जिस देश  की एकता, सभ्यता एवं संस्कृति को मिटाना हो तो उस देश का इतिहास मिटा दो. स्मारक, साहित्य तथा वास्तविक संपत्ति ,चरित्र, धर्म और अखंडता को मिटा दो. संसार के नक़्शे से फिर वह देश स्वतः ही मिट जाएगा. किन्तु हमारे देश के साथ ऐसा होना कदापि मुनासिब नहीं हैं क्योंकि भारत वर्ष की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति और सर्वे धर्म समभाव की गंगा-जमुना तहजीब की जडे काफी गहरी हैं. जो दुनिया के लिए एक जीती जागती अनूठी, प्रेरणादायी मिसाल हैं. जरूरत है तो इसे संरक्षित और बनाये रखने की. प्रतिफलन राष्ट्रीय एकता, अखंडता धर्मनिरपेक्षता भारतीय गणराज्य की सहिष्णुता, अस्मिता को यथावत् रखेंगी. 

प्रत्युत, राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्ष भारत के महत्व को कदाचित भी कम नहीं आंका जा सकता हैं. ऐसे कौन से लक्षण हैं जो भारत को विभाजित करते हैं? क्या भाषा, धर्म, जातियॉं या विभिन्न प्रकार की असमानताएॅं. वास्तव में विकसित भाषाओं की विविधता ने तो हमारी राष्ट्रीय संस्कृति को सवंर्धित किया हैं. जाति, यद्यपि संविधान में इसे समाप्त कर दिया गया हैं, परंतु फिर भी यह हमारे दैनिक जीवन की एक सत्य बनी हुई हैं. यह मात्र ग्रामीण क्षेत्रों में, जिन्हें पिछडा कहा जाता है, ही नहीं अपितु देष के अत्यधिक विकसित भागों में भी विद्यमान हैं. धर्म का प्रभाव भी पूर्ण रूप से रचनात्मक नहीं रहा हैं. समय-समय पर विभिन्न धार्मिक समुदाओं में खिंचाव व द्वंद्व उत्पन्न होते रहे हैं. 

जब राजनीति में धर्म आ जाता हैं तो स्थिति और भी बिगड कर वीभत्स हो जाती हैं. इसके अतिरिक्त लोगों में बहुत अधिक सामाजिक और अर्थिक विषमताएॅं पाई जाती हैं. जहॉं एक ओर समाज का एक छोटा सा वर्ग अत्यधिक धनाढ्य हैं, वहीं दूसरे समाज का अधिकांश भाग दयनीय गरीबी से पीडित तथा सुविधाओं से वंचित रहा हैं. अमीरों और गरीबों के इस अंतर को षिक्षा और आर्थिक स्पृष्यता द्वारा ही पाटना होंगा. एक मजबूत और धर्मनिरपेक्ष देश बनाने के लिए हमें इन सभी मुद्दों को समझना होंगा जो रचनात्मक नहीं हैं और धार्मिक, क्षेत्रिय तथा जातीय आधार पर समस्याएॅं उत्पन्न कर रहे हैं. 

अतः आज आवष्यकता है षिक्षा और रोजगार, नेत्तृव को राष्ट्रीय एकता के लिए अभिकल्पित करना. इस समय देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवष्यकता हैं- राष्ट्रीय भावना तथा राष्ट्रीय पहचान का विकास करना, जिसके बिना राष्ट्रीय एकता संभव नहीं हैं. जब तकदेशवासियों के, समकालीन राष्ट्रीय तथा राजनीतिक पूर्वाग्रह, क्षेत्रीय तथा साम्प्रदायिक निष्ठाओं से परे नहीं होते और भारत की एकता और अखंडता के दीर्घकालीन तथा सतत् लक्ष्य की ओर पुनः निर्दिष्ट नहीं होते, तब तक राष्ट्र निर्माण के कार्य में शिक्षा और समानता की अपेक्षा करना व्यर्थ होंगा. राष्ट्रीय एकता तथा अखंडता, धर्मनिरपेक्षता के वास्ते षिक्षा एक मुख्य भूमिका अदा कर सकती हैं.

यथार्थ, शिक्षा के मुख्य लक्ष्यों के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा और एकात्मकता पर ध्यान दिया गया हैं. ऐसी अपेक्षा की जाती है कि शिक्षा उपयुक्त अभिवृतियों  का विकास करती हैं और वांछनीय मूल्य देती हैं जिससे नागरिक अपने देश और संविधान के प्रति निष्ठावान रहें, राष्ट्रीय प्रतीकों गोया राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान व गीत, राष्ट्रीय पशु, फूल, स्मारकों, धरोहरों, साहित्य, भारतीय सभ्यता-संस्कृति, स्वदेशाभिमान, स्वाभिमान और राष्ट्रपिता, अमर शहीदों, महापुरूषों तथा राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री आदि गौरवशाली प्रेरणस्रोतों का हृदयज सम्मान करें.

बहराल, हमारा संविधान समाज के सुविधा वंचित व्यक्तियों के लिए सहानुभूतिपूर्ण चिंता जताता है और उन्हें प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्रदान करने के लिए वचनबद्ध हैं. शिक्षाको एक ऐसे माध्यम के रूप में परिवर्तित होना चाहिए जो भारतीय समाज से विभिन्न प्रकार के पक्षपातों को मिटा सके. धार्मिक सहिष्णुता का सिद्धांत ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ भारतीय संस्कृति की मूल धारणा है. 

अतएव भारतीय समाज के सभी पक्षों जैसे, सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक, एकता-अखंडता और धर्मनिरपेक्षता को दृष्टिगत रखते हुए भारतीय संदर्भ में राष्ट्रीयता, अहिंसा तथा अंतर्राष्ट्रीय सद्भावादि के सांमजस्य से लोकतांत्रिक राष्ट्र का अधिष्ठान, भारत की सार्वभौमिक, सम्प्रभुता और सुदृढता को निसंदेह अक्षुण्ण रखेंगा.  


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