प्रियंका गाँधी वाड्रा अब आ गयी.जी हाँ,अब वह विधिवत राजनीति में आ गयी.पहले अनौपचारिक थी.अब औपचारिक नेता बन गयी हैं.पहले देश के दो जिलों की नेता  थी,परन्तु अब देश की 20 जिलों की नेता बनायीं गयी हैं ,क्यों .ये सवाल मेरा नहीं है .सवाल कांग्रेस के अंदरूनी विश्वत दिग्गजों का है.
यदि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं की माने तो प्रियंका को पार्टी से जोड़ने के बावजूद उनकी प्रतिभा का अपमान किया गया है.पद राष्ट्रीय महासचिव का और काम कुछ जिलों का.ऐसा क्यों? इसका जवाब किसी के पास नहीं और कांग्रेस संस्कृति में किसी को भी ये जानने और पूछने की औकात नहीं है.बताया जा रहा है कि सोनिया गाँधी शुरू से ही प्रियंका के पार्टी में लाये जाने के खिलाफ रही है.इसलिए प्रियंका अपने दायरे को सीमित रखकर चल रही थी.कभी कभार मीडिया के पूछने पर संसदीय तरीके से उत्तर देकर चुप हो जाती थी.आज भी चुप है.लेकिन उनकी चुप्पी टूटने पर कोई बड़ी क्रांति होगी,ये तो आने वाला समय बताएगा.
पर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति जो भी कुछ करे या कहे,आज़ के  सत्ताधारी दल भाजपा में बैचेनी है.क्यों हैं.क्यों उनके नेता आधारहीन प्रतिक्रियां दे रहे हैं.क्यों  भाजपा परेशान हैं प्रियंका के आ जाने से.चाहे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का बयान हो या बिहार सरकार में मंत्री विनोद नारायण झा का या राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ संबित पात्रा का .कोई कुछ भी कहे ,भाजपा नेताओं को मर्यादित भाषा का उपयोग करना चाहिए .वैसे यही मर्यादित फार्मूला कांग्रेस के लिए भी लागू होता है.
मेरे को लगता है प्रियंका को कांग्रेस की मुख्य धारा में लाने का सफल प्रयास सिर्फ अध्यक्ष राहुल गाँधी का है.पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी का कतई नहीं.यदि सोनिया गाँधी कभी नहीं चाहती थी कि प्रियंका राजनीति से सीधा जुड़े.उसका मुख्य कारण पुत्र मोह और कई अन्य मसले बताये  जाते रहे  हैं .सोनिया गाँधी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यदि सोनिया चाहती तो प्रियंका के पति रोबर्ट वाड्रा कानूनी झमेले में कभी फंसते.वैसे भी ये सबको पता है कि सोनिया के दामाद पर आफत कांग्रेस के सत्ता काल में ही आया था.उस वक़्त केंद्र और हरियाणा में कांग्रेस की ही सरकारे थी.पर अब उसे कांग्रेस के नेता भाजपा को जिम्मेदार बता रहे हैं.परन्तु मेरा मानना है कि भाजपा की केंद्र और हरियाणा राज्य की सरकारे भी कांग्रेस अध्यक्ष के बहनोई के मामले में त्वरित गति से कार्यवाही नहीं करवा सकी.वही आज मोदी सरकार पर भी आरोप है कि रोबर्ट वाड्रा पर त्वरित गति से कारवाई और कार्यवाही क्यों नहीं हुयी,जबकि सरकार के 5 साल पूरे होने वाले है .ये देश के लिए चिंता और चिन्तन का कारण है.
प्रियंका को कांग्रेस में लाये जाने का प्रयास पिछले कई वर्षो से जारी था.एक बार तो जयपुर के एक महाधिवेशन में सदन की पूरी कार्यवाही थम सी गयी थी कि प्रियंका जी बस पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर लेगी,जबकि उन पर उस वक़्त कई प्रकार के ग्रहण लग चुके थे या लगाये जा चुके थे.वो वाकया 2013 की जयपुर कांग्रेस अधिवेशन की है .
वो 2013 था,आज 2019 है. अब समय.काल और परिस्थितियां बदल चुकी है.ना ना करते राहुल गाँधी देश की सबसे पुरानी कही जाने वाली पार्टी के अध्यक्ष बन चुके है.प्रियंका गाँधी वाड्रा को भी राहुल ने मना लिया है.अब वह औपचारिक तौर पर पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव होगी,लेकिन पूरे उत्तरप्रदेश की नहीं बल्कि आधे की.ये भी एक अजब-गजब का निर्णय है नए अध्यक्ष का.पर कोई क्या करे.मामला आलाकमान का है.हुक्म सर आँखों पर.
करीब 100 दिन बचे है लोक सभा चुनाव में.सभी दलों में चुनावी घुड़दौड़ शुरू हो चुकी है .देखना है कि किसका चमत्कार काम आता है.किसका जुगाड़ काम आता.किसका फार्मूला काम आता है.महागठबंधन का या महासत्ता का .
दो प्रमुख दलों में भाजपा का विकासवाद कितना सफल होता है  कांग्रेस का परिवाद और उनके आरोपवाद पर.उसमे कांग्रेस की नयी चमत्कारी नेता प्रियंका कितना सफल हो पाती है .ये कांग्रेस पार्टी की बिडम्बना है कि आज़ादी के पहले और बाद में परिवारवाद से खुद अलग नहीं कर सकी है.ये भी एक नए शोध का विषय है.ये बात भी अतिमहत्वपूर्ण है कि  नेहरु,इंदिरा उअर राजीव कांग्रेस के बाद ये नयी सोनिया कांग्रेस में काफी फर्क आ गया है.सोनिया कांग्रेस से आगे अब सबके सामने राहुल कांग्रेस है.जहाँ भावना तो प्रबल है,परन्तु कर्तव्य निर्बल है.वैसे कांग्रेस के लिए प्रधानमंत्री मोदी का नारा सबका साथ सबका विकास सबसे फिट बैठता है.कई मायनो में.देश की ज्यादातर आबादी को कांग्रेस के उस फार्मूले की आदत सी लग गयी थी,देखना है की भाजपा नेता और प्रधानमंत्री मोदी क सरकार आम जनता की पुरानी लत और आदत “खाना और खिलाना” को कितना सुधार पाने में सफल होती  हैं.वैसे पिछले एक दशक में देश के मतदाताओं का मिजाज़ काफी तेजी से बदल रहा हैं.
देश और कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा सवाल है कि आज 2019 के लोक सभा चुनाव के मौके पर प्रियंका को क्यों लाया गया,जबकि उन्हें 2013 के उस  ऐतिहासिक  जयपुर अधिवेशन में ही पार्टी की मुख्य धारा में शामिल होना था.उसका कारण प्रियंका स्वयं नहीं बल्कि तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गाँधी थी.ये भी एक बहुत बड़ा आंतरिक मसला है,जिसको नये अध्यक्ष राहुल ने अपने वीटो पॉवर का उपयोग कर प्रियंका को पार्टी की मुख्य धारा में शामिल किया है.दावा किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रियंका गाँधी ही सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकती है,लेकिन कैसे,इस पर ज्यादातर वरिष्ठ कांग्रेस नेता चुप है.परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अलग उत्साह देखा जा रहा है.देखना है कि वो तथाकथित प्रियंका उत्साह वोट में कैसे बदलता है.
यूँ तो प्रियंका गाँधी वाड्रा ने 2004,2009,2013,2014 और 2018 के विधान सभा और लोक सभा चुनावों में भी सक्रिय रही हैं,लेकिन सिर्फ अपने भाई राहुल और माँ सोनिया के लोक सभा सीटों तक.आसपास के कुछ क्षेत्रों में भी वो प्रचार करती देखी गयी थी ,लेकिन उसका उन क्षेत्रों पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ा था.अब देखना है कि 2019 के इस लोक सभा चुनाव में उनका कौन सा चमत्कार कांग्रेस को एक नया मुकाम दिला सकता है.
कांग्रेस प्रियंका को अपना तुरुप का पत्ता मान कर चल रही है,इससे विरोधियों को एक नया मौका हाथ लगा है कि  क्या राहुल गाँधी फेल हो चुके है.पर कांग्रेस का मत है प्रियंका की पार्टी में आगमन कांग्रेस की तीन राज्यों में बड़ी जीत के बाद हुआ है तो हार कैसी.रही बात भाजपा और प्रधानमत्री मोदी के खिलाफ गठबंधन की,उसपर पार्टी अध्यक्ष राहुल और प्रियंका मिलकर नए जुगत में जुट गए हैं.
प्रियंका के आने से विपक्ष के महागठबंधन को भी एक बड़ा झटका तो लगा है.प्रियंका की वजह से  देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में एक नया समीकरण बन चूका है. वर्षो पुराने दुश्मन बुआ –भतीजे की दोस्ती में प्रियंका खलल डाल सकती है .इसके प्रबल  संकेत हैं .वैसे तो प्रियंका के आने से पहले बुआ-बसपा प्रमुख मायावती और भतीजे-सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लोक सभा चुनाव के मद्देनजर अपनी सीटों का बंटवारा भी कर लिया था .कांग्रेस को उनकी औकात बताने की नीयत से दोनों ने सिर्फ 2 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ी थी.हालांकि कांग्रेस ने फ्रंट फूट पर आकर प्रदेश की सभी 80 लोक सभा सीटों पर अपने  उम्मीदवार लड़वाने की घोषणा कर चुकी है.इसे भाजपा एक बड़े लाभ के तौर पर देखने लगी है.
इन तमाम समीकरणों के परिपेक्ष्य में ये बात बड़ी ही महत्वपूर्ण है प्रियंका गाँधी वाड्रा के आने से पार्टी और देश की राजनीति में कितना फर्क पड़ेगा.मेरे विचार से कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला ,सिवाय सुस्त पड़े संगठन में एक नयी ऊर्जा के साथ कुछ सीटों में इजाफा होने के.प्रियंका की समझ  और असीम ऊर्जा को  राहुल नीति के तहत वोट में कितना तब्दील किया जा सकेगा,ये भी अभी समय के गर्भ में हैं.
कुल मिलाकर देखा जाये तो आज की तारीख में कांग्रेस में संघर्ष ज्यादा है,शांति कम.तीन राज्यों के विजय के बावजूद कांग्रेस में वो जोश नहीं देखा जा रहा है.आखिर क्यों?तीनो विजयी राज्यों में सत्ता के अंदरूनी संघर्ष से समय पूर्व पार्टी में काफी अशांति और भ्रांतियां भी दिखने लगी है.प्रियंका के आने पार्टी में एक नया पॉवर सेंटर बनेगा,जो दिखने भी लगा है ,जबकि अभी तक के तय कार्यक्रमों के तहत आगामी 4 फरवरी को लखनऊ में राष्ट्रीय महासचिव का पदभार ग्रहण करेंगी,पर दिल्ली में क्यों नहीं ? ये भी एक सवाल है ? 
                                                                                                                                                         आख़िरकार प्रियंका आ गयी है.पार्टी बचाने .देश बचाने और खुद को भी बचाने.जी हाँ,आज की स्थिति में प्रियंका के पति राबर्ट वाड्रा कटघरे में हैं . संशय और आशंका मिश्रित माहौल पार्टी में है .भरपूर आत्मविश्वास तो दिखाया जा रहा है.परन्तु प्रियंका अपनी दादी और देश की दिग्गज नेता इंदिरा गाँधी की तरह बन सकेगी,अभी उस पर कोई भी टिपण्णी उचित नहीं होगा.
कांग्रेस और देश की तमाम राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर अब देखना है कि कांग्रेस की नयी राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा, प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के कथित लंका का कैसे दहन कर पाती है या फिर उस होलिका दहन की होलिका बन जाती है.ये आने वाला समय ही बतायेगा...   
 


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