बचपन से सुनते आये हैं.. कानून अन्धा होता है..आखों पर बंधी पट्टी को इसका प्रमाण भी समझते थे.पर हाल ही में कानून के कई फैसले हुए, जिसमें न्यायपालिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.गौरक्षकों के मामले में भी सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़े निर्देश दिये है.पंचकूला में तो न्यायालय की भूमिका देखकर गर्व की अनुभूति हुई. इन मामलों  को लेकर मीडिया ने भी न्यायपालिका की जमकर तारीफें की. पर इन सबके साथ कुछ और भी फैसलों की चर्चा भी होनी चाहिये थी, 

पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायलय के फैसले को पलट दिया था,एक अनाथ 19 वर्षीय युवती जो चंडीगंढ स्थित नारी निकेतन में रहती थी और जिसकी दिमागी हालत भी ठीक नही थी .नारी निकेतन के गार्ड ने हवस का शिकार बनाया जिससे युवती गर्भवती हो गयी ,गर्भ में पल रहे बच्चे को जन्म के बाद उसके लालन-पालन की परेशानियों को ध्यान में रखतें हुएं फैसला सुनाया कि बच्चे को जन्म नही देना चाहिये,उसका गर्भ 19 सप्ताह का हो चुका था ,मेडिकल टर्म आँफ प्रेगनेन्सी एक्ट 1971 कें अंतर्गत गर्भपात की इजाजत नही थी .सर्वोच्च न्यायालय में जो फैसला आया वो जीवन के पक्ष में आया .जिसमें जज ने कहा कि जीवन अपने आप में एक शक्ति है .जिसे समाप्त करने का हक किसी को नही,साथ ही बच्चे की परवरिश  के भी निर्देश दिये , इसमें एक संदेश भी छिपा था सबके लिये, ऐसा भी नही की पहली बार हमारी न्याय प्रणाली सक्रिय भूमिका में नजर आ रही हो , इन शक्तियों का इस्तेमाल पहलें भी हुआ है़.

1969 में तात्कालिक राष्टपति जाकिर हुसैन की म्रत्यु के बाद जब वी वी गिरी ने राष्ट्रपति बनने के लिये उपराष्टपति के पद से इस्तीफा दे दिया था, पर इसके बावजूद तो 20 जुलाई से 24 अगस्त तक तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम .हिदायतुल्ला भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति थें ,पर इसके बावजूद फिर भी कही ने कही दशकों से भारतीय न्यायतंत्र में सुधारों की आवश्यकता महसूस होती ही है,क्योकि सस्ता एवं  शीघ्र न्याय कुल मिलाकर सम्भव था भी नही ,कोर्ट में लंबित मामलों कों जल्दी निपटाने के उपायों के बावजूद 2 करोड 50 लाख मामलें लंबित है,

कानूनविदों ने आशंका भी जताई थी,कि न्यायतंत्र मे लोगो का भरोसा भी कम होता जा रहा है,और विवादो को निपटाने के लिये अराजकता एंव हिंसक अपराध की शरण में जाने की प्रवृति बढती जा रही है,वे महसुस करते है कि इस नकारात्मक प्रवति को रोकने के लिये कोई प्रभावी कदम उठाने होगे,शायद इसके बाद कुछ प्रभावी कदम उठाये भी गये,चाहे कोई भी मामला जो जनता से जुडा हो,न्यायालय ने अपना पक्ष रखना शुरु किया भी,जो वक़्त की मांग भी है,ओर जनता के हित में भी.एक ओर जहां सूचना के अधिकार के तहत प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के कामकाज को प्रारदर्शी बनाने के प्रायास हो रहे है तो वहीँ दूसरी और न्याय पालिका के समक्ष आने वाले मामलों में होने वाली बहसों वकीलों और न्यायाधीशों के तेवरों की झलक सीधे जनता को भी दिखाई देने लगी है,अब एक बार फिर जनता को कानून पर भरोसा होने भी लगा है,पैसो के दम पर कानून  को खरीदने की सोचने वाली ब़डी बडी हस्तियां भी अब डरने लगी है.पर इन सबके साथ हमें ये भी नही भूलना चाहिये कि कुछ मामले ऐसे है जिस पर कानून  चाहता तो और ही कड़े फैसले ले सकता था,पर ऐसा हुआ नही,अभी कानून व्यवस्था में जो कमियां है जिन्हें दूर किया जा सकता है,क्योकि लोकतंत्र का भविष्य न्याय के मंदिर पर ही निर्भर रहने वाला है,.लेंकिन कुछ प्रयास करने आवश्यक है ,जैसे न्यायपालिका से जुड़े न्यायाधीश ,वकील और कई सांसद अमरिका की तरह अदालती कार्यवाही की पार्दशिता के लिये सीधे प्रसारण की व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं,पर अगर ऐसा होता है तो मेरा मानना है कि फिर लोगों का विश्वास कानून पर ओर भी बढ जायेगा,.साथ ही मुझे कई बार आश्चर्य भी होता है कि ,राजनितिक दल और सरकारें जनता को न्याय दिलाने के लिये बड़े-बड़े  वादे तो करती है पर जब उसके लिये करती कुछ भी नही. 

जब आम बजट पास होता है तो बहुत कम बजट पास करते है इस विभाग के लिये. जबकि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मामले मे बरसों लग जाते है,न्यायाधीशों की भर्ती चयन प्रक्रिया पदोनत्ती स्थान्तरण के मुद्दों पर कानुन पहले बदले गये फिर उन पर पून विचार किया जा रहा है,.इससे कानून का समय और पैसै दोनो ही बर्बाद  हो रहा है,पर फिर भी हजारों न्यायाधीशों की न्युक्ति साथ के साथ केन्द्र और  राज्य सरकार द्वारा न्याय परिसर में निर्माण के लिये कई गुना बजट का प्रावधान होना चाहिये ताकि साथ ही कोई भी केस हो तारीखों में या फाईलो मे ना दबी रहे.  पर ये तभी सम्भव हो सकता है, जब सभी सरकारी गैर सरकारी प्रणाली सुचारु रुप से अपने दायित्वों का निर्वाह करे..तब ये कहना भी अतिश्योक्ति नही होगी कि विश्व भर जिसका लोहा मानने को सब मजबूर हो जाएंगे.                                                    


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