देश में कहने मात्र को राष्ट्रपति का चुनाव गैर दलगत प्रणाली से संपन्न होने की पंरपरा रही है.इसी रिवायत की कवायद में बस मोहर लगाने पार्टी का निशान और कान फोडू प्रचार नहीं होता बाकि सब कुछ आम चुनावों जैसे दिखाई पडता है.यहां भी पक्ष-विपक्ष दमदारी से अपनी प्रतिमूर्ति को देश का राष्ट्राध्यक्ष बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते.फिर वह इसका राजनैतिक लाभ लेने की दौड़ में कैसे पिछड़ जाए.यह तो हो नहीं सकता क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव तो एक बहाना है, असली मकसद तो सत्ता हथियाना है.इसकी बानगी फिलवक्त चल रहे राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी में साफ तौर पर देखी जा सकती है.

 सत्तारूढ राजग ने राष्ट्रपति चुनाव में कानूनविद्, बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार क्या बनाया? देश में श्री कोविंद की जाति का अनुराग अलापे जाने लगा, एक पल में दलित का बेटा निर्विरोध  रायसिना हिल्स पहुंचते दिखा, पर यह कहानी अधूरी थी.इसी धमाचौकडी में विपक्षी दल भी कहां पिछे रहने वाले थे उन्होंने भी तपाक से नहले पर दहला मारने की फिराक में संप्रग की ओर से मृदुभाषी, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार का सियासी दलित दाव खेला.जानते हुए कि संख्याबल के आगे नतमस्तक होना पडेगा.मुफिद था जब जीत तय थी तब तो मुंह मोड लिए इसीलिए 13 में से केवल 1 राष्ट्रपति ही दलित समुदाय से आए ना जाने क्यों? अब तो सिर्फ रस्म अदाईगी बाकी है.
खैर! चुनाव लडने का अधिकार सबको है.फलस्वरूप दावेदारी के मामला बराबरी का हो गया, दलित बनाम दलित का, मतों का नहीं! जैसे यह राष्ट्रपति का चुनाव ना होकर जाति-समुदाय के मोहब्बत की अग्निपरीक्षा हो.अनुपालन में राष्ट्रपति चुनाव की आड़ में दलित प्रेम की होड़ मची हैं.आपाधापी में यक्ष प्रश्न झंझोरता है कि किसी जाति-वर्ग विशेष एकमेव व्यक्ति राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री आदि-इत्यादि बन भी जाए तो क्यां संपूर्ण समुदाय का सहमेव विकास हो जाएगा.अगर ऐसा है तो सभी वर्गो को बारी-बारी से इन पदों पर सुशोभित करने का चलन अविलंब चालु कर देना चाहिए जिससे एक झटके में ही अंत्योदय से सर्वोदय हो जाए.यह बिल्कुल भी मुनासिब नहीं है! क्योंकि नाम, जाति, मजहब और क्षेत्रियता की बोध कथा में समस्या का हल खोजना नाफरमानी है और कुछ नहीं.
 इसका नतीजा हम बरसों से देखते आ रहे है, कमोवेश जाति-बिरादरी को देश उच्च पदों पर कार्य करने का अवसर जरूर मिला है.किसी को कम या ज्यादा! परन्तु इसके सहारे समाज में कोई आमूलचूल परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुए.इतर बहार आई तो बेहतर नीतियों, योजनाओं और इच्छा शक्तियों के अमलीजामा से.अलबत्ता, महामहिम जैसे सर्वोच्च संवैधानिक, गौरवांमयी पद को जाति-पाति की परिधि में बांधना निरर्थक  है.यथोचित यह आसंदी सबसे परे राष्ट्रीय वैभव का प्रतीक और जनतंत्र का यशोगान है, लिहाजा अलौकिक रखना हमारी नैतिक जवाबदेही व जिम्मेदारी है.बावजूद शाश्वत संविधान में नदारद दलित शब्द के ककहरा में ‘‘दलित-दलित’’ की विरूदावली किंकर्तव्यविमूढ करती है.ध्यान रहे! इंसान की योग्यता जाति, धर्म, रंग और परिवेश में समाहित नहीं होती वरन् राष्ट्रयिता, ईमानदारी, विचारधारा, दृढविष्वास और कर्तव्यनिष्ठा पर निर्भर करती है.
हां! यह बात अलग है कि जिन्हें आज तक मौका ना मिला हो उन्हें काबिलयत के बल पर पदनवावत् करना चाहिए.बकायदा वह अब मिलते दिख रहा है सालों से अंतिम पंक्ति में खडे दलित वर्ग का नुमांईदा देश का दूसरी बार प्रथम नागरिक बनने जा रहा है.खुशगवार, राष्ट्रपति  के चुनाव की आड़ में दलित प्रेम की लगी होड नुरा-कुश्ती रहकर धरातलीय बन जाए तो क्या कहने.सहोदय, उत्सुकता में उपेक्षित दलित राजनैतिक संजीदगी, लगाव और सहदाव के दायित्व बोध में सिद्वहस्त से प्रतिष्ठापित होगा.
                        

                          

 

 


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