जब से आधुनिक समाज में प्रयोग करो और फेंक दो  का चलन शुरू हुआ हैं. तब से कूडा-करकट का ढेर एक विकराल समस्या का रूप लेता जा रहा हैं. धरती खुद एक कचरे के ढेर बन गई हैं. आइये, हम एक विचार पर ध्यान दें , यह धरती हमें विरासत के रूप में नहीं मिली हैं, यह तो हमारे पास भावी पीढी की धरोहर हैं. क्या हम इस धरोहर को कचरे के बोझ से दबा तो नहीं रहे हैं? इस कचरे में होते हैं ऐसे तत्व, जो बीमारियॉं उत्पन्न करते हैं, भूमि की उर्वरा शक्ति को कम करते हैं व हमारी फसलों को प्रभावित करते हैं. साथ ही यह कचरा मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा हैं. ऐसे कचरों का पृथ्थकरण हर हाल में करते हुए उपयोग व निराकरण पहल अमलीजामा पहननी चाहिए तभी कचरा भी कमाई जरिया बना सकता है. कदमताल से कचरे-कचरे से पैसा-पैसा मिलेगा.
मानव इतिहास से स्पष्ट होता है कि जैसे-जैसे जनसंख्या बढती गयी, प्रकृति से छेडछाड बढती रही है, जिससे प्रकृति के विभिन्न अवयवों में विकृतियॉं बढती रही और आज ये विकृतियॉं बडे पैमाने में हमारे सामने विभिन्न प्रकार के आविष्कार के प्रदूषणों के रूप में उभर आयी हैं. आज मानव ने जीने के आसान तरीके खोज निकाले हैं जिसमें मषीनों के आविष्कार से अपनी आवष्यकता पूर्ति के लिये उद्योगों का विस्तार, सडकों, रेलवे लाइनों का विस्तार, भूमिगत खनन, वनों और जगलों का सफाया किया हैं.
 इस तरह जनसंख्या और औद्योगिकीकरण की तेज रफ्तार के कारण पर्यावरण पर जो खतरा मंडराने लगा हैं. उससे विष्व चिंतित हैं. हमारे पर्यावरण पर यह खतरा घरेलु, व्यावसायिक, कृषि जल और औद्योगिक अपषिष्ट पदार्थो के कारण बढता जा रहा हैं. वीभत्स भारतीय परिदृष्य में लगभग 20 मिलियन टन ठोस अपषिष्ट का उत्पादन प्रतिदिन होता हैं. प्रति व्यक्ति ठोस अपषिष्ट उत्पादन कस्बों में 100 ग्राम के लगभग होता हैं. प्रति व्यक्ति ठोस अपषिष्ट का उत्पादन शहरों में 500 ग्राम के लगभग होता हैं.  
वास्तव में मानव जीवन का अस्तित्व संतुलित पर्यावरण पर निर्भर हैं. अपषिष्ट पदार्थो के करण विभिन्न प्रकार की समस्याओं का समाना हम कर रहे हैं. जैसे घरेलु अपषिष्ट में पोलीथीन, प्लास्टिक के टुकडें यदि फेंक दिये जाते हैं, ये कई वर्षो में अपघटित होते हैं. तथा पानी को जमीन में जाने से रोकते हैं. इनको एक जगह इकट्ठा कर चक्रीकरण अथवा निस्तारण करना चाहिये. वहीं घरेलु अपषिष्टों में सब्जी-फल अनाज आदि के छिल्कों को एक गड्ढें में डालकर कार्बनिक खाद तैयार करना चाहिए. इस प्रकार  ठोस, द्रव तथा गैसीय अपषिष्टों का सही उपयोग या निस्तारण ही अपषिष्ट प्रबंधन हैं. जिनकी बहुतायत प्रविधियां और तकनीके मौजूद हैं, जरूरत हैं तो अजमाने और उपयोग करने की.
दरअसल कुछ समय पहले तक अपषिष्ट को केवल कूडे-करकट का ढेर समझा जाता था लेकिन अनुसंधानों एवं खोजों से पता चला हैं, कि कूडा कहीं भी फेंक दिया जाये तो वह वातावरण से ऑक्सीजन लेकर गलने लगता हैं और बायोगैस किवां जैविक गैस बनती हैं. जिससे बिजली पैदा की जा सकती हैं. सारतत्व जैविक गैस में 95 प्रतिशत होती हैं. जैसे कि गोबर गैस. एक टन शहरी कचरे से 900 घनमीटर जैविक गैस बन सकती हैं. 
वस्तुतः अपषिष्टो का सुनियोजित ढंग से एकत्रीकरण, प्रबंधन और निस्तारीकरण कर इस इस भीषण समस्या का समाधान किया जा सकता हैं. साथ ही इनके पुनः उपभोग से जीव-जन्तुओं का स्वास्थ्य तथा पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा. लिहाजा बहुमूल्य ऊर्जा, धन का संचय मुनासिब होंगा. अख्तियारी रवैये से कचरा रोजगार का आधार बनकर एक पुरानी कहावत पैसा सडक पर पडा हैं बस उठाने वाला चाहिए के बजाय   पैसा कचरे में पडा है, साफ करने वाला चाहिए का गुंजार होंगा.


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