आज बैठे-बैठे मन में विचार आया कि इस आपाधापी भरे जीवन में हम अपनी आने वाली पीढी को हमारी संस्कृति हमारी विरासत के बारे में शायद ही जानकारी दे पाये, हमारा इतिहास क्या था हमारी संस्कृति जिसका लोहा विश्व मानता है, वो इतनी पुरानी होने के साथ-साथ इतनी महान क्यो है, आज अगर हम युवाओ से बात करें तो कम ही होंगे जो इतिहास में दिलचस्पी रखते है, राजनीति पर लेख तो मिल जाते हैं, पर  इतिहास पर चर्चा कम होती है, पर अब यदि आने वाली पीढी तक हम अपनी संस्कृति को पहुंचना चाहते हो तो इतिहास से अवगत कराना अनिवार्य है.... इसी बात को आगे बढाते हुए चलो आज भारत के प्राचीनतम इतिहास के कुछ पन्नों को पलटे, प्राचीनतम भारतीय इतिहास की बात हो ओर मोहनजोदाडो, हड्डपा सभ्यता की बात न हो ये ऐसा तो सम्भव ही नही, आखिर भारत की प्राचीन सभ्यता सिंन्धु घाटी की सभ्यता ही तो है,, भारत का इतिहास कई हजार साल पुराना हैं, जो लोग हमारी संस्कृति पर सवाल उठाते है, उन्हें हमारी सिंन्धु सभ्यता को जरूर पढना चाहिये, इस परिपक्व सभ्यता का केंद्र स्थल पंजाब, हरियाणा तथा सिंध था, हड्डपा और मोहनजोदाडो की खुदाई में इस सभ्यता के प्रमाण मिले उससे जो तथ्य सामने आये उससे पता चलता है पंजाब सिंध बलूचिस्तान के भाग ही नही बल्कि गुजरात राजस्थान हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश कें सीमान्त भाग भी इस सभ्यता के साक्षी रहे है इस सभ्यता का क्षेत्रफल (12,99,600) वर्ग किलो मीटर के आसपास रहा होगा, साधारण भाषा में समझा जाये तो ये आधुनिक पाकिस्तान से भी बडा है, प्राचीन मिस्र में मेसापोटामिया से भी बडा, पश्चिम पंजाब प्रान्त के माण्टगोमरी जिले मे स्थित हरियाणा के निवासियों को शायद इस बात का अंदाजा भी नही था कि अपने आस पास की जमीन मे दबी जिन इटों का इस्तेमाल मकानों के निर्गाण में कर रहें थें वे कोई साधारण ईंटे नही है बल्कि वर्षों पुरानी व पुरी तरह विकसित सभ्यता के अवशेष है, विकसित सभ्यता का आशय ये है कि हड्डपा सभ्यता के लोग खेती, भवन निर्माण पशुपालन आदि सब में निपुर्ण थे हड्डपा सभ्यता में असंख्य देवीय मुर्ति मिली है, जिससे ये सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में भी मातृ तथा प्रकृति पुजा भारतीय करते थे, यहां एक बात बताना भी जरूरी है कि हड्डपा सभ्यता की 2600 बस्तियां थी वर्तमान पाकिस्तान में सिंन्ध तट पर मात्र 265 बस्तियां थी जबकि शेष अधिकांश बस्तियां सरस्वती नदी के तट पर मिलती है, मोहनजोदाडो के पुरातात्त्विक महत्व को देखते हुऐं यूनेस्को ने इसे विश्व की धरोहर की सूची में रखा हैं, से जोडकर देखे तो एक ओर दिलचस्प तथ्य ये हैं कि हमारी प्राचीन भारत की वैदिक सभ्यता सबसे प्रारम्भिक सभ्यता के प्रमाण भी इसी सभ्यता से मिलते है, क्योकि वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्रों जिसमें आधुनिक भारत के राज्य आते है यहीं विकसित हुई, आपको ये बताना भी जरूरी है कि हड्डपा, मोहनजोदाडो सभ्यता ऐसी नगर सभ्यता का नाम है जहां के लोगो का जीवन हमसे बेहतर था, वो ऐेसे लोग थे जो ज्यादा सभ्य होने के साथ साथ स्वच्छ तथा बेहतरीन हुआ करते थे, खुदाई में पारित अवशेषो के आधार पर, गेहूं, जौ कि खेती, भवन निर्माण का कार्य, यातायात के लिये बैलगाडी का इस्तेमाल करना बच्चो के खिलौने तक सब उस समय के लोग प्रयोग मे लाते थें, मौसम के अनुसार ऊनी व सूती वस्त्रों का इस्तेमाल करते थें, इस सभ्यता के लोग पक्की ईटो के घरो मे रहते थें इस सभ्यता के लोग महिलाओं का काफी सम्मान किया करते थें प्रकृति पूजा एवं रक्षा के लिये तत्पर रहते थें, लेकिन आज सबकुछ उल्टा है, आज वक्त आ गया है जब हम इतिहास से सबक ले हमारी सदियों पुरानी सभ्यता का पतन होने के मुख्य कारणो पर शोध करे, चिन्तन करे कि जैसे हड्डपा सभ्यता के पतन का मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन था। खुदाई मे जो नर कंकाल काफी गंभीर अवस्था में पाए गए, कुछ तो बिखर कर इधर-उधर गिरे पडे थे तो कई अस्थिपंजरों ने एक-दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे, मानो किसी विपत्ति ने उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुंचा दिया था।  लेकिन सबसे मुख्य बात ये है की हड्डपा के नष्ट होने का समय वही है जो महाभारत के युद्ध का समय था। कुछ इतिहासकारों की माने तो, यह नगर एक विशाल भूकंप की चपेट में आया था। दूसरी खोज के अनुसार यह नगर जो कि सिंधु घाटी के पास ही स्थित था, यहां बहती नदी में विशाल बाढ़ के कारण ही यहां के लोग पलायन कर गए। बाह्म आक्रमणः  1934 ई. में गार्डेन चाइल्ड ने आर्यो के आक्रमण का मुद्दा उठाया और मार्टीमर व्हीलर ने 1964 ई. में इस मत की पुष्टि भी की थी। इस मत के पक्ष में निम्नलिखित साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं। बलूचिस्तान के नाल और डाबरकोट आदि क्षेत्रों से अग्निकांड के साक्ष्य मिलते हैं। मोनजोदडो से बच्चे, स्त्रियों और पुरूषों के कंकाल प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद में हरियूपिया शब्द प्रयुक्त  हुआ है, इसकी पहचान आधुनिक हड्डपा के रूप में हुई। इन्द्र को पुरंदर अर्थात् किलों को तोडने वाला कहा गया है, इन सब बातो से एक बात तो ये साबित होती है, आज से नही प्राचीन काल से हमारी सभ्यता ने विश्व भर में अपना लोहा मनवाया हैं, जिसकी संस्कृति सभ्यता पर संसार शोध करता रहा है ओर शायद करता भी रहें पर एक बात कहने में किन्चित मात्र भी संदेह नही कि हमारी सभ्यता का लोहा विश्व हमेशा से मानता रहेगा,अपनी बात को विराम देने से पहले इतना तो अवश्य कहना चाहूंगी कि इतिहास को प्रमाणिक रूप से सही ही कह रहें है हम ऐसा नही कह सकते, क्योकि इतिहास कुछ साक्ष्य पर को कुछ क्योकि इतिहास कुछ साक्ष्य पर को कुछ कल्पनाओं पर आधारित होते है, आगे कभी किसी ओर विषय पर चर्चा को आगे बढायेंगें। 

अंत मे किसी कवि की कुछ पक्तियां याद आती है ..... 
इसलिए मैं हर गली में 
और हर सडक पर 
झांक-झाक देखता हूं हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि 
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति 
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श 
विवेक- प्रक्रिया, क्रियागत परिणति
पर इतिहास के प्रति जिग्यासा कही नही मिलती।


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