कब खुलेंगे! हिन्दी माध्यम विशेष स्कूल, यह जिज्ञासा समाप्त होने के बजाय दिनानुदिन बढते ही जा रही हैं। हिन्द देश में हिन्दी की व्यथा निराली है निजी क्षेत्र तो छोडिए! सरकारी तंत्र भी हिन्दी माध्यम विशेष  स्कूल खुलाने परहेज करता है। यकीन नही तो पन्ने पलट लीजिए खुदबखुद समझ आ जाएगा कि हमारे रहनुमाओं ने कितने हिन्दी  भाषी  विशिष्ट  विद्यालय का शंखनाद किया। रवैये से तो साफ जाहिर होता है कि मूल्क में हिन्दी की तालिम की जरूरत ही नहीं है। तभी गली-मोहल्ले और गांव-कस्बों में धडल्ले से अंग्रेजी माध्यम खुलते और हिन्दी माध्यम स्कूल बंद होते जा रहे है। खासतौर पर हमारी सरकारें भी अंग्रेजियत की दीवानी होकर प्रेम में अंग्रेजी स्कूल का बेसुरा राग अलापे जा रही है। कवायद से हिन्दी को संग्राहलीय भाषा  बनने में देर नहीं लगेगी। बानगी कांवेंट स्कूल का बडे-बडा बच्चा भी 67 सडसठ और 67 सिक्टी सेवन के फेर मे उलझ जाएगा। बेहतरतीब नव-भविष्य  को रटाया  गया अगाध भाषा  विज्ञान देश  से हिन्दी की विदाई करके ही दम लेंगा?

भेडचाल में विलायती सबब का अंधप्रेम विद्यार्थी को कहीं का नहीं छोडता। ना तो वह अंग्रेजी सीख पाता है नाहि हिन्दी, क्योंकि अनुकूल परिवेश  और सक्षम शिक्षक ही शालाओं में नहीं रहेंगे तो बच्चे क्यां खाक सीख पाएंगे। यह तो एक थोपने वाली पंरपंरा है। सीधे शब्दों  में कहे तो नाम बडे और दर्शन खोटे। बताने को अंग्रेजी तथा समझने को हिन्दी भी नहीं और संस्कृत की तो पूछों ही नहीं। बचपन नहीं मशीन बनाया जा रहा है, यह कैसा नवभारत तैयार हो रहा है? इसी बुनियाद पर देश  की तकदीर लिखी जानी है। वह दो राहे में खडा है, अब वह जाए तो जाए कहां अनसमझी अंग्रेजी के पास या भूली हिन्दी के पास। मंजिल उसे कहीं नहीं मिलती, मिलती है तो सिर्फ और सिर्फ गफ्लती, बेबशी और बेगारी। 

जनाब! ऐसी बीमारी को मत पालो जो आपकी आने वाली पीढी को तबाह कर दें। दुनिया का नक्शा  उठा लो अंगुली में गिनने के समान अंग्रेजी मातृभाषी देशों के अलावा कोई भी देश अंग्रेजी का अंधभक्त नहीं है। चाहे वह आपका पडोसी चीन, कोरिया हो, जापान या मित्र देश  रूस अथवा सात संमदर पार इटली, फ्रांस और जर्मनी सब अपनी मातृभाशा के बल पर अव्वल है। फिर हम क्यों इसके आगे-पीछे नतमस्तक हो रहे है? क्यां हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी कमजोर है कि हम अपनी मातृभाषा के दम पर बहुयामी आयाम नहीं छू सकते। किवां हिन्द देश  के अंग्रेज कहलाना उचित समझते है?   

लगता तो कुछ ऐसा ही है! अंग्रेजी के बिना जिदंगी अधूरी है, यही सब कुछ है, इसे सीख लो लाटसाहब बन जाओगे। रही बात! हिन्दी की यह तो गवारों की भाषा है इसे क्यां पढना-लिखना, बोलना आ गया इतना ही काफी है। कौनसा! वतन में विज्ञान, भूगोल, कम्प्युटर, भौतिकी, रसायन, गणित, तकनीकी, शोध  और अविष्कार  की शिक्षा  हिन्दी में मिलती है। अतिरेक चिकित्सा, न्यायालय, बैंक, रेल्वे, दूरसंचार, कारखाने और औद्योगिक प्रकल्पादि में हिन्दी की मुंह दिखाई रस्में है। दौर में हमारे नुमाइंदे संसद में ब्रिटिश  इंग्लिश  का क्यां जोरदार बखान करते है जिसे सुनकर एक अंग्रेज भी बगले झाकने लगे। बची-कुची कसर तथाकथित उच्च कुलीन  और अभिजात्य वर्ग पूरा कर देते है। फिर तो एक नव-जवान के लिए हिन्दी माध्यम मे पढाई करना वक्त जाया करने के समान ही है ? 

यह मनोवृति कथित राष्ट्रभाषा हिन्दी को नेस्तनाबूत करने के सिवाय और कुछ दुष्कर्म    नहीं है। इस ओर काश! दृष्टी नहीं दृष्टिकोण बदल लेते तो हालात यहा तक नहीं आते। जितना बढावा आज अंग्रेजी को चहुंओंर दिया जा रहा है उतना सहारा हिन्दी को दे दिया जाता तो हिन्द में हिन्दी का विलाप नहीं प्रलाप होता। बेहतर मातृभाषा  बन चुकी हिन्दी आज मूल्क की मातृभाषा बनी रहती। बेलगामी दौड में अंग्रेजी माध्यम स्कूल की भरमार लगाने से कोई फायदा नहीं है, जब तक बुनियादी ढांचे को मजबूत नहीं किया जाएगा तब तक काबिलियत सामने नहीं आएंगी। 

लिहाजा, हिन्दी माध्यम स्कूलों में मूलभूत सुधार, साध्य गुरूवर, नवाचार और तकनीकी का सराबोर जरूरी है। बारी में हिन्दी विशेष पाठशाला भी अब बराबरी से खुलना चाहिए, क्योंकि हिन्दी के साथ अंग्रेजी पढने में कोई गुरेज नहीं है, पर हिन्दी का षीर्शासन कर नहीं। दरकार, में हम सब बोलचाल, षिक्षा और अन्य कामकाजो में हिन्दी को मन से अमल में लाये तभी हिन्द और हिन्दी की भलाई है। 

                                             


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