कारवाई और कार्यवाही का निर्देश दिया गया.परन्तु हम चाहते है ऐसा कभी नहीं हो.इसके लिए शायद केंद्र के साथ राज्य सरकारों  व शासन के साथ आपसी समन्वय व परस्पर सहयोग जरुरी है.चुस्ती व मुस्तैदी जरुरी है.तेज़ी से बदली हुई परिस्थितियों के तहत सरकारी नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन की सख्त जरुरत है.इस पूरे तंत्र को पहले से ज्यादा जिम्मेदार बनाये जाने की जरूरत है. 
ये कैसी बिडम्बना है ? भारत जैसे विकासशील से विकसित हो रहे देश में एक मजदूर की जान की कीमत मात्र 5 लाख रुपये.जो कि इस अमीर व्यक्ति की तुलना में काफी कम.वैसे अमीर लोगो की मौत तो ऐसे नहीं होती.कई जाने अनजाने दुर्घटनाओ में होना अलग बात है.यदि पांच लाख रूपये में एक मौत को देखे तो एक अमीर के पांच दिनों का पूरा खर्च भी नहीं होता.ये कैसे हो सकता है? वो भी भारत जैसे “महान” देश में? असंभव.ये तो घोर असमानता है! विषमता है ! भारतीय संविधान का घोर अपमान है.सबको पता है देश एक संविधान में समानता की जोरदार वकालत की गयी है.परन्तु उस समानता का व्यावहारिक व क्रियान्वयन पक्ष तो कुछ है नहीं.देश में समानता संभव  है क्या? मेरे को तो नहीं लगता है.मेरे विचार से भारतीय संविधान से समानता के सिद्धांत को निकल-बाहर कर देना चाहिए.1950 से अबतक सौ से ज्यादा संशोधन हो गए हैं तो एक और सही.कम से कम देश सभी नेताओ व नीति निर्माताओ को रोज झूठ तो नहीं बोलना पड़ेगा.वैसे भारतीय संविधान में आज भी कई ऐसे तत्व हैं,जो भारत के अनुरूप है ही नहीं.इसलिए भारतीय संविधान को पुनः लिखे जाने की सख्त जरुरत है-भारत की सही व वास्तविक तस्वीर के अनुरूप.
जरा सोचिये,उन श्रमिकों की दुनिया को.उनके दर्द को.उनके जीवन यापन के कष्ट को.जो मजदूर अपनी जान बचाने शहर से पैदल यात्रा से अपने अपने  गाँव जा रहा हो,और वो अपने गाँव नहीं पहुँच कर अपने से अपरिचित,अपनों से दूर अनंत चिरंतन यात्रा पर चला जाये,उसका क्या किया जाये.कौन है दोषी? अरे भाई,वो बेचारा मजदूर और उसके साथी ही दोषी होंगे न! वो क्यों अपने अपने गाँव जा रहे थे.सरकार नहीं है क्या? सरकार नहीं थी क्या? सरकारे तो थी,लेकिन वो वातानुकूलित कमरों में बैठे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सरकार,अरविन्द केजरीवाल  की तरह खाली पीली निर्देश जारी करने का बड़ा सरकारी काम जो कर रही थी.भले ही उन निर्देशों पर अमल हो रहा हो या नहीं.ये अलग बात है.
ये भी एक बड़ा सवाल है .क्या वो सारे मजदूर मूर्ख थे? शायद कई राज्य सरकारों के अनुसार वे मूर्ख थे.जाहिल थे .उनको मरना ही चाहिए था? उन्हें अपने गांवो में रहना चाहिए था.वो क्यों भागते है शहरों की ओर.नहीं पलायन करना चाहिए शहरों की ओर.राष्ट्र पिता कहे जाने वाले महात्मा गाँधी ने तो बोल ही दिया था,भारत गांवो में बसता है,तो फिर शहर क्यों? सभी गाँव वाले मूर्ख हैं.शहर वाले ही एकमात्र विद्वान्.वो ज्यादातर मजदूर प्रवासी क्यों हो गए.नहीं होना था.उन सबको अपने गाँव वापस नहीं जाना था क्या ? उन्हें तो  नेताओं व अफसरों के कोरे आश्वासनों से पेट भरना चाहिए था! पर ऐसे कोई क्यों करता? सबको पता है वे शहर की ओर रोजगार व रोजी रोटी के लिए पलायन करते है.यदि गाँधी के इस भारत में गांवो में रोज़गार के अवसर होते तो कोई शहर क्यों जाता? ये भी एक एक बड़ा सवाल है,चिंता व चिंतन का कारण  है केंद्र और राज्य सरकारों के  साथ देश के सभी स्वयम्भू नीति निर्माताओ के लिए.
आपको बता दे कि उन मजदूरों में वो दिल्ली के आनंद विहार पर रातोरात जमा करवाए गए हज़ारो मजदूर भी है तो सूरत के बेबस मजदूर भी..उनमें मुंबई-बांद्रा मस्जिद के पास हजारो की संख्या जमा हुए कामगारों की  व्यथा शामिल है तो मजदूरी नहीं दिए जाने की वजह से कठुआ पुलिस के वाहनो को तहस नहस करते कठुआ के प्रवासी मजदूर भी.सभी शामिल है इन मजदूरों में.उनके अलावा देश का पूरा श्रमिक समाज भी शामिल है उन दर्द में.क्या यही हैं ये एक उदीयमान कहे जाने वाले वन्दे भारत की नयी तस्वीर? इससे तो  यही लगता है इन आम लोगो का राजनेता, सरकार व शासन से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है.संकट विश्वास का है.परस्पर भरोसा टूटने का भी .नए सिरे से भरोसा जीतने के एक नए अभियान का भी  है.
प्रधान मंत्री मोदी की कोशिशे एक तरफ,तो राज्य सरकारे दूसरी तरफ.मोदी को जो करना है कर ले.उनकी पार्टी के ही उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश और गुजरात सरकारों ने अगले तीन सालों के लिए श्रमिक कानूनों में कई प्रकार के नरमी देकर मालिकों के हित में काम करने के निर्दश दिए हैं.अब उन राज्यों में मालिको की होगी बल्ले बल्ले और श्रमिक और बेचारा हो जायेगा.हे ईश्वर,क्या हो गया है इस देश को और इन राज्य सरकारों को??
श्रमिको के  पलायन (वो भी शहरों से गांवो की ओर) से केद्र से कई राज्य सरकारों की तथाकथित जन हित की नीतियों की पोल पट्टी खुली है.बातें बड़ी बड़ी,पर जमीनी हकीकत कुछ भी नहीं.कई राज्यों में आम लोगो का भी सरकारों व नेताओ पर भरोसा घटा है.पलायन एक राष्ट्रीय समस्या है.पलायन को लेकर केंद्र की नीतियों को सम्बन्धित राज्य सरकारे उचित तरीके से अमल नहीं करती है.न कर रही है.इस पर भी केंद्र को जिम्मेदारी से भरा एक कड़ा व मज़बूत विधेयक लाना पड़ेगा,जिसमे सम्बंधित राज्य सरकारों के साथ उस मशीनरी में काम कर रहे अफसरों को भी जिम्मेदार बनाये जाने की जरुरत है.पर अब तो शहरों से गांवो की ओर पलायन हो रहा है.शायद इससे गाँवों की स्थिति और बिगड़ने की आशंका बताई जा रही है.
कहते हैं ज्यो ज्यों दवा की, मर्ज़ बढ़ता गया.श्रमिक कल्याण की बातें काफी की गयी,कई नए विधेयक लाये गए,परन्तु वो सही दशा में धरती पर नहीं उतरा या उतारा गया.इससे प्रधानमंत्री मोदी जी परेशान है.देश परेशान है.राज्य परेशान है.इनके साथ  आजीविका की चिंता में आम कामगार/श्रमिक समाज  सबसे ज्यादा परेशान हैं.सबसे ज्यादा मस्त है अफसरान.जबकि प्रवासी मजदूर भ्रमित व ज्यादा तनाव में हैं,जिनके बारे में सही आंकड़ा किसी भी सरकार के पास नहीं है.
संयुक्त राष्ट्र के कुछ आंकड़े की माने तो भारत में सिर्फ असंगठित क्षेत्र में करीब 40 करोड़ मजदूर हैं.कोरोना काल में इन सबो पर  घोर संकट हैं .कोरोना काल में दुनिया भर में करीब 20 करोड़ लोगो की नौकरियां पर भी खतरे की आशंका है.भारत में सबसे ज्यादा परेशानी का सबब प्रवासी श्रमिको की है .जिनकी संख्या करीब 6-7 करोड़ बताई जा रही है. बिहार,मध्यप्रदेश,राजस्थान ,गुजरात,महाराष्ट्र उत्तरप्रदेश,दिल्ली,ओडिशा.पश्चिम बंगाल वे प्रमुख राज्य हैं जहाँ प्रवासी श्रमिको की संख्या सबसे ज्यादा हैं.इनके अलावा देश  के दक्षिणी राज्यों में केरल,कर्णाटक,तमिलनाडु,आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में भी प्रवासी मजदूरों की समस्या है.लेकिन हिंदी भाषा-भाषी राज्यों में बिहार,राजस्थान ,दिल्ली,उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में समस्या सबसे ज्यादा हैं.
ये भी एक हैरानी करने वाली बात है कि केंद्र सरकार के पास तो अप्रवासी भारतीयों और उनसे प्राप्त होने वाली विदेशी मुद्रा के बारे में तो पूरी जानकारियां है लेकिन देश के अन्दर इस विकराल  श्रमिक और प्रवासी श्रमिको की समस्याओं के बारे में केंद्र सरकार पास कोई ठोस आंकड़ा नहीं है,ऐसा बताया जा रहा है.
श्रमिको व प्रवासी श्रमिको को लेकर देश के सभी राजनीतिक दलों में भी ठन गयी हैं.उठापटक जारी हैं.कांग्रेस,वाम दल के साथ भाजपा को दोषी बता रहे हैं.पर कोई अपनी गलतियाँ मानने को तैयार नहीं दीखता.इन सबों की कथित राजनीति में आम जनता व मजदूर समाज बुरी तरह पिस रहा है.केंद्र सरकार श्रमिक कल्याण के परिपेक्ष्य में  सर्वोच्च प्राथमिकता की दावा कर रही हैं.ये बात भी एक तथ्य है कि गांवो में रहने वाले गरीबो के खाताओ में घोषित सरकारी धन की सहायता तो मिली है,लेकिन प्रवासी मजदूरों व परिवारों का क्या? इस पर सरकार मौन है तो विपक्षी भी चुप.
कोरोना काल में कामगार/श्रमिक कल्याण को लेकर कई राज्य सरकारों की स्थिति चिंतनीय व निंदनीय है.उन श्रमिको की ऐसी जान लेवा तस्वीर आने के बाद वो सरकारे धीरे धीरे नींद से जग रही है.या जागने का कोई नया ढोंग कर रही है ,ये नया शोध का विषय हो सकता है.
अब जरा सोचिये,एक अकेला प्रधान मंत्री नरेन्द्र भाई मोदी, कहाँ कहाँ नियंत्रण करेंगे,जब सरकार व सरोकार में बहुत बड़ा अंतर रहा हो तो ऐसी क्रियाएँ व प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक है.प्रधानमंत्री को वर्षो से लंबित प्रशासनिक सुधारो से जुड़े कई फार्मूलो पर तेजी से अमल करना पड़ेगा.तभी सरकार व जन सरोकार के उचित सम्बन्धो को जन हित में बेहतर किया जा सकेगा.मेरे को लगता है अभी सुशासन को आम लोगो तक सुनिश्चित करने ने और वक़्त लगेगा.साथ ही प्रधानमंत्री को कांग्रेस काल के कई पुराने नौकरशाहों से भी मुक्ति पानी होगी,जो इस जिम्मेदार सरकार को अपनी शैली में बदनाम करने की असफल कोशिशे करते रहते हैं.बताया जाता है कि प्रधान मन्त्री नरेन्द्र भाई मोदी जन हित में कई प्रशासनिक सुधारों  को लेकर कई कोशिशे जारी है.कुछ पर अमल हुआ है.कई पर अमल होना है.देश को इंतज़ार है उस स्वर्णिम काल का श्रमिक समाज के लिए,सबके लिए,पूरे देश के लिए,विश्व में एक नए कीर्तिमान के लिए !!!


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