15 जनवरी 2019 को हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हूडा के दिल्ली स्थित आवास पर सालाना भोज  था.उसमे कांग्रेस सहित अमूमन सभी दलों के नेता और सभी  सक्रिय और वरिष्ठ पत्रकार आमंत्रित हुआ करते है.मै भी आमंत्रित था.इस भोज का ये सिलसिला पिछले कई वर्षो से चल रहा है.
 इस बार का भोज में कुछ अलग किस्म का उत्साह दिखा.जो पिछले चार वर्षों में नहीं दिखा था.वजह तीन बड़े राज्यों में कांग्रेस राज की वापसी थी.पर इस बार भोज को मैंने विशेष तौर पर खबरी मूड और मोड में रखा.खबर थी -नई विवादित राजनीतिक फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर  की सत्यता के साथ  कांग्रेस नेताओ की  प्रतिक्रिया.
फिल्म में फोकस पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनकी भक्ति पूर्ण कार्य शैली है.खासकर पीएम डॉ सिंह के 2004 से 2008 तक कार्यों का एक अलग नजरिये से विश्लेषण की एक कोशिश .साथ में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की विशेष समानांतर शासन शैली को भी चित्रित कर एक नए विवाद को जन्म देने की कोशिश है.इससे कांग्रेस के अंदर काफी बैचेनी देखी गयी.
इन दोनों पात्रों के बाद तीसरे  सबसे ज्यादा चर्चित पात्र  तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल का  हैं.जो आजकल पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष हैं .फिल्म को देखने के बाद ऐसा लगा कि अहमद पटेल से संजय बारू सबसे ज्यादा दुखी और प्रताड़ित हुए.सो उन्होंने किताब और फिल्म के माध्यम से अपनी पूरी भड़ास निकाल ली.तो क्या अहमद भाई ने संजय बारू को इतना सताया,तडपाया और नौबत यहाँ तक आ पहुंची कि बेचारे संजय बारू को पीएमओ छोड़ने को मजबूर होना पड़ा.इस प्रकरण के परिपेक्ष्य में मैंने उस  भोज में मौजूद अहमद भाई पटेल  से पूछा –अहमद भाई साहेब,आप इतने खराब हो,आप इतने बुरे हो कि बेचारे संजय बारू को इतना प्रताड़ित किया कि वो शख्स आपकी वजह से पीएमओ छोड़कर चला गया.खाते- खाते अहमद भाई के हाथ रुक से गए.वे बोले-मै तो कांग्रेस का एक सिपाही हूँ.मेरी क्या औकात कि संजय जी बारू जैसे बड़े पत्रकार और पीएमओ से पंगा लू और वे मुस्कुराए.फिर कहा–मैंने अभी वो फिल्म देखी नहीं है पर देखने के बाद विस्तार से बात करूँगा.पर उनके हाव्-भाव से ऐसा लगा कि वह अन्दर से काफी खुन्नस में है.क्योकि मामला उनकी छवि और हैसियत का जो हैं.
कई राजनीतिक फिल्मे पहले भी बनी है,बनती रही है और आगे भी बनती रहेंगी.जिनमे “आंधी” “किस्सा कुर्सी का” ”कुत्त्रापथिरिकल “इंदु सरकार” जैसी कई फिल्मे बनी हैं लेकिन इस फिल्म “द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर”  का लोक सभा चुनाव 2019 के ऐन वक़्त पर रिलीज़ किया जाना कई प्रकार की कहानियों को मजबूती प्रदान कर रहा है.इस फिल्म से क्या कांग्रेस को नुकसान होगा और भाजपा को फायदा होगा? तो मेरा मानना है कि इस फिल्म से कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी को नुकसान हो सकता है.क्योकि पूरी फिल्म में सोनिया गाँधी को समानांतर सरकार की प्रधान और सुपर प्रधान मंत्री बताने की कोशिश की गयी है.अहमद पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष की आवाज़ के तौर पर दिखाया गया है.मतलब डॉ मनमोहन सिंह सोनिया गाँधी की कठपुतली के तौर पर प्रधान मंत्री रही.शायद इसलिए सोनिया गाँधी के लिए डॉ मनमोहन सिंह सबसे ज्यादा मनमोहक थे ,जबकि प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गज दरकिनार कर दिए गए थे.इस फिल्म में राहुल गाँधी को भी एक नौसिखिया बताया गया है.
यदि मैं उस फिल्म के परिपेक्ष्य में चर्चा करूँ तो कुछ नाटकीय उपक्रम को नज़रंदाज़ कर दिया जाये तो कई सत्य घटनाओ का भी सटीक चित्रण किया गया है,मसलन पूर्व प्रधान मंत्री पीवी नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर और अंतिम क्रिया को लेकर तुच्छ राजनीति.क्योकि कई महत्वपूर्ण घटनाओं के साथ उस घटना का भी मै एक चश्मदीद गवाह हूँ.उस दिन 23 दिसम्बर 2004 को  अपराह्न पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की निधन की खबर सबसे पहले मेरे को मिली,उनके मोतीलाल नेहरु मार्ग स्थित आवास पर पहुंचने वाला  मैं पहला पत्रकार था,उसके बाद उनके निजी सचिव आर के खांडेकर और आंध्र प्रदेश की नेता और तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री पी लक्ष्मी थी.काफी देर तक वह भ्रम की स्थिति बनी रही थी.कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड पर भी उनके ले जाने को लेकर कई प्रकार की चर्चाएँ रही.फिर उनका अंतिम दाह-संस्कार हैदराबाद में किया गया.आखिर क्यों?ऐसा क्यों ?कांग्रेस के एक समर्पित,उद्भट विद्वान् नेता नरसिम्हा राव के साथ ऐसा उपेक्षित भाव क्यों?ये जवाब तो आज भी कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी के पास नहीं होगा.
पर मैं संजय बारू की किताब और फिल्म के उस वाकये से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि पीएमओ में सिर्फ वही ताक़तवर थे,बाकी ढक्कन.चाहे वो जे ऐन दीक्षित हो या ऍम के नारायणन.संजय की भक्ति सिर्फ मनमोहन सिंह के प्रति थी,ये बात तो ठीक है लेकिन मनमोहन सिंह सरकार के साथ पार्टी के भी नेता थे,इसका भी ध्यान श्री बारू को समय समय पर रखना चाहिए था. मेरे को लगता है कि श्री बारू के ज़ेहन में पूर्व प्रधान मंत्रियों में  पंडित नेहरु और श्रीमती इंदिरा गाँधी रही होगी .उल्लेखनीय है कि पंडित नेहरु को लेकर उनके सहयोगी  एम् ओ मथाई ने “Reminisenses of Nehru” किताब लिखकर पूरे विश्व  में हंगामा कर दिया था.कालान्तर में श्रीमती गाँधी के प्रधान सचिव पी सी एलेग्जेंडर ने एक किताब My Years with Indira Gandhi लिखकर सुर्खियाँ बटोरी थी.एलेग्जेंडर ने इंदिरा  गाँधी के कई अनौपचारिक पर्चियों को भी सार्वजनिक कर दिया था,जिसकी कांग्रेस और दुसरे दलों ने भी काफी आलोचना की थी.
कांग्रेस काल खंड के प्रधान मंत्रियों से जुड़े कई प्रकार के विवाद समय-समय पर चर्चित रहे.पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी को लेकर उनके सहयोगी अरुण सिंह ने भी के किताब लिखकर कुछ नाम कमाने की कोशिश की थी.जबकि आज की तारीख में संजय बारू की किताब और फिल्म उस तमाम दुस्साहस की कहानियों की सीमा तक भी नहीं पहुँच सकी.
इन तमाम प्रकरणों के मद्देनजर संजय बारू की किताब और फिल्म से ये बात स्पष्ट हुयी है कि डॉ मनमोहन सिंह एक बेचारे और मजबूर प्रधान मंत्री थे.उनके जैसा न तो कोई उनके पहले तक भारत के इतिहास में था और न कभी होगा.ईश्वर इस देश को ऐसा बेबस और मजबूर प्रधानमंत्री कभी न दे,ये मेरी सोच है,थोड़ी बहुत समझ भी.
2004 से 2014 तक कांग्रेस की यूपीए1 और 2 के कार्यकाल की समीक्षा की जाये तो आम जनता के हक में कई अच्छे और बड़े फैसले हुए परन्तु उनसे ज्यादा सरकार एक समर्थक दलों से ज्यादा घोटाले किये.कांग्रेस मूक दर्शक बनी रही,जैसे आजकल मोदी सरकार में अन्दर ही अंदर कई समर्थक दलों में स्यापा किया है ,झेलना पड़ रहा है मोदी जी की सरकार को.जैसे टीडीपी,टीआर एस,और रालोसपा जैसे दलों से मोदी सरकार का शोषण भी किया और फिर से कांग्रेस और अन्य के साथ मिलकर एक बार फिर से शासन की जुगाड़ में दिख रही है.संजय बारू की किताब पर आधारित फिल्म में सहयोगी दलों की भूमिका को लेकर कुछ खास नहीं दिखाया गया है .
मेरे राजनीतिक रिपोर्टिंग,सूचना और समीकरणों के तमाम विश्लेषणों और अनुभवों के मद्देनजर इस फिल्म में पूरा सच नहीं दिखाया गया है.सत्यों और तथ्यों का भी पूरी तरह से संयोजन और समायोजन का अभाव साफ़ दिखता हैं.संजय बारू न तो पीएमओ मे उतने ताकतवर थे न ही सरकार के अन्य कार्यों को दिशा निर्देश देने में.क्योकि मैंने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे कई वाक्यों से गुजरा हूँ.कई सत्यों और तथ्यों से समय समय पर रूबरू भी हुआ हूँ.
अंत में ,मेरे विचार से सत्य के साथ मिथ्या का मिलन नहीं हो सकता.क्योकि सत्य सदैव अकेला होता है सिंह की तरह,जिसकी दहाड़ से पूरा उसका पूरा इलाका थर्रा उठता है.उससे उसकी परवाह नहीं होती कि उसकी दहाड़ से किसका नुकसान हुआ या किसी का फायदा.इसलिए संजय बारू को सिर्फ सत्य लिखना था,नहीं लिखा.जो फिल्म के जरिये दिखाना था .नहीं दिखवा सके.कारण जो भी रहा हो,जिसे सिर्फ संजय बारू जानते है ,ऐसा प्रतीत होता है .मेरे विचार से संजय को पूरा सत्य लिखना और दिखाना था,न की अर्द्ध सत्य.सोचता हूँ कि एक अर्द्ध सत्य ऐसा है तो पूर्ण सत्य कैसा होगा...
 


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