नोट बंदी के बाद घर में राशन नहीं होने से पांच सौ का नोट लिए कतार में खड़ा गरीब रो रहा है. दूसरी ओर कर्नाटक के पूर्व मंत्री के परिवार में चल रहे विवाह समारोह का खर्चा पांच सौ करोड़ होने का अनुमान लगाया जा रहा है. यह पूर्व मंत्रीजी किस पार्टी के है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमाम में सब एक जैसे हैं. दक्षिण भारत के राज्य की एक मुख्यमंत्री अपनी सहेली के पुत्र, जिसे उन्होंने गोद लिया था, के विवाह में इस राशि से कहीं अधिक खर्चे का दिखावा कर चुकी हैं. इन्हीं खबरों के साथ एक और समाचार है कि जीरो टालरेंस की घोषणा वाले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक अधिकारी तीन लाख रूपये की पहली किश्त के पच्चीस हजार रूपये लेते पकड़ा गया. इसके साथ ही प्रचलन में आयी नई करेंसी से भी देश में पकड़े गए प्रथम भ्रष्टाचार की मध्यप्रदेश से शुरूआत हो गई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करें तो क्या करें. जब पूरा आसमान फटा हो तब थीगरा कहां-कहां लगायें. 

            प्रधानमंत्री जी को भी कर्नाटक के पूर्व मंत्री के विवाह समारोह का निमंत्रण मिला होगा. इस विवाह समारोह में दुल्हन की साड़ी सत्रह करोड़ और लगभग एक अरब के गहनों का जिक्र मीडिया में हो रहा है. जिन पूर्व मंत्री जी के यहां विवाह समारोह है, वे अवैध माइनिंग के प्रकरण में जेल जा चुके हैं. फिर भी सभी दल के नेतागण अन्य बड़ी हस्तियां उनका निमंत्रण पाकर प्रफुल्लित हैं. बढ़ चढ़ कर विवाह समारोह में शामिल हो रही हैं केवल सवाल इस विवाह में किए जा रहे भौंडे, प्रदर्शन का नहीं सवाल देश में व्याप्त हो रही भीषण असमानता का है. सवाल ऐसे समय जब देश की विशाल आबादी, कृतिम अर्थाभाव झेल रही हो तब ऐसे समारोह आयोजनों में किए जा रहे अनाप-शनाप व्यय के औचित्य तथा उसमें शामिल होकर सामाजिक स्वीकृति प्रदान करने का है. 

            नोट बंदी के ऐलान से उपजी तमाम परेशानियों के बावजूद अधिकांश देशवासी इसके खिलाफ नहीं हैं. जिनको तिजोरियों, घरों में निर्मित स्ट्रांग रूमों अथवा अन्य कहीं भी दबा रखे, जमा किए नोटों के बंडलों में सड़ांघ आने का अंदेशा है, वही अधिक चिंतित हैं. विरोध भी अधिक ऐसे ही कर रहे हैं. लोगों को भड़का रहे हैं. आम आदमी की आदत है राशन की दुकान से लेकर भीड़ भरे धर्म स्थलों तथा अन्य अनेक जगहों में घंटो कतार लगाने की. उनका कहना है कि यह पहली बार हो रहा है कि देश की भलाई के लिए कतार में खड़े हैं. वह भी प्रधानमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कालाधन समाप्त करने की मुहिम में अपने आप को खड़ा देख रहा है. पीड़ा इसकी है कि देश में अच्छे कामों पर भी अड़ंगेबाजी होती है. अपना स्वार्थ सिद्ध करने, किसी भी तौर तरीके से बच निकलने के नये-नये तरीके खोज लिए जाते हैं. लोगों ने हजारों रूपये के रेलवे वेटिंग टिकिट खरीदे, फिर उन्हें निरस्त कराया.  

अपने सैड़कों कर्मचारियों विद्यार्थियों की रोज कतार में लगाया. किसानों, दोस्तों, रिश्तेदारों के नाम रूपये जमा कराये. यह कुछ ज्ञात तरीके हैं. और भी बहुत कुछ किया. नोट बंदी की घोषणा के बाद रातों-रात अरबों रूपये सोने की कालाबाजारी हुई. बीस-तीस से लेकर पता नहीं और कितने प्रतिशत पर पुरानी करेंसी बदलने का धंधा चल पड़ा. प्रापर्टियों, वाहनों के सौदे हुए. इन उपायों से फैल रही अराजकता को दूर करने के भी उपाय चल रहे हैं पर उनका खामियाजा भी आज आदमी को ही भुगतना पडे़गा. किसानों के नाम जमा हो रही राशि को देखते हुए सुना गया कि जिला सहकारी बैंकों में अब हजार-पांच सौ के नोट जमा नहीं किए जा सकेंगे. वास्तविक किसान जमाकर्ता को इससे दिक्कत होगी. बढ़ती कतारों पर नियंत्रण के लिए अंगुली पर अमिट स्याही का निशान लगाया जायेगा. एक बार में निकली साढ़े चार हजार की राशि से आजकल की महंगाई में मिलता क्या है. वास्तविक जरूरतमंद अब दोबारा पैसा भी नहीं निकाल पायेगा. बड़ों का तो बहुत कुछ बिगड़ता नहीं है. वह तो आज भी पांच सौ करोड़ की शादी कर रहा है. परेशानी आम आदमी को ही रही है. 

         नोट बंदी के फैसले को अब तक ठीक मान कर देश के लिए कतार में खड़े लोगों का सब्र कब तक कायम रहेगा कहना कठिन है. तरह-तरह से भड़काया भी जा रहा है. अफवाहों का बाजार भी गर्म हैं. कभी दस का सिक्का बंद होने की तो कभी नमक खत्म होने की अफवाहें फैल जाती हैं. वैसे भी देखा जाय तो समझ में आता है कि आम आदमी मजदूरी करें, रोजी रोटी कमाने जाय या निरीह की तरह नयी करेंसी के लिए बैंक के सामने खड़ा रहे. जिसके पास साढ़े चार हजार रूपये नहीं है और वह मजबूर होकर मजदूरी में नयी करेंसी की जगह पांच सौ का नोट ले लेता है, बैंक में कतार लगाना उसकी मजबूरी हो जाती है. अंगुली में अमिट स्याही लग जाने के बाद वह दोबारा कतार में भी नहीं लग पायेगा. मजदूरी करना उसकी मजबूरी है. पर्याप्त नये नोट अभी उन ठेकेदारों अथवा काम देने वालों के पास भी नहीं है. समस्या विचारणीय है. इससे विरोध बढ़ने की आशंका है. 

       एक और आशंका जो बहुतों द्वारा व्यक्त की गयी कि दो हजार के नोट से काला बाजारी बढ़ सकती है. भ्रष्टाचार में भी सहूलियत रहेगी. इसकी शुरूआत भी भोपाल से हो चुकी है. अफवाह थी कि दो हजार के नोट में कोई चिप लगाई गयी है. अब कोई जाली नोट नहीं बना पायेगा. यह नोट जमीन में भी दबा कर रखे जायं, पता चल जाएगा. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. शुभकामना ही व्यक्त की जा सकती है कि देश में अब जाली नोट का प्रचलन नहीं हो पायेगा. 


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