मध्यप्रदेश के मंदसौर में फायरिंग से छह किसानों की दर्दनाक मौत और अनेक किसानों के घायल होने के बाद सरकार ने अपील जारी की है। इसमें मुख्यमंत्री की ओर से कहा गया है कि मध्यप्रदेश में किसानों की सरकार है। हमारी सरकार किसानों के हित में सदैव कार्य कर रही है। अपील में आगे कहा गया है कि पिछले दो दिन में आपसे (किसानों से ) हुई चर्चानुसार आपकी मांगों को स्वीकृत करने के आदेश जारी कर दिये गये हैं। 
    सही है। किसानों की प्याज, दाल आदि अच्छे दामों पर खरीदने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय आंदोलनकारी किसानों के साथ वार्ता कर लिये जाते तो संभव है किसान मान जाते। हड़ताल खत्म हो जाती। किसान बे-मौत मारे नहीं जाते। वार्ता उनके साथ हुई जिन्होंने हड़ताल की ही नहीं थी। जिनका हड़ताल के शुरूआती दौर में समर्थन भी नहीं था। जो सफलता को देख कर बीच हड़ताल में समर्थन देने आये थे। ऐसे सरकार समर्थक किसान संगठन के पदाधिकारियों के साथ बाले-बाले बैठक कर ली। उसी संगठन ने किसानों की हड़ताल स्थगित करने की एक तरफा घोषणा कर दी।  प्रदेश में होने वाली विभिन्न सरकारी पंचायतों में पहले से तय घोषणायें करने की तर्ज पर इस बार भी अपने अनुकूल संगठन को बुलाकर हड़ताल स्थगित करने की प्रायोजित घोषणा का खामियाजा पूरे प्रदेश को भोगना पड़ा। सरकार माने या नहीं माने यह बड़ी भूल थी। मंदसौर की इस घटना के बाद कांग्रेस सहित अन्य तमाम विपक्षी दलों को मौका मिल गया है । वे जोर शोर से किसानों के साथ सहानुभूति दर्शा रहे हैं। इधर मुख्यमंत्री ने भी मृतकों के परिवारों को एक-एक करोड़ रूपये का मुआवजा देने की घोषणा की है। 
    प्रदेश में किसानों की ऐसी मुकम्मल हड़ताल शायद पहले ही किसी ने देखी हो। शहरों में दूध नहीं बंटा। बच्चे तड़प गये। चाय की दुकानें नहीं खुली। फल, सब्जी नहीं मिली। लोगों ने शिद्दत से महसूस किया कि वास्तव में यह कृषि प्रधान देश है। किसानों के उत्पाद के अभाव में बाजार सूने हो गये।  गली मोहल्लों में सब्जी वालों की आवाजें नहीं सुनाई दीं।  घोषित हड़ताल दस दिन की है । वैसे देखा जाय तो किसान ऐसी स्थिति ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं कर पाता। पकी फसल एक-दो दिन का भी इंतजार नहीं कर सकती। फसल को जिस दिन पकना है उसी दिन पकेगी। उसे रोका नहीं जा सकता। गाय, भैंस आदि दुधारू पशुओं को सुबह-शाम दूध देना ही है। दूध निकलने के बाद अधिक देर इंतजार नहीं कर सकता।  फल, सब्जियां पककर गिर जाती हैं। सडांध मारने लगती हैं। किसानों के पास अपने उत्पादों को सुरक्षित रखने के संसाधन नहीं है। देश में किसानों की इसी मजबूरी का फायदा बिचौलिये और व्यापारी उठाते हैं। दूसरी बात यह है कि एक जैसी फसलें इफरात मात्रा में एक साथ आती हैं । सामान्यतः कृषि से भिन्न अन्य उत्पादों की तरह नियंत्रित तरीके से साल भर पैदा नहीं होतीं । इससे फसल के समय एक जैसे उत्पाद आवश्यकता से अधिक बाजार में आ जाते हैं। प्याज से साथ अक्सर ऐसा ही होता है। गेहूं, चावल, दालें तथा तमाम तरह के फल सब्जियां आदि के प्रचुर मात्रा में आमद से फसल के दौरान भाव घट जाते हैं। इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। सस्ते बाजार का फायदा उठाकर व्यापारी माल कोल्ड स्टोर्स, भण्डार गृहों में भर लेते हैं। बाद में लाभकारी दामों पर बेचते हैं। फसल के दौरान भी किसानों के उत्पाद दलालों के माध्यम से बिकते हैं । किसान पैदा करता है, भाव दलाल तय करते हैं। किसान घाटे में और दलाल, व्यापारी बिना किसी खास मेहनत के लाभ कमाते हैं।  
    किसानों की फसल जब भी आती है अक्सर मिट्टी के मोल बिकती है। घात लगाये बैठे जमाखोर, बिचौलिये, व्यापारी अपने मन माफिक दाम तय कर खरीदते हैं। बाद में  अपने ही द्वारा तय की गयी दरों पर बेचते हुए कई गुना मुनाफा कमाते हैं। किसान फसल को बोने-लगाने से लेकर खाद, पानी के इंतजाम में लागत लगाता है। अन्ततः अपने उत्पाद को दूसरों के भरोसे बेचने के लिए मजबूर होता है। किसान को मिली अत्यंत कम कीमत का वास्तविक उपभोक्ता को भी लाभ नहीं मिलता । अक्सर सुनने में आता है कि कम कीमत मिलने से अथवा लागत भी नहीं निकल पाने पर किसान अपनी सब्जी, फल आदि सड़कों पर छोड़कर लौट गये । बावजूद इसके किसी उपभोक्ता को कम कीमत पर फल सब्जी मिली ऐसा नहीं होता । 
    अब हालत यह है कि किसान, विशेष रूप से सब्जी, फल, दूध उत्पादक कातर नजरों से हड़ताल खत्म होने की बाट जोह रहे हैं। दिन गुजरते आंदोलन हिंसक होता जा रहा है। तोड़-फोड़, आगजनी, मारपीट की घटनाओं से भारी क्षति हो रही है। किसानों की मौत हो रही है। वहीं पुलिस के एक अधिकारी की आंख फोड़ दी गई ।  किसान तो परेशान हैं ही साथ में उनके उत्पादों को गलियों में बेचकर रोज कमाने-खाने वाले परिवारों के घरों में भूखे रहने की नौबत आ गई है। शहरों में लोग काली चाय पीने को मजबूर हैं। बीमारों को दूध, फल नहीं मिल पा रहा । सब्जियां नदारत हैं। 
    किसानों की मुख्य मांग कर्ज माफी और अपने उत्पादों का वाजिब दाम है। कर्ज माफी सीधा सरकार से जुड़ा मुददा है। उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी इसी मुद्दे के बल पर प्रचंड बहुमत से सप्ताह हासिल कर चुकी है। उसने सभी किसानों का पूरा कर्जा ना सही, अधिकांश किसानों का कर्ज मॉफ कर दिया है। इस निर्णय से देश के अन्य प्रांतों में कर्ज माफी की मांग ने जोर पकड़ा है। मध्य प्रदेश में किसानों के हित में सरकार द्वारा अनेक कदम उठाये जाने की जानकारी दी जाती है। किसानी को इसका लाभ भी मिला है। प्रदेश राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ण प्राप्त कर रहा है। सोहरत है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री किसान हैं। अब देखना यह है कि मंदसौर की घटना के बाद वे किसानों को किस तरह मनाते हैं। क्या उत्तर प्रदेश की तर्ज पर किसानों का कर्जा माफ करेंगे?

 


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